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सोमवार, 13 जनवरी 2014

हम तुम ...पानी का बूंद

सात फेरों के बंधन में बंध गए हम 
दो शरीर,एक आत्मा हो गए हम !
एक एक विन्दु सम जीवनधारा में
बहते रहे साथ साथ ,
डूबकर प्रेम के अथाह सागर में
तय करते रहे जीवन पथ |
दरिया में कुछ लहरें उठी 

गिरी ,फिर उठी ,
इस उठापटक ने ऐसा कुछ करना चाहा 
प्रेम-बंधन के डोर को तोडना चाहा 
कोशिश बहुत किया पर तोड़ ना सका ,
पर जख्म कुछ ऐसा दिया 
मन,प्राण सब घायल हुआ |
"सात फेरों का अटूट बंधन है "
यह विश्वास टूट गया,
कातिल ज़ख्म ने बंधन को ढीला किया
फिर भी हम बहते रहे साथ साथ
नहीं छोड़े एक दुसरे का हाथ |
बहते बहते कभी तुम मुझ से और 
कभी मैं तुम से टकराता
और यूँही चलती रही हमारी जीवन की धारा|
लहरों की यूँ उथलपुथल 
हमदोनो पर भारी पड़ा|
कभी तुमको ले जाता मुझ से दूर 
कभी मुझको ले जाता तुमसे दूर |
धीरे धीरे बढती गई दुरियाँ
हम हो गए बहुत दूर |
अब मैं एक किनारे में हूँ तो 
तुम दुसरे किनारे 
मानो अनन्त काल से है प्रतीक्षारत 
मिलने की आस लिए नदी के दो किनारे |
धारा यूँ बहती जायगी ,
मिल जायगी सागर में ,
तुम खो जाओगी,मैं खो जाऊंगा 
सागर के अटल गहराई में |
असंख्य धाराएं होंगी ,
होंगे असंख्य बुँदे हम तुम जैसे 
कौन किसको पहचानेगा ?
क्या हम मिल पायेंगे फिरसे ?
यही चिंता सताती मझे 
करती मुझे बेहाल ,
कैसे काटूँगा दिवस रजनी तुम बिन 
कैसे जानूंगा तम्हारा हाल..........
 

क्या दो आत्माओं के प्रेम का यही  है अंत ?


कालीपद "प्रसाद " 
सर्वाधिकार सुरक्षित





6 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति-
    आपका आभार-
    मकर-संक्रान्ति की मंगलकामनाएं -

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति!
    मकर संक्रान्ति की मंगलकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (17-01-2014) को "सपनों को मत रोको" (चर्चा मंच-1495) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं