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बुधवार, 25 सितंबर 2013

छंद सरसी

छंद सरसी
[16, 11 पर यति, कुल 27 मात्राएँ , पदांत में गुरु लघु]

चाक  निरंतर  रहे  घूमता , कौन  बनाता   देह |
क्षणभंगुर  होती  है  रचना  ,  इससे  कैसा  नेह ||

जीवित करने भरता इसमें ,  अपना नन्हा भाग |
परम पिता का यही अंश है , कर  इससे अनुराग ||

हर पल कितने पात्र बन रहे, अजर-अमर है कौन |
कोलाहल-सा खड़ा  प्रश्न है   , उत्तर लेकिन मौन ||

एक बुलबुला बहते जल का   समझाता है यार |
छल-प्रपंच से बचकर रहना, जीवन के दिन चार ||


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

7 टिप्‍पणियां:

  1. खुबसूरत प्रस्तुति भाई जी-
    शुभकामनायें-

    उत्तर देंहटाएं
  2. हर पल कितने पात्र बन रहे, अजर-अमर है कौन |
    कोलाहल-सा खड़ा प्रश्न है , उत्तर लेकिन मौन ||

    अरुण कुमार जी ,बहुत सुन्दर छंद सरसी ,भाव भी उत्तम
    Latest post हे निराकार!
    latest post कानून और दंड

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 27.09.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (26-09-2013) चर्चा- 1380 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. सरस छंद है सरसी यारो,जैसे सरस प्रवाह |
    अरुण जी के छंद ये सरसी, वाह वाह जी वाह ||

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  6. सरस छंद सरसी है भाया, बहुत-बहुत आभार
    हमें प्रतीक्षा श्याम-सुधा की, बरसायें रस-धार ||

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