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सोमवार, 16 सितंबर 2013

बस यही साहित्य है.

 
 बस यही साहित्य है.

 देखते  ही मोह  ले  जो  मन, वही  लालित्व  है| 
पी  सके  संसार  का  जो  तम,वही आदित्य  है|
डूबने से  जो बचाकर  विश्व-हित  की नाव  को,
नव सृजन का पथ दिखाए,बस यही साहित्य है|

रूप  है  मृदुता  नही, किस  काम  का  लालित्व  वो |
   प्यार को समझा न जो ,किस काम  का पाडित्य वो |   
 जो  समय  के  यक्ष - प्रश्नों  के  न  उत्तर  दे  सके , 
  दृष्टि  में  मेरी  भला  किस  काम  का साहित्य  वो |  

रचनाकार - कमल किशोर "भावुक"

8 टिप्‍पणियां:

  1. डूबने से जो बचाकर विश्व-हित की नाव को,
    नव सृजन का पथ दिखाए,बस यही साहित्य है|..

    बहुत ही सुन्दर ... ओजस्वी ... भाव्पूर्म पंक्तियाँ हैं ... आनंद आ गया ...

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  2. जो समय के यक्ष - प्रश्नों के न उत्तर दे सके ,
    दृष्टि में मेरी भला किस काम का साहित्य वो | ---सटीक..

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १७/९/१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. जो समय के यक्ष - प्रश्नों के न उत्तर दे सके ,
    दृष्टि में मेरी भला किस काम का साहित्य वो |---बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ हैं

    उत्तर देंहटाएं
  5. नव सृजन का पथ दिखाए,बस यही साहित्य है...बि‍लकुल सही..

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  6. जो समय के यक्ष प्रश्नों के न उत्तर दे सके .......................
    साहित्य की स्तरीयता को बनाये रखने का खूबसूरत संदेश है यह कविता ,बधाई

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