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शनिवार, 14 सितंबर 2013



हिंदी पर तीन मुक्तक 

मातृभाषा पर जिसे,अपनी न स्वाभिमान है |
राष्ट्रभाषा के प्रति, रखता नहीं अधिमान  है |
पूर्ण पशुवत है जिसे,ना शीर्ष पर हो राष्ट्रहित ,
सम्पदामय हो भले, निकृष्ट का प्रतिमान है |
        --
करेगी  देश  को  जगमग ,  मुझे  विश्वास  हिन्दी  का |
है उत्सव के लिये निश्चित सितम्बर मास हिन्दी का |
हर एक चौद्ह सितम्बर को,मनाते हैं हम    'हिन्दी डे'-
इसी दिन कर दिया करते हैं,   तर्पण खास हिन्दी  का |
        --
उन्नत ललाट पर चमक रही,भारत माता की बिन्दी है |
है ब्रह्मपुत्र सम हिमनद यह,सतलुज,सरयू,कालिन्दी है |         
जो आकर मिला पवित्र हुआ,है पतित-पावनी मां जैसी,
वर्तनी सरलभाषा  सीधी, निर्मल गंगा सम हिन्दी है |
      --        

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

एक मुक्तक आपके दरबार में

 
सुप्रभात मित्रों
पत्नी को समर्पित एक मुक्तक आपके दरबार में-
- 0 -
पूर्ण चन्द्र सम अनुपम आनन, कुन्दन रंग समाया है |
टपक रहा है अमिय अधर से,नैनन मृगमद छाया है |
पोर - पोर से टपक रही है, नव-यौवन रस-धार प्रिय,
रक्त-वर्ण  ज्यों मिला दुग्ध में,  विधि ने तुम्हें बनाया है |
--डा.राज सक्सेना
purn chndr sm anupm aann, kundn rng smaya hai.
tpk rha hai amiy adhr se, nainn mrgmd chhaya hai.
por-por se tpk rhi hai, nv-yauvn rs-dhar priy,
rkt-vrn jyoN mila dugdh meN, rch hr ang bnaya hai.
-Dr.Raaj Saksena

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

ग़ज़लों पे जवानी आई


मंगलमय हो पूर्ण दिन, स्वर्ण कमल सम आज |
शांतिपूर्ण क्षण-क्षण रहेसुखमय  रहे समाज |
दुनिया के ऐश्वर्य कीमिले   आप   को   भेंट,
यही प्रार्थना-कामनाकरता  प्रभु  से  'राज' |
                          -0-                               
मुद्दतों लफ़्ज़ पिरोए तो,नई जान रवानी आई |
रौनक़- -अशआर, शफ़क़-शान सुहानी आई |
बीत जब 'राज' गया, दौरे-अमल का मौसम,
ढल  गई  उम्र  तोग़ज़लों  पे  जवानी  आई |

बुधवार, 11 सितंबर 2013

"अच्छी नहीं लगतीं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


वफा और प्यार की बातें, किसे अच्छी नहीं लगतीं। 

तपन के बाद बरसातें, किसे अच्छी नहीं लगतीं। 
मिलन होता जहाँ बिछड़ी हुई, कुछ आत्माओं का,  
चमकती वो हसीं रातें, किसे अच्छी नहीं लगतीं।। 

गुलो-गुलशन की बरबादी, हमें अच्छी नहीं लगती।
वतन की बढ़ती आबादी, हमें अच्छी नहीं लगती। 
जुल्म का सामना करने को, जिसको ढाल माना था-
सितम करती वही खादी, हमें अच्छी नहीं लगती।।

विचित्र कथ्य-भावों की एक ग़ज़ल 'आईना' पर ..एक रुबाई एवं ग़ज़ल ....डा श्याम गुप्त....



--- कुंवर बेचैन की एक उल-जुलूल ग़ज़ल 'आईना' पर ..एक रुबाई एवं ग़ज़ल ...

          रुबाई...


किसने कहा कि भाग्य-विधाता है आईना |
चांदी की पीठ हो तभी बनता है आईना |
है आपकी औकात क्या, वह बोल जाता है -
क्या इसलिए न आपको भाता है आईना | 




     आईना –ग़ज़ल...

किसने कहा कि भाग्य-विधाता है आईना |
चांदी की पीठ हो तभी बनता है आईना |

ईमान-धर्म है जहां  मिलाते वही हैं हाथ,
ईमां-धरम का अर्थ सिखाता है आईना |

खाकर के चोट आईना टुकड़ों में बंट गया,
फिर भी तो अपना धर्म निभाता है आईना |

है आपकी औकात क्या, वह बोल जाता है -
क्या इसलिए न आपको भाता है आईना |  

शिकवा गिला क्या आईना है बेजुबान श्याम’
खुद आपका ही अक्स दिखाता है आईना |

गुरु वन्दना (रुबाइयाँ )

"रुबाइयाँ "की रूप देने की कोशिश की। अगर आपको लगे कुछ कमी रह गयी है ,कृपया टिप्पणी के रूप में बताएं, आभारी रहूँगा।



मन ,वुद्धि ,विवेक का स्रष्टा हो
ज्ञान विज्ञानं के तुम विधाता हो
ब्रह्मा  रूपेण हो सिरजनहार तुम
शतकोटी प्रणाम तुम्हे , मेरे ज्ञान-गुरु हो।

 २


संसार सागर के खिवैया तुम हो
मेरी डूबती नाव के तुम नाविक हो
कभी इसपार तुम, तो कभी उसपार
विष्णु रूपेण तुम मेरे गुरु पालक  हो। 




अहँकार ,घमंड ,घृणा ,द्वेष ,ईर्षा
काम, क्रोध,लोभ ,मद-मोह ,तृष्णा
मेरे सभी अवगुणों के संहारक हो तुम
हो सत्वगुण रक्षक मेरे गुरु शिवरूपा।

  ४ 


शतकोटि प्रणाम तुम्हे ,तुम ब्रह्मा हो
शतकोटि प्रणाम तुम्हे, तुम विष्णु हो
शतकोटि प्रणाम तुम्हे, हे भोले शंकर!
शतसहस्रकोटि प्रणाम,गुरु तुम परब्रह्म हो। 


कालीपद "प्रसाद "

©   सर्वाधिकार सुरक्षित


मंगलवार, 10 सितंबर 2013

सीने की खातिर आये फिर-रविकर

लाल रसीले होंठों से, आकर फरमान सुनाये फिर । 

नैन नशीले नीले ने, नाहक नुकसान कराये फिर । 

चोट लगाये सीने पे, फट गया कलेजा चूर हुआ-

हाथ हठीले धागा ले, सीने की खातिर आये फिर ॥ 

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