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सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

बात गीतों की----- भाग चार --अंतिम क़िस्त---डा श्याम गुप्त


                           
--------- बात गीतों की----- भाग चार --अंतिम क़िस्त ------




-------------- आज यदि हम किसी पत्रिका या पत्र या अंतरजाल पत्रिकाओं या अंतरजाल पर चिट्ठों ( ब्लोग्स-आदि ) को उठाकर देखें तो विविध रूप में कविताओं आदि के साथ-साथ गीत अपने विविध रूप रंगों यथा - प्राचीन गीत, आधुनिक गीत, वैयक्तिक गीत, राष्ट्रीय गीत, श्रृंगार गीत, प्रगतिवादी गीत, नवगीत, अगीत, प्रचार गीत, लोक शैली के गीत एवं ग़ज़ल गीत, गीतिका आदि में अपनी छटा विखेरता हुआ मिलता है |
-------------------अंतरिक्ष यात्रियों, वैज्ञानिकों द्वारा बादलों की रंगीनी, नक्षत्रों के सौन्दर्य का रागात्मक वर्णन इसी काव्यानंद, गीत-भाव को प्रदर्शित करता है जिसके बिना मानव जीवन अपंग है |
------अर्थात वैज्ञानिक बुद्धिवाद, गद्य का अपरम्पार प्रयोग भी उल्लास के भावनात्मक क्षणों को नहीं रोक पाता जब मानव मन में नभ में छिटके हुए तारों को, खिले हुए पुष्पों देखकर गीतात्मकता का भाव उत्पन्न होता है |
----- उल्लास का वही क्षण उसे पुष्प के तात्विक विवेचन की शक्ति देता है अन्यथा विश्लेष्य, विश्लेषण व विश्लेषक सभी इतने यांत्रिक होजायं कि मानव मन उसे समन्वित ही न कर पाय |
------गीत में भाव, शब्द, तन्मयता आदि विशेषताएं भिन्न भिन्न होते हुए भी एक लय से जुडी रहती हैं | गीत के प्रति आकर्षण के मूल में संभवतया यही सहज सम्प्रेषणीयता है |
------------------------यही कारण है कि अनेक अवरोधों के बाद भी गीत आज तक अपनी चमक दिखा रहा है| गीत का श्रृंगार है-शालीनता और संक्षिप्तता | लय आधारित होना अथवा संगीतमय लोकगीतों का ध्रुवपद पर आधारित होना गीत की विशेषता है जो इसे गीत बनाती है| गीत जो मृत्युंजय है, कालजयी है |

---------------------जहां तक पारंपरिक गीतों में एवं श्रृंगार व प्रेम की बात है| गीतों के मूल में पराविद्या की अपार्थिवता, वेदान्त के अद्वैत, लौकिक प्रेम की तीब्रता, कबीर का सांकेतिक द्वैत दाम्पत्य सूत्रभाव एवं निराला का स्नेह का सम्बन्ध समायोजित रहता है |
-------------- आदि-सृष्टि की रचना भी तो उस परमतत्व के आदि-प्रेम भाव, आदि-इच्छा, ईषत इच्छा का सौन्दर्यमय श्रृंगारसिक्त प्राकट्य से उद्भूत प्रकृति-गीत ही है| प्रेम से ही तो पृथ्वी पर जीवन-स्पंदन है, जीवन-क्रंदन है | प्रेम ही वह तत्व है जिससे मानव दिव्य होजाता है| इस दिव्यता का सरित-प्रवाह लोक से होकर ही जाता है जो सहज, सरल एवं ऋजु जीवन मार्ग है, छल कपट अहं का त्याग एवं सरल ह्रदय युत | घनानंद के शब्दों में ---
अति सूधो सनेह कौ मारग है, जहां नैकु सयानप बांक नहीं |
जहां सांचे चलें तजि आपुनपौ, झिझकें कपटी जो निसाँक नहीं ||

