समर्थक

Google+ Followers

मित्रों!
आज से आप अपने गीत
"सृजन मंच ऑनलाइन" पर
प्रकाशित करने की कृपा करें।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिए Roopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। आपका मेल मिलते ही आपको सृजन मंच ऑनलाइन के लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

ग़ज़ल....अंदाज़े-वयां ज़िंदगी का.... डा श्याम गुप्त ...



           अंदाज़े-वयां ज़िंदगी का....


जरूरी नहीं ज़िंदगी को घुट-घुट के जिया जाए |
चलो आज ज़िंदगी का अंदाज़े-वयां लिया जाए |

खुशी पाते हैं जो अपनी शर्तों पे जिया करते हैं ..
शर्त  यही   कि  सदा परमार्थ  हित  जिया जाए ..|

यूं तो पीने के कितने बहाने  हैं  ज़माने में,
लुत्फ़ है जब जाम से जाम टकरा के पिया जाए |

मरते हैं हज़ारों लोग दुनिया में यूं तो लेकिन,
मौत वही यारो जब देश पे कुर्वां  हुआ जाए |

जन्म लेते हैं, जीते हैं प्रतिदिन जाने कितने,
जीना वही जब राष्ट्र का सिर गर्वोन्नत किया जाए |

लिखी जाती हैं कितनी किताबें, कविता-कहानियां,
साहित्य वही  कुछ सामाजिक सरोकार दिया जाए |

ग़ज़ल कह तो रहा है हर खासो-आम यहाँ, लेकिन 
ग़ज़ल वही  जब अंदाज़े-वयां श्याम का जिया जाए |

9 टिप्‍पणियां: