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शनिवार, 4 मार्च 2017

४६ वें साहित्यकार दिवस, का आयोजन----- डा श्याम गुप्त

४६ वें साहित्यकार दिवस, का आयोजन-----
-----डा रंगनाथ मिश्र सत्य के जन्म की ७६वीं वर्षगाँठ एवं ४६ वें साहित्यकार दिवस, १ मार्च, २०१७ --सिटी कोंवेंट स्कूल राजाजीपुरम के हाल में डा रसाल स्मृति संस्थान एवं अ.भा. अगीत परिषद् द्वारा आयोजित किया गया, इस अवसर पर देश के साहित्यकारों का सम्मान किया गया एवं पुस्तकों का लोकार्पण भी संपन्न हुआ |
आयोजन के अध्यक्ष पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री महेशचंद्र द्विवेदी , मुख्य अतिथि प्रोफ मोह. मुजम्मिल उपकुलपति आगरा वि.विद्यालय , विशिष्ट अतिथि डा उषा सिन्हा पूर्व भाषाविद हिन्दी विभाग , ल.वि वि तथा योजना आयोग के पूर्व सदस्य डा सुल्तान शाकिर हाशमी एवं श्री रामचंद्र शुक्ल पूर्व जज थे | संचालन नव सृजन संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त ने किया , वाणी वन्दना श्री वाहिद अली वाहिद एवं कुमार तरल द्वारा की गयी |
दूसरे सत्र में कवि सम्मलेन का आयोजन भी हुआ |

१.श्रीमती सुषमा गुप्ता द्वारा डा उषा सिन्हा को माल्यार्पण
२.डा सत्य को साहित्य मार्तंड सम्मान
३.डा श्याम गुप्त को डा रसाल स्मृति पुरस्कार
4. मुरली मनोहर कपूर की कृति मेरी रुबाइयां का लोकार्पण
५..नव सृजन संस्थाके महामंत्री श्री देवेश द्विवेदी देवेश को श्री जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता सम्मान -२०१७ से सम्मानित करते हुए डा श्याम गुप्त व सुषमा गुप्ता
६. सम्मानित साहित्यकार
७..श्रीमती सुषमा गुप्ता को सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान
८.डॉ योगेश गुप्त को रवीन्द्र शुक्ल सम्मान
९. नवोदित कवयित्री प्रेरणा श्रीवास्तव की कृति-मेरी प्रिय कवितायें- का लोकार्पण

गुरुवासरीयव गोष्ठी दि.२-३-१७ को डा श्याम गुप्त के आवास पर ----डा श्याम गुप्त


गुरुवासरीयव गोष्ठी दि.२-३-१७ को डा श्याम गुप्त के आवास पर ----डा श्याम गुप्त

                 


गुरुवासरीय गोष्ठी दि.२-३-१७ गुरूवार 

             प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली गुरुवासरीयव गोष्ठी दि.२-३-१७ को डा श्याम गुप्त के आवास के-३४८, आशियाना , लखनऊ पर सायं ३ बजे से ६ बजे शाम को आयोजित हुई |

                   गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, डा श्याम गुप्त, श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर , श्रे बिनोद कुमार सिन्हा व सुषमा गुप्ता श्री मनीष श्रीवास्तव, पूजा गुप्ता ने भाग लिया | गोष्ठी का प्रारंभ डा श्याम गुप्त की वाणी वन्दना---

माँ हमारी चेतना में नवल सुर लय धुन सजादो ,
भाव की ऊंची शिखाएं, मन ह्रदय में जगामगा दो |.....से प्रारंभ हुआ| श्रीमती सुषमा गुप्ता , अनिल किशोर निडर एवं बिनोद कुमार सिन्हा ने भी वाणी वन्दना की ----

                       चर्चा सत्र में काव्य गोष्ठी के आकार –प्रकार पर संक्षिप्त चर्चा में डा श्याम गुप्त व अनिल किशोर जी का कथन था कि गोष्ठी का आकार अधिक बड़ा नही होना चाहिये अन्यथा उसमें काव्य चर्चा व गुणदोष विवेचन जैसा महत्त्व का विषय नहीं हो पाता, बस कविता पढ़ने के कर्म की इतिश्री ही हो पाती है |
श्री बिनोद कुमार सिन्हा की सद्य –प्रकाशित काव्य संग्रह ‘इन्द्रधनुष-एक प्रयास’ की रचनाओं एवं साहित्यकारों के दायित्व पर संक्षिप्त चर्चा की गयी तथा इस कृति के लोकार्पण की भूमि-रेखा पर विचार किया गया |


        श्री बिनोद कुमार सिन्हा को सम्मान -पत्र, प्रतीक चिन्ह व व पुष्प गुच्छ देकर श्री कुमार विजय सम्मान प्रदान किया गया |

कविता सत्र में ----- श्री अनिल किशोर निडर ने प्रस्तुत किया—

हैं धन्य धन्य भारतवासी, है यहाँ बनी नगरी काशी |
काशी में मिलता परम धाम,भोले का मंदिर है ललाम ||

            श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने दर्द और बेदर्द का समायोजन करते हुए गीताज्ञान, गोविन्द और दर्द का रिश्ता गुनगुनाया ---
लोग कहते मुझे बेदर्द हूँ,/ केवल दर्द हूँ बेदर्द नहीं ;
दो दिलों को मिलाता, / हमदर्द हूँ, दिले दर्द नहीं |
दर पर मेरे जो आता / याद करता गोविन्द को ;
होता ज्ञान सहज में /दुख भोगता शरीर, आत्मा नहीं |
देता हूँ ज्ञान गीता, दर्द नहीं / बिनोद कहते दर्द हूँ बेदर्द नहीं ||

          डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने राम-गिलहरी, रत्ना-तुलसी, राधा-कृष्ण के प्रेम को रंजित करते हुए सुनाया—
दुष्टों के दलन हेतु, जीवन शमन हेतु,
राधे राधे, श्याम श्याम, राधे श्याम कहिये |

             श्रीमती सुषमा गुप्ता ने ---कहा---
मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं
मन का दर्पण है ये , मुस्कुराते रहो |..
.तथा—
होली खेली लाल ने, उड़े अबीर गुलाल,
सुर मुनि ब्रहमा विष्णु सब, तीनों लोक निहाल |

                डा श्याम गुप्त ने ---सुनाया ---
हे मन लेचल सत की ओर,
लोभ मोह लालच न जहां हो, लिपट सके ना माया |
मन की शान्ति मिले जिस पथ पर, प्रेम की शीतल छाया || ...

तथा होली के प्रसंग में—

एरी सखी जियरा के प्रीति रंग ढारि देउ
श्याम रंग न्यारो चढ़े , सांवरो नियारो है |


                          गोष्ठी के अंत में गुरुवारीय गोष्ठी के सदस्य वयोवृद्ध वरिष्ठ कवि स्व.श्री कौशल किशोर श्रीवास्तव को स्मरण किया गया | डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने स्मरण सुनते हुए बताया के श्री कौशल जी चुपचाप मुस्कुराया करते थे तथा कभी कभी किसी विशेष बात पर अड़ भी जाया करते थे| डा श्यामगुप्त ने बताया कि वे अत्यंत स्वाभिमानी एवं परम शिव भक्त थे और गोष्ठी में सदैव एक शिवजी से सम्बंधित रचना एवं एक सम-सामयिक रचना प्रस्तुत करते थे | श्री कौशल किशोर एवं गुजराती नाटकाकार श्री तारक मेहता के निधन पर दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत साहित्यकारों को श्रृद्धांजलि दी गयी |

              -श्री सिन्हा का सम्मान करते हुए डा श्याम गुप्त, डा रंगनाथ मिश्र सत्य , व अनिल किशोर शुक्ल व सुषमा गुप्ता

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स्त्रियों के वस्त्र व पुरुष की सोच-----डा श्याम गुप्त




प्रायः यह कहा जाता है कि कपडे पहनने की बात लोग स्त्रियों पर छोड़दें, हमारी इच्छा , पुरुष अपनी सोच बदलें ----परन्तु प्रत्येक कार्य का एक तार्किक कारण होता है न---- निम्न चित्र देखें जहां तीन पुरुष सम्पूर्ण कपडे पहने हुए हैं तो उपस्थित महिला अध् नंगे वस्त्रों में क्यों है --- क्या किसी को इसमें कोई तर्क या यथोचित उत्तर नज़र आता है |

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बुधवार, 1 मार्च 2017

वर्त्तमान सन्दर्भ में साहित्यकारों के दायित्व-- (डा श्याम गुप्त )


                 

             ४६ वें साहित्यकार दिवस, १ मार्च, २०१७ पर प्रस्तुत किया गया आलेख----

            वर्त्तमान सन्दर्भ में साहित्यकारों के दायित्व-- (डा श्याम गुप्त )


                  साहित्य व साहित्यकार सामाजिक प्रचेतना के वर्ग में अग्रगण्य स्थान रखते हैं| उनका मूल दायित्व है कि प्रत्येक प्रकार के अनुशासन, उदात्त भावों व चरित्रों का पुनः पुनः स्मरण एवं समाज में स्थित वर्त्तमान बुराइयों, नैतिक व चारित्रिक पतन आदि के दिग्दर्शन के साथ उनका समुचित समाधान भी प्रस्तुत करें | संस्कारहीनता एवं आचरण-भ्रष्टता के आज के युग में यह दायित्व और भी अधिक महत्वपूर्ण होजाता है |
यदि हम साहित्य क्या है एवं स्वयं साहित्य का क्या उद्देश्य है को रेखांकित करें तो साहित्यकार का उद्देश्य स्वयं ही स्पष्ट होजाता है | मूलतः किसी भी साहित्यिक रचना के निम्न अभिप्रायः होते हैं ----

१. आत्म-रंजनार्थ –साहित्यकार या कृतिकार स्वांत सुखाय बात कहता है और वही अन्य-रंजनार्थ व जन-रंजनार्थ भी होजाती है | यथा भजन, कीर्तन, वंदन, प्रेम गीत, अध्यात्म, प्रकृति वर्णन, सामान्य दैनिक वर्ण्य विषय, आदि | इसमें मूलतः ह्रदय के भावों का उत्स के साथ साथ बुद्धि विलास भी प्रधान रहता है |
२.जन जन रंजनार्थ ---सामयिक वर्णन, समाचार वर्णन, द्वंद्वों का काव्यीकरण, चारण कविता, --जिसमें विशिष्ट उद्देश्य के साथ साथ व्यक्तिगत लाभ का उद्देश्य भी निहित रहता है | इसमें बुद्धि कौशल प्रधान रहता है |
३.सोद्देश्य कविता ---
अ. लघु सूत्री उद्देश्य –में साहित्यकार अपने तत्कालीन आपद्धर्म, नागरिक-धर्म का निर्वाह करता है | वीररस, सुनामी, युद्धकालमें, जन समस्यायों को जन ( जनता), गण (शासक वर्ग ) व मन (व्यक्तित्वों, विशिष्ट-नागरिकों, विशिष्ट तबकों, प्रोफेशनल्स, युवाओं, छात्रों,, वालकों, वृद्धों, स्त्रियों आदि के सम्मुख रखना|
ब.दीर्घ सूत्रीय उद्देश्य—साहित्य, अर्थात व्यष्टि व समष्टि के व्यापक हित में –चरित्र, आचरण, व्यवहार, मानवता, नीति,पुराकाव्य व चरित्रों का युगानुरूप पुनः निरूपण | साहित्य व समाज के समय रूपी दर्पण पर जमी हुई धूल को हटाना एवं समस्या के साथ साथ समाधान का मार्ग दिखाना | यही साहित्य वस्तुतः वास्तविक, कालजयी एवं समाज व स्वयं साहित्य का दिशा निर्देशक होता है | इस प्रकार के साहित्य ह्रदय, बुद्धि, ज्ञान, व अनुभव से संपन्न होते हैं |

                  अतः साहित्य का वास्तविक अर्थ ‘सा हिताय य ‘...अर्थात जो समाज के व्यापक हित में है | यही साहित्यकार का मूल दायित्व है कि ह्रदय, बुद्धि, ज्ञान व अनुभव के समन्वय से व्यष्टि व समष्टि के व्यापक हितार्थ सोद्देश्य रचना के साथ साथ समाधान निरूपण से समाज व स्वयं साहित्य को गति व दिशा प्रदान करना|

                 संक्षिप्त में –सोद्देश्य साहित्य रचना, भाषा व स्वयं साहित्य की उन्नति, गति व दिशा प्रदान, अव्यवस्थाओं- व्यवस्थाओं पर इंगित तथा समाधान की दिशा | जो संस्थागत साहित्यकार हैं –यथा- पत्रकार, राज्यकर्मचारी संस्थान, हिन्दी संस्थान, जन संस्थान, प्रकाशक, स्वयं सेवी संस्थाएं, आदि को नियमित रूप से साहित्यिक रचनाओं का प्रकाशन व उचित प्रचार व सम्मान आदि की प्रक्रियाएं अपनानी चाहिए |

