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शनिवार, 26 जुलाई 2014

कारण कार्य व प्रभाव गीत ....कितने भाव मुखर हो उठते ..डा श्याम गुप्त...



कारण कार्य व प्रभाव गीत ----मेरे द्वारा नव-सृजित .....इस छः पंक्तियों के प्रत्येक पद या बंद के गीत में प्रथम दो पंक्तियों में मूल विषय-भाव के कार्य या कारण को दिया जाता है तत्पश्चात अन्य चार पंक्तियों में उसके प्रभाव का वर्णन किया जाता है | अंतिम पंक्ति प्रत्येक बंद में वही रहती है गीत की टेक की भांति | गीत के पदों या बन्दों की संख्या का कोई बंधन नहीं होता | प्रायः गीत के उसी मूल-भाव-कथ्य को विभिन्न बन्दों में पृथक-पृथक रस-निष्पत्ति द्वारा वर्णित किया जा सकता है | एक उदाहरण प्रस्तुत है –---


   कितने भाव मुखर हो उठते .....


ज्ञान दीप जब मन में जलता,

अंतस जगमग होजाता है |

            मिट जाता अज्ञान तमस सब,

            तन-मन ज्ञान दीप्त हो जाते |

            नव-विचार युत, नव-कृतित्व के,

            कितने भाव मुखर हो उठते ||



प्रीति-भाव जब अंतस उभरे,

द्वेष-द्वंद्व सब मिट जाता है |

           मधुभावों से पूर्ण ह्रदय हो,

           जीवन मधुघट भर जाता है |

           प्रेमिल तन-मन आनंद-रस के,

           कितने भाव मुखर हो उठते ||



मदमाती यौवन बेला में,

कोइ ह्रदय लूट लेजाता |

          आशा हर्ष अजाने भय युत,

           उर उमंग उल्लास उमड़ते |

           इन्द्रधनुष से विविध रंग के,

           कितने भाव मुखर हो उठते ||



सत्य न्याय अनुशासन महिमा,

जब जन-मन को भा जाती है |

          देश-भक्ति हो, मानव सेवा,

          युद्ध-भूमि हो, कर्म-क्षेत्र हो |

          राष्ट्र-धर्म पर मर मिटने के,

          कितने भाव मुखर हो उठते ||
                                        

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (27-07-2014) को "संघर्ष का कथानक:जीवन का उद्देश्य" (चर्चा मंच-1687) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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