-------------------प्रेम व श्रृंगार जीवन का उत्स है सम्पूर्णता है जीवन का संगीत है, जीवन का जीवन है जिसकी आराधना हर गीतकार करता है|
----- प्रीति-स्मृतियाँ कोमलतम व सुन्दरतम अनुभूतियां होती हैं, चाहे बालमन की हों या कैशोर्य की या युवा मन की, सखा-सखी या प्रेमी-प्रेमिका या साथी-संगिनी की|
-----कवि मन तो कभी वृद्ध होता ही नहीं | स्मृतियाँ चाहे पल भर के संयोग की मिलन की हों या विरह की या सतत सान्निध्य की, कवि उनमे विविध विम्ब, कल्पनाएँ उकेर कर रंग भरता है, उन्हें घटनाक्रम देता है|
-------------------गीतों में प्रेम या श्रृंगार, मांसल-सौन्दर्य की व्याख्या नहीं अपितु आत्मिक सौदर्य के निर्मल सरोवर में खिलते हुए शतदल की शोभा को निरखते-परखते-सराहते काव्यानंद रूपी आत्मानंद से परमात्मानंद तक की यात्रा होती है, सत्य-शिव-सुन्दर रूप में काव्य-सृजन का पथ होता है |
------अतःगीतों में मर्यादित श्रृंगार ही श्रृंगार है अन्यथा वह अश्लीलता बन जाता है | प्रेम व श्रृंगारिक रचना सरल, सरस व अर्थ गाम्भीर्य के साथ गहन तत्वार्थ लिए हुए, क्लिष्ट शब्दों-भावों से दूर अभिधात्मक होनी चाहिए|
----- श्रृंगार गीत रचना नारी रूप-सौन्दर्य की भाँति है अर्थात शब्दावली, तथ्य, कथ्य इस प्रकार होने चाहिए कि श्रृंगार का आनंद भी मिले एवं खुलापन भी न रहे| ....यथा महाकवि बिहारी दास के शब्दों में ---
“कवि आखर अरु तिय सेकून, अध उघरे सुख देत,
अधिक ढके तो सुख नहीं, उघरे महा अहेत | “

---------------- उषा का युवती रूप सौन्दर्य, अगस्त्य–लोपामुद्रा, यम-यमी, उर्वशी-पुरुरवा के वैदिक गीतों से वाल्मीकि एवं कालिदास से होते हुए विद्यापति, केशव, विहारी दास, रहीम, तुलसी, सूर, मीरा, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद आदि से गुजरते हुये आधुनिक हिन्दी गीत में प्रेम के संयोग व वियोग के सभी भावों–पक्षों के गीतों एवं श्रृंगार रचनाओं-गीतों की लम्बी परम्परा है | ऋग्वेद में ऋषि वामदेव का कथ्य श्रृंगार का अनुपम उदाहरण है –
“कन्येव तन्वा शाश्दानां ऐषि देवि देवप्रिय क्षमांणम |
संस्मयमाना युवतिः पुरस्तादार्विवक्षांसि कृणुते विभाति |

---- वह (उषा देवि) कमनीय कन्या के समान सज्जित वेश में देवों के प्रिय देव, अभिमत फलदाता सूर्य के निकट जाती है और यह मंद मंद मुस्कुराती हुई युवती उसके समक्ष अपने वक्ष प्रदेश को अनावृत्त कर देती है |

---------------- प्रेम के दो अक्षर अथवा कबीर की भाषा में ढाई आखर अपने अन्दर से असीम प्रभा उद्भासित करते हैं और श्रृंगार उस प्रभा की लौकिक अभिव्यक्ति है जो सर्वाधिक प्रभावी ढंग से गीतों में उद्भूत होती है | प्रेमगीत- जिसे हर अणु, जड़, जंगम या जीव, हर मानव ह्रदय गुनुगुनाता है | बस कवि उन्हें कागज़ पर उतारने का प्रयत्न करता है |
                                            -------इति-------- बात गीतों की -----


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