              स्वयं साहित्य व भाषा की उन्नति व अनुगामिता भी साहित्यकारों का एक महत्वपूर्ण दायित्व है | गुटबाजी, विधा-विद्वेष आदि त्यागकर विभिन्न विधाओं व नवीनताओं के स्वागत से साहित्य को गति मिलती है | यथा- वैदिक संस्कृत के साथ-साथ महर्षि वाल्मीकि ने लौकिक संस्कृत, गोस्वामी तुलसीदास ने भाखा-हिन्दी, निराला ने अतुकांत कविता व डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने संक्षिप्तता को लेकर अगीत-कविता की स्थापना की, जिससे साहित्य की क्रमिक गतिशीलता बनी रही |

               आज साहित्य के प्रदूषण का एक विस्तृत फलक देखने में आरहा है | निकृष्ट, अश्लील, अंधविश्वास सृजक, शास्त्र, राष्ट्र, देश, धर्म के निंदक, इतिहास को झुठलाने वाले व भ्रश्ताकारक साहित्य व साहित्यकारों का निषेध भी साहित्यकारों का दायित्व है | कौन बुरा बने जैसी धारणा त्यागनी होगी|

                     अनैतिकता में लिप्त मानव ही समस्त बुराइयों की जड़ होता है | अतः सत्साहित्य रचना व व्यक्ति, समाज , संस्कृति, देश के आचरण सुधार सोद्देश्य साहित्य का मूल दायित्व होना चाहिए| साहित्यकार ही सदैव समाज का प्रचेता रहा है, तभी तो शास्त्रकार कहता है “ अग्ने नय सुपथा राये...(यजु.५/२६/.२० ) –हे अग्नि ( ईश्वर, तेजस्वी विद्वान्, विचार, साहित्यकार, समन्वयवादी ..) हमें सन्मार्ग की और लेचलें | यह विचार –क्रान्ति के वाहक की भूमिका है जो साहित्यकार को निभानी चाहिए |

                   अंत में साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश, राष्ट्र में कर्तव्यबोध, सदाचरण, नैतिकता, राष्ट्रीयता आदि उदात्त भावनाओं को जगाने में समर्थ है | निश्चय ही यह साहित्यकारों का दायित्व है और आज के भौतिकवादी युग की आवश्यकता |

----डा श्याम गुप्त
सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२, मो.९४१५१५६४६४

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

बात गीतों की----- भाग चार --अंतिम क़िस्त---डा श्याम गुप्त


                           
--------- बात गीतों की----- भाग चार --अंतिम क़िस्त ------




-------------- आज यदि हम किसी पत्रिका या पत्र या अंतरजाल पत्रिकाओं या अंतरजाल पर चिट्ठों ( ब्लोग्स-आदि ) को उठाकर देखें तो विविध रूप में कविताओं आदि के साथ-साथ गीत अपने विविध रूप रंगों यथा - प्राचीन गीत, आधुनिक गीत, वैयक्तिक गीत, राष्ट्रीय गीत, श्रृंगार गीत, प्रगतिवादी गीत, नवगीत, अगीत, प्रचार गीत, लोक शैली के गीत एवं ग़ज़ल गीत, गीतिका आदि में अपनी छटा विखेरता हुआ मिलता है |
-------------------अंतरिक्ष यात्रियों, वैज्ञानिकों द्वारा बादलों की रंगीनी, नक्षत्रों के सौन्दर्य का रागात्मक वर्णन इसी काव्यानंद, गीत-भाव को प्रदर्शित करता है जिसके बिना मानव जीवन अपंग है |
------अर्थात वैज्ञानिक बुद्धिवाद, गद्य का अपरम्पार प्रयोग भी उल्लास के भावनात्मक क्षणों को नहीं रोक पाता जब मानव मन में नभ में छिटके हुए तारों को, खिले हुए पुष्पों देखकर गीतात्मकता का भाव उत्पन्न होता है |
----- उल्लास का वही क्षण उसे पुष्प के तात्विक विवेचन की शक्ति देता है अन्यथा विश्लेष्य, विश्लेषण व विश्लेषक सभी इतने यांत्रिक होजायं कि मानव मन उसे समन्वित ही न कर पाय |
------गीत में भाव, शब्द, तन्मयता आदि विशेषताएं भिन्न भिन्न होते हुए भी एक लय से जुडी रहती हैं | गीत के प्रति आकर्षण के मूल में संभवतया यही सहज सम्प्रेषणीयता है |
------------------------यही कारण है कि अनेक अवरोधों के बाद भी गीत आज तक अपनी चमक दिखा रहा है| गीत का श्रृंगार है-शालीनता और संक्षिप्तता | लय आधारित होना अथवा संगीतमय लोकगीतों का ध्रुवपद पर आधारित होना गीत की विशेषता है जो इसे गीत बनाती है| गीत जो मृत्युंजय है, कालजयी है |

