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रविवार, 29 दिसंबर 2013

"जिल्लत का दाग़" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जब गाँव का मुसाफिरआया नये शहर में।
गुदड़ी में लाल-ओ-गौहर, लाया नये शहर में।

इज्जत का था दुपट्टा, आदर की थी चदरिया,
जिल्लत का दाग़ उसने, पाया नये शहर में।

चलती यहाँ फरेबी, हत्यायें और डकैती,
बस खौफ का ही आलम, छाया नये शहर में।

औरत के हुस्न थी, चारों तरफ नुमायस,
शैतानियत का देखा, साया नये शहर में।

इंसानियत यहाँ तो, देखी जलेबियों सी,
मिष्ठान झूठ का भी, खाया नये शहर में।

इससे हजार दर्जे, बेहतर था गाँव उसका,
फिर रूप याद उसको, आया नये शहर में।

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना परिवेश प्रधान

    जब गाँव का मुसाफिर, आया नये शहर में।
    गुदड़ी में लाल-ओ-गौहर, लाया नये शहर में।

    इज्जत का था दुपट्टा, आदर की थी चदरिया,
    जिल्लत का दाग़ उसने, पाया नये शहर में।

    चलती यहाँ फरेबी, हत्यायें और डकैती,
    बस खौफ का ही आलम, छाया नये शहर में।

    औरत के हुस्न थी, चारों तरफ नुमायस,
    शैतानियत का देखा, साया नये शहर में।

    इंसानियत यहाँ तो, देखी जलेबियों सी,
    मिष्ठान झूठ का भी, खाया नये शहर में।

    इससे हजार दर्जे, बेहतर था गाँव उसका,
    फिर “रूप” याद उसको, आया नये शहर में।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खूब .. नए शहर के बदलते अंदाज़ को बाखूबी लिखा है ...
    नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. एकदम सच बयां करती रचना...बधाई...

    उत्तर देंहटाएं