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शनिवार, 4 मार्च 2017

गुरुवासरीयव गोष्ठी दि.२-३-१७ को डा श्याम गुप्त के आवास पर ----डा श्याम गुप्त


गुरुवासरीयव गोष्ठी दि.२-३-१७ को डा श्याम गुप्त के आवास पर ----डा श्याम गुप्त

                 


गुरुवासरीय गोष्ठी दि.२-३-१७ गुरूवार 

             प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली गुरुवासरीयव गोष्ठी दि.२-३-१७ को डा श्याम गुप्त के आवास के-३४८, आशियाना , लखनऊ पर सायं ३ बजे से ६ बजे शाम को आयोजित हुई |

                   गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, डा श्याम गुप्त, श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर , श्रे बिनोद कुमार सिन्हा व सुषमा गुप्ता श्री मनीष श्रीवास्तव, पूजा गुप्ता ने भाग लिया | गोष्ठी का प्रारंभ डा श्याम गुप्त की वाणी वन्दना---

माँ हमारी चेतना में नवल सुर लय धुन सजादो ,
भाव की ऊंची शिखाएं, मन ह्रदय में जगामगा दो |.....से प्रारंभ हुआ| श्रीमती सुषमा गुप्ता , अनिल किशोर निडर एवं बिनोद कुमार सिन्हा ने भी वाणी वन्दना की ----

                       चर्चा सत्र में काव्य गोष्ठी के आकार –प्रकार पर संक्षिप्त चर्चा में डा श्याम गुप्त व अनिल किशोर जी का कथन था कि गोष्ठी का आकार अधिक बड़ा नही होना चाहिये अन्यथा उसमें काव्य चर्चा व गुणदोष विवेचन जैसा महत्त्व का विषय नहीं हो पाता, बस कविता पढ़ने के कर्म की इतिश्री ही हो पाती है |
श्री बिनोद कुमार सिन्हा की सद्य –प्रकाशित काव्य संग्रह ‘इन्द्रधनुष-एक प्रयास’ की रचनाओं एवं साहित्यकारों के दायित्व पर संक्षिप्त चर्चा की गयी तथा इस कृति के लोकार्पण की भूमि-रेखा पर विचार किया गया |


        श्री बिनोद कुमार सिन्हा को सम्मान -पत्र, प्रतीक चिन्ह व व पुष्प गुच्छ देकर श्री कुमार विजय सम्मान प्रदान किया गया |

कविता सत्र में ----- श्री अनिल किशोर निडर ने प्रस्तुत किया—

हैं धन्य धन्य भारतवासी, है यहाँ बनी नगरी काशी |
काशी में मिलता परम धाम,भोले का मंदिर है ललाम ||

            श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने दर्द और बेदर्द का समायोजन करते हुए गीताज्ञान, गोविन्द और दर्द का रिश्ता गुनगुनाया ---
लोग कहते मुझे बेदर्द हूँ,/ केवल दर्द हूँ बेदर्द नहीं ;
दो दिलों को मिलाता, / हमदर्द हूँ, दिले दर्द नहीं |
दर पर मेरे जो आता / याद करता गोविन्द को ;
होता ज्ञान सहज में /दुख भोगता शरीर, आत्मा नहीं |
देता हूँ ज्ञान गीता, दर्द नहीं / बिनोद कहते दर्द हूँ बेदर्द नहीं ||

          डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने राम-गिलहरी, रत्ना-तुलसी, राधा-कृष्ण के प्रेम को रंजित करते हुए सुनाया—
दुष्टों के दलन हेतु, जीवन शमन हेतु,
राधे राधे, श्याम श्याम, राधे श्याम कहिये |

             श्रीमती सुषमा गुप्ता ने ---कहा---
मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं
मन का दर्पण है ये , मुस्कुराते रहो |..
.तथा—
होली खेली लाल ने, उड़े अबीर गुलाल,
सुर मुनि ब्रहमा विष्णु सब, तीनों लोक निहाल |

                डा श्याम गुप्त ने ---सुनाया ---
हे मन लेचल सत की ओर,
लोभ मोह लालच न जहां हो, लिपट सके ना माया |
मन की शान्ति मिले जिस पथ पर, प्रेम की शीतल छाया || ...

तथा होली के प्रसंग में—

एरी सखी जियरा के प्रीति रंग ढारि देउ
श्याम रंग न्यारो चढ़े , सांवरो नियारो है |


                          गोष्ठी के अंत में गुरुवारीय गोष्ठी के सदस्य वयोवृद्ध वरिष्ठ कवि स्व.श्री कौशल किशोर श्रीवास्तव को स्मरण किया गया | डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने स्मरण सुनते हुए बताया के श्री कौशल जी चुपचाप मुस्कुराया करते थे तथा कभी कभी किसी विशेष बात पर अड़ भी जाया करते थे| डा श्यामगुप्त ने बताया कि वे अत्यंत स्वाभिमानी एवं परम शिव भक्त थे और गोष्ठी में सदैव एक शिवजी से सम्बंधित रचना एवं एक सम-सामयिक रचना प्रस्तुत करते थे | श्री कौशल किशोर एवं गुजराती नाटकाकार श्री तारक मेहता के निधन पर दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत साहित्यकारों को श्रृद्धांजलि दी गयी |

              -श्री सिन्हा का सम्मान करते हुए डा श्याम गुप्त, डा रंगनाथ मिश्र सत्य , व अनिल किशोर शुक्ल व सुषमा गुप्ता

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