---------------------जहां तक पारंपरिक गीतों में एवं श्रृंगार व प्रेम की बात है| गीतों के मूल में पराविद्या की अपार्थिवता, वेदान्त के अद्वैत, लौकिक प्रेम की तीब्रता, कबीर का सांकेतिक द्वैत दाम्पत्य सूत्रभाव एवं निराला का स्नेह का सम्बन्ध समायोजित रहता है |
-------------- आदि-सृष्टि की रचना भी तो उस परमतत्व के आदि-प्रेम भाव, आदि-इच्छा, ईषत इच्छा का सौन्दर्यमय श्रृंगारसिक्त प्राकट्य से उद्भूत प्रकृति-गीत ही है| प्रेम से ही तो पृथ्वी पर जीवन-स्पंदन है, जीवन-क्रंदन है | प्रेम ही वह तत्व है जिससे मानव दिव्य होजाता है| इस दिव्यता का सरित-प्रवाह लोक से होकर ही जाता है जो सहज, सरल एवं ऋजु जीवन मार्ग है, छल कपट अहं का त्याग एवं सरल ह्रदय युत | घनानंद के शब्दों में ---
अति सूधो सनेह कौ मारग है, जहां नैकु सयानप बांक नहीं |
जहां सांचे चलें तजि आपुनपौ, झिझकें कपटी जो निसाँक नहीं ||

-------------------प्रेम व श्रृंगार जीवन का उत्स है सम्पूर्णता है जीवन का संगीत है, जीवन का जीवन है जिसकी आराधना हर गीतकार करता है|
----- प्रीति-स्मृतियाँ कोमलतम व सुन्दरतम अनुभूतियां होती हैं, चाहे बालमन की हों या कैशोर्य की या युवा मन की, सखा-सखी या प्रेमी-प्रेमिका या साथी-संगिनी की|
-----कवि मन तो कभी वृद्ध होता ही नहीं | स्मृतियाँ चाहे पल भर के संयोग की मिलन की हों या विरह की या सतत सान्निध्य की, कवि उनमे विविध विम्ब, कल्पनाएँ उकेर कर रंग भरता है, उन्हें घटनाक्रम देता है|
-------------------गीतों में प्रेम या श्रृंगार, मांसल-सौन्दर्य की व्याख्या नहीं अपितु आत्मिक सौदर्य के निर्मल सरोवर में खिलते हुए शतदल की शोभा को निरखते-परखते-सराहते काव्यानंद रूपी आत्मानंद से परमात्मानंद तक की यात्रा होती है, सत्य-शिव-सुन्दर रूप में काव्य-सृजन का पथ होता है |
------अतःगीतों में मर्यादित श्रृंगार ही श्रृंगार है अन्यथा वह अश्लीलता बन जाता है | प्रेम व श्रृंगारिक रचना सरल, सरस व अर्थ गाम्भीर्य के साथ गहन तत्वार्थ लिए हुए, क्लिष्ट शब्दों-भावों से दूर अभिधात्मक होनी चाहिए|
----- श्रृंगार गीत रचना नारी रूप-सौन्दर्य की भाँति है अर्थात शब्दावली, तथ्य, कथ्य इस प्रकार होने चाहिए कि श्रृंगार का आनंद भी मिले एवं खुलापन भी न रहे| ....यथा महाकवि बिहारी दास के शब्दों में ---
“कवि आखर अरु तिय सेकून, अध उघरे सुख देत,
अधिक ढके तो सुख नहीं, उघरे महा अहेत | “

---------------- उषा का युवती रूप सौन्दर्य, अगस्त्य–लोपामुद्रा, यम-यमी, उर्वशी-पुरुरवा के वैदिक गीतों से वाल्मीकि एवं कालिदास से होते हुए विद्यापति, केशव, विहारी दास, रहीम, तुलसी, सूर, मीरा, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद आदि से गुजरते हुये आधुनिक हिन्दी गीत में प्रेम के संयोग व वियोग के सभी भावों–पक्षों के गीतों एवं श्रृंगार रचनाओं-गीतों की लम्बी परम्परा है | ऋग्वेद में ऋषि वामदेव का कथ्य श्रृंगार का अनुपम उदाहरण है –
“कन्येव तन्वा शाश्दानां ऐषि देवि देवप्रिय क्षमांणम |
संस्मयमाना युवतिः पुरस्तादार्विवक्षांसि कृणुते विभाति |

---- वह (उषा देवि) कमनीय कन्या के समान सज्जित वेश में देवों के प्रिय देव, अभिमत फलदाता सूर्य के निकट जाती है और यह मंद मंद मुस्कुराती हुई युवती उसके समक्ष अपने वक्ष प्रदेश को अनावृत्त कर देती है |

---------------- प्रेम के दो अक्षर अथवा कबीर की भाषा में ढाई आखर अपने अन्दर से असीम प्रभा उद्भासित करते हैं और श्रृंगार उस प्रभा की लौकिक अभिव्यक्ति है जो सर्वाधिक प्रभावी ढंग से गीतों में उद्भूत होती है | प्रेमगीत- जिसे हर अणु, जड़, जंगम या जीव, हर मानव ह्रदय गुनुगुनाता है | बस कवि उन्हें कागज़ पर उतारने का प्रयत्न करता है |
                                            -------इति-------- बात गीतों की -----


रविवार, 26 फ़रवरी 2017

प्रेम व श्रृंगार गीत संग्रह ---डा श्याम गुप्त...

मेरी सद्यप्रकाशित प्रेम व श्रृंगार गीत संग्रह---डा श्याम गुप्त ---

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 



                           मेरी सद्यप्रकाशित प्रेम व श्रृंगार गीत संग्रह ----प्रस्तुत कृति में जीवन के विविध भाव-क्षणों में प्रेम एवं श्रृंगार के विभिन्न पक्षों का विविध रूपों में काव्य-भावों के रूप में चित्रण प्रस्तुत किया गया है -----



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मेरी सद्य प्रकाशित आध्यात्मिक कृति--"ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद---डा श्याम गुप्त -----

----------------मेरी सद्य प्रकाशित आध्यात्मिक कृति--"ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद ----इस कृति में ईशोपनिषद जो यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय है जिसमें उपनिषदकार ने १८ मन्त्रों में , मानव आचरण व व्यवहार हेतु भारतीय, वैदिक ज्ञान एवं जीवन व्यवहार के सिद्धांतों का मूल प्रस्तुत कर दिया है, उसका सरल हिन्दी में काव्य भावानुवाद प्रस्तुत किया गया है -----


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 प्रस्तुत है----
ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र ..ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |”
                                                    तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध कस्यविद्धनम "
 के प्रथम भाग..ईशावास्यम इदं सर्वं यद्किंचित जगत्याम जगत |” का काव्य-भावानुवाद......
कुंजिका- इदं सर्वं =यह सब कुछ...यदकिंचित=जो कुछ भी ...जगत्याम= पृथ्वी पर, विश्व में ...जगत= चराचर वस्तु है ...ईशां =ईश्वर से ..वास्यम=आच्छादित है |
मूलार्थ- इस समस्त विश्व में जो कुछ भी चल अचल, जड़,चेतन वस्तु, जीव, प्राणी आदि है सभी ईश्वर के अनुशासन में हैं, उसी की इच्छा /माया से आच्छादित/ बंधे हुए हैं/ चलते हैं|

ईश्वर माया से आच्छादित,
इस जग में जो कुछ अग-जग है |
सब जग में छाया है वह ही,
उस इच्छा से ही यह सब है |

ईश्वर में सब जग की छाया,
यह जग ही है ईश्वर-माया |
प्रभु जग में और जग ही प्रभुता,
जो समझा सोई प्रभु पाया |

अंतर्मन में प्रभु को बसाए,
सबकुछ प्रभु का जान जो पाए |
मेरा कुछ भी नहीं यहाँ पर,
बस परमार्थ भाव मन भाये |

तेरी इच्छा के वश है नर,
दुनिया का यह जगत पसारा |
तेरी सद-इच्छा ईश्वर बन ,
रच जाती शुभ-शुचि जग सारा |

भक्तियोग का मार्ग यही है ,
श्रृद्धा भाक्ति आस्था भाये |
कुछ नहिं मेरा, सब सब जग का,
समष्टिहित निज कर्म सजाये |

अहंभाव सिर नहीं उठाये,
मन निर्मल दर्पण होजाता|
प्रभु इच्छा ही मेरी इच्छा,
सहज-भक्ति नर कर्म सजाता ||

 

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