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रविवार, 20 जुलाई 2014

कर्मफल !








जानता हूँ मैं ,पाप-पुण्य नाम से ,जग में कुछ नहीं है |
कर्म तो कर्म है ,कर्म-फल नर, इसी जग में भोगता है |
कर्मक्षेत्र यही है, ज़मीं भी यही है, कोई नहीं अंतर ,
उद्यमी अपने उद्यम से ,बनाते हैं बंजर ज़मीं को उर्बर |
निरुत्सुक,निकम्मा ,आलसी सोते रहते हैं दिवस रजनी ,
बाज़ीगर-तगदीर खेलती है उन से आँख मिचौनी |
वही है धन संपत्ति का अधिकारी,जो है कर्मवीर,
आलसी होते हैं कँगाल,पर होते है वाक् –वीर |
कर्मवीर ने काम किया ,जिंदगी में आमिरी भोगा ,
उसने आमिरी भोगकर कोई पुण्य नहीं कमाया |
आलसी ने कुछ काम नहीं किया ,गरीबी झेला
गरीबी झेलकर उसने कोई  पाप नहीं किया |  
अपने अपने कर्मफल चखकर दोनों ने भरपूर जिया
मिथ्या पाप-पुण्य का अर्थ को निरर्थक प्रमाण किया |
साधू सन्त देते हैं परिभाषा कल्पित पाप-पुण्य का
वही करते हैं दुष्कर्म,भोगते हैं फल अपने दुष्कर्मों का |
कर्मफल को पाप- पुण्य का नाम देकर
खुद करते हैं हर कर्म, जनता को भ्रमित कर |
कर्म जो किसी को दुखी करे ,कहा उसको पाप
ख़ुशी देनेवाले कर्म हो जाते हैं पुण्य, निष्पाप |
पाप की चिंता छोडो ,पर-कष्टदायी कर्म से डरो
पुण्य की बात भूलो ,कुछ जन कल्याण करो |

कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (22-07-2014) को "दौड़ने के लिये दौड़ रहा" {चर्चामंच - 1682} पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं