समर्थक

Google+ Followers

मित्रों!
आज से आप अपने गीत
"सृजन मंच ऑनलाइन" पर
प्रकाशित करने की कृपा करें।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिए Roopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। आपका मेल मिलते ही आपको सृजन मंच ऑनलाइन के लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

चार रुबाइयां ---डा श्याम गुप्त .....

तुमको देखा तुमको जाना तुमको चाहा जांना ;
जानकर आपको कुछ और नहीं जाना जांना |
आपकी चाह में कुछ और की चाहत न रही -
तेरी चाहत को ही पूजा और पूजा  जाना ||

लिख दिया अपने  दिल पे तुम्हारा नाम यारा ,
गुल से भी नाज़ुक है ये दिल हमारा यारा |
आप यूं  तोड़कर इसको न जाइयेगा कभी -
अक्स बसता है इसमें तो तुम्हारा यारा ||

आप आये दिल के आशियाने में,
क्या कहें क्या न हुआ ज़माने में |
बात जो थी बस लवों तक आपके,
होगई है बयाँ हर फ़साने में |

दो तरसे हुए जिस्म करीब आये,
गुलमोहर के फूल खिलखिलाए |
नगमे स्वयं ही सदाएं देने लगे -
मीठी गुदाज़ रात मुस्कुराए |





4 टिप्‍पणियां: