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बुधवार, 1 मार्च 2017

वर्त्तमान सन्दर्भ में साहित्यकारों के दायित्व-- (डा श्याम गुप्त )


                 

             ४६ वें साहित्यकार दिवस, १ मार्च, २०१७ पर प्रस्तुत किया गया आलेख----

            वर्त्तमान सन्दर्भ में साहित्यकारों के दायित्व-- (डा श्याम गुप्त )


                  साहित्य व साहित्यकार सामाजिक प्रचेतना के वर्ग में अग्रगण्य स्थान रखते हैं| उनका मूल दायित्व है कि प्रत्येक प्रकार के अनुशासन, उदात्त भावों व चरित्रों का पुनः पुनः स्मरण एवं समाज में स्थित वर्त्तमान बुराइयों, नैतिक व चारित्रिक पतन आदि के दिग्दर्शन के साथ उनका समुचित समाधान भी प्रस्तुत करें | संस्कारहीनता एवं आचरण-भ्रष्टता के आज के युग में यह दायित्व और भी अधिक महत्वपूर्ण होजाता है |
यदि हम साहित्य क्या है एवं स्वयं साहित्य का क्या उद्देश्य है को रेखांकित करें तो साहित्यकार का उद्देश्य स्वयं ही स्पष्ट होजाता है | मूलतः किसी भी साहित्यिक रचना के निम्न अभिप्रायः होते हैं ----

१. आत्म-रंजनार्थ –साहित्यकार या कृतिकार स्वांत सुखाय बात कहता है और वही अन्य-रंजनार्थ व जन-रंजनार्थ भी होजाती है | यथा भजन, कीर्तन, वंदन, प्रेम गीत, अध्यात्म, प्रकृति वर्णन, सामान्य दैनिक वर्ण्य विषय, आदि | इसमें मूलतः ह्रदय के भावों का उत्स के साथ साथ बुद्धि विलास भी प्रधान रहता है |
२.जन जन रंजनार्थ ---सामयिक वर्णन, समाचार वर्णन, द्वंद्वों का काव्यीकरण, चारण कविता, --जिसमें विशिष्ट उद्देश्य के साथ साथ व्यक्तिगत लाभ का उद्देश्य भी निहित रहता है | इसमें बुद्धि कौशल प्रधान रहता है |
३.सोद्देश्य कविता ---
अ. लघु सूत्री उद्देश्य –में साहित्यकार अपने तत्कालीन आपद्धर्म, नागरिक-धर्म का निर्वाह करता है | वीररस, सुनामी, युद्धकालमें, जन समस्यायों को जन ( जनता), गण (शासक वर्ग ) व मन (व्यक्तित्वों, विशिष्ट-नागरिकों, विशिष्ट तबकों, प्रोफेशनल्स, युवाओं, छात्रों,, वालकों, वृद्धों, स्त्रियों आदि के सम्मुख रखना|
ब.दीर्घ सूत्रीय उद्देश्य—साहित्य, अर्थात व्यष्टि व समष्टि के व्यापक हित में –चरित्र, आचरण, व्यवहार, मानवता, नीति,पुराकाव्य व चरित्रों का युगानुरूप पुनः निरूपण | साहित्य व समाज के समय रूपी दर्पण पर जमी हुई धूल को हटाना एवं समस्या के साथ साथ समाधान का मार्ग दिखाना | यही साहित्य वस्तुतः वास्तविक, कालजयी एवं समाज व स्वयं साहित्य का दिशा निर्देशक होता है | इस प्रकार के साहित्य ह्रदय, बुद्धि, ज्ञान, व अनुभव से संपन्न होते हैं |

                  अतः साहित्य का वास्तविक अर्थ ‘सा हिताय य ‘...अर्थात जो समाज के व्यापक हित में है | यही साहित्यकार का मूल दायित्व है कि ह्रदय, बुद्धि, ज्ञान व अनुभव के समन्वय से व्यष्टि व समष्टि के व्यापक हितार्थ सोद्देश्य रचना के साथ साथ समाधान निरूपण से समाज व स्वयं साहित्य को गति व दिशा प्रदान करना|

                 संक्षिप्त में –सोद्देश्य साहित्य रचना, भाषा व स्वयं साहित्य की उन्नति, गति व दिशा प्रदान, अव्यवस्थाओं- व्यवस्थाओं पर इंगित तथा समाधान की दिशा | जो संस्थागत साहित्यकार हैं –यथा- पत्रकार, राज्यकर्मचारी संस्थान, हिन्दी संस्थान, जन संस्थान, प्रकाशक, स्वयं सेवी संस्थाएं, आदि को नियमित रूप से साहित्यिक रचनाओं का प्रकाशन व उचित प्रचार व सम्मान आदि की प्रक्रियाएं अपनानी चाहिए |

              स्वयं साहित्य व भाषा की उन्नति व अनुगामिता भी साहित्यकारों का एक महत्वपूर्ण दायित्व है | गुटबाजी, विधा-विद्वेष आदि त्यागकर विभिन्न विधाओं व नवीनताओं के स्वागत से साहित्य को गति मिलती है | यथा- वैदिक संस्कृत के साथ-साथ महर्षि वाल्मीकि ने लौकिक संस्कृत, गोस्वामी तुलसीदास ने भाखा-हिन्दी, निराला ने अतुकांत कविता व डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने संक्षिप्तता को लेकर अगीत-कविता की स्थापना की, जिससे साहित्य की क्रमिक गतिशीलता बनी रही |

               आज साहित्य के प्रदूषण का एक विस्तृत फलक देखने में आरहा है | निकृष्ट, अश्लील, अंधविश्वास सृजक, शास्त्र, राष्ट्र, देश, धर्म के निंदक, इतिहास को झुठलाने वाले व भ्रश्ताकारक साहित्य व साहित्यकारों का निषेध भी साहित्यकारों का दायित्व है | कौन बुरा बने जैसी धारणा त्यागनी होगी|

                     अनैतिकता में लिप्त मानव ही समस्त बुराइयों की जड़ होता है | अतः सत्साहित्य रचना व व्यक्ति, समाज , संस्कृति, देश के आचरण सुधार सोद्देश्य साहित्य का मूल दायित्व होना चाहिए| साहित्यकार ही सदैव समाज का प्रचेता रहा है, तभी तो शास्त्रकार कहता है “ अग्ने नय सुपथा राये...(यजु.५/२६/.२० ) –हे अग्नि ( ईश्वर, तेजस्वी विद्वान्, विचार, साहित्यकार, समन्वयवादी ..) हमें सन्मार्ग की और लेचलें | यह विचार –क्रान्ति के वाहक की भूमिका है जो साहित्यकार को निभानी चाहिए |

                   अंत में साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश, राष्ट्र में कर्तव्यबोध, सदाचरण, नैतिकता, राष्ट्रीयता आदि उदात्त भावनाओं को जगाने में समर्थ है | निश्चय ही यह साहित्यकारों का दायित्व है और आज के भौतिकवादी युग की आवश्यकता |

----डा श्याम गुप्त
सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२, मो.९४१५१५६४६४

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