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गुरुवार, 1 अगस्त 2013

हरिगीतिका छंद ..... डा श्याम गुप्त .....



       हरिगीतिका चार चरण २८ मात्राओं १६-१२ पर यति वाला सममात्रिक तुकांत छंद है जिसमें 

अंत में लघु-गुरु या लघु लघु लघु रहता है एवं चारों चरणों में समतुकांत या दो-दो चरणों में 

समतुकांत होने चाहिए| यथा---

१.----- चारों चरण समतुकांत .....लघु-गुरु या  लघु लघु लघु .....

श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन हरण भव भय दारुणं  = लघु-गुरु या   (= रु ण म् = लघु लघु लघु )

नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं  (= रु ण म् = | | | )

कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरं   ( = न्द र म् =| | | )

पट पीत मानहु तड़ित रूचि शुचि नौमि जनकसुता वरं     (  = व र म् = | | | )  ----गो.तुलसी दास



त्यौहार प्रिय मानव जगत में सौख्य का आधार है,

उत्सव जहां होते न वह भी भला क्या संसार है|

त्यौहार बिन जीवन जगत बस व्यर्थ का व्यापार है ,

हिल मिल उठें बैठें चलें यह भाव ही त्यौहार है |    --- डा श्याम गुप्त ..


२.----- दो दो चरण समतुकांत.....व लघु-गुरु ...


चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल पावक खरभरे |
 
मन हरष सब गंधर्ब सुर मुनि नाग किंन्नर दुख टरे ||
 
कट कटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं |
 
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं ||     ---- गोस्वामी तुलसीदास




थी सदा ही नारी निपुण हर कार्य दक्ष सदा रही |
 युग श्रम-विभाजन के समय थी पक्ष में गृह के वही |
 हाँ चाँद सूरज की चमक थी क्षीण उसकी चमक से |
वह चमक आज विलीन है निज देह दर्शन दमक से ||....  डा श्याम गुप्त ,,,


३.---- चारों चरण समतुकांत व लघु लघु लघु....

नर की कसौटी पर रहे नारी स्वयं शुचि औ सफल|

वह कसौटी है उसी की परिवार हो सुंदर सुफल |

हो जाय जग सुंदर सकल यदि वह रहे कोमल सजल |

नर भी उसे दे मान जीवन बने इक सुंदर गज़ल ||      ----डा श्याम गुप्त









8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर जानकारीपरक पोस्ट।
    आपका आभार!

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 02.08.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

    उत्तर देंहटाएं
  4. हरिगीतिका छंद को सुंदर उदाहरणों के साथ समझाया गया है. दो अलग-अलग काल के छंद पढ़कर आनंद आ गया.

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