यह ब्लॉग खोजें

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

कुण्डलिया : प्रेम पात सब झर गये


पीपल अब सठिया गया,रहा रात भर खाँस
प्रेम पात सब झर गये , चढ़-चढ़ जावै साँस

 
चढ़- चढ़ जावै साँस , कहाँ वह हरियाली है
आँख  मोतियाबिंद , उसी की  अब लाली है


छाँह गहे अब कौन , नहीं रहि छाया शीतल
रहा रात भर खाँस, अब सठिया गया पीपल ||


 
अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर , दुर्ग (छत्तीसगढ़)
विजय नगर , जबलपुर (म.प्र.)

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

एक अनूठे dhउपन्यास 'इंद्रधनुष' की समीक्षा......

डा श्याम गुप्त के अनूठे उपन्यास 'इंद्रधनुष' की समीक्षा..............





डा श्याम गुप्त के उपन्यास 'इंद्रधनुष'  की समीक्षा ......हिन्दी प्रचारक पत्रिका में ....पढ़ें ....


बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

संकल्प



दुर्मिल सवैया ( 8 सगण l l S)

अधिकार मिले अति भाग खिले, नहिं दम्भ दिखे प्रण आज करो
करना  नहिं  शासन  ताकत से , दिल पे  दिल से बस राज करो
कब  कौन  कहाँ  बिछड़े बिसरे , लघु कौन यहाँ ,गुरु कौन यहाँ
उसकी  फुँकनी  सुर  साज  रही , वरना  हर साज त मौन यहाँ ||

प्रण  आज  करो  सब  एक  रहें , नहिं  भेद  रहे  तुझमें  मुझमें
उसके  शुभ  अंश  बँटे  सब में  ,  जल में  थल में  इसमें  उसमें
दिन  चार  मिले  कट तीन गये , बस  एक बचा बरबाद न हो
किस काम क जीवन हाय सखे, यदि जीवन में मधु स्वाद न हो ||

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर, जबलपुर ( मध्य प्रदेश)

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

"एक मुक्तक" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


भारत की महानता कानही है अतीत याद,
वोट माँगने कोनेता आया बिनबुलाया है।
देश का कहाँ है ध्यानहोता नित्य सुरापान,
जातिधर्मप्रान्त जैसेमुद्दों को भुनाया है।
युवराज-सन्त चल पड़ेगली-हाट में,
निर्वाचन के दौर नेये दिन भी दिखाया है।

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

साधू या शैतान

साधू सन्त नाम धारी अनेक
सच्चा होगा शायद हजारों में एक l  
बैठे हैं गेरुआ वस्त्र धारण कर
ढोंग करते हैं भक्त का माला जपकर ll

धरकर वेश साधूसन्त जोगन का  
साधुसंत का नाम बदनाम किया l
गेरुआ, सफ़ेद हो या और वसना
जब उतर गया तो शैतान निकला ll  

तंत्र मंत्र साधने कोई कापालिक बन गया
सिद्धि हेतु मासूम बच्चों का बलि चढ़ाया l
बन बैठा गुरु वो ओड़कर गेरुआ चोले
हंस के रूप में छुपे वो काले कौए निकले ll 

हरि भजन करते करते कर गए नारी भजन
नारी देह के सामने गुरु ने कर दिया समर्पण l
जैसा गुरु वैसा चेला , प्रवचन है ढकोसला
भक्त समागम बना है, व्यभिचारियों का मेला ll

गुरु का एकांत वास ,पर 
उसमे होती है रंगरेलियां
हरि छोड़ ,चेलियों के साथ
गुरु करते है रंगरेलियां ll 

सहमति है तो सोने में सुहागा
असहमति में तो यह बलात्कार है l
किन्तु सन्त ,बाबाओं  को उसमें
नहीं लगता है कोई अनाचार है ll

ऐसे गुरु सन्त साधु जोगिनो के
सब के स्वर में होते हैं एकतान l
इनसे भले तो वे लोग है
जग जिनको कहते हैं शैतान ll

कालीपद "प्रसाद"
सर्वाधिकार सुरक्षित

बुधवार, 25 सितंबर 2013

छंद सरसी

छंद सरसी
[16, 11 पर यति, कुल 27 मात्राएँ , पदांत में गुरु लघु]

चाक  निरंतर  रहे  घूमता , कौन  बनाता   देह |
क्षणभंगुर  होती  है  रचना  ,  इससे  कैसा  नेह ||

जीवित करने भरता इसमें ,  अपना नन्हा भाग |
परम पिता का यही अंश है , कर  इससे अनुराग ||

हर पल कितने पात्र बन रहे, अजर-अमर है कौन |
कोलाहल-सा खड़ा  प्रश्न है   , उत्तर लेकिन मौन ||

एक बुलबुला बहते जल का   समझाता है यार |
छल-प्रपंच से बचकर रहना, जीवन के दिन चार ||


अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
शम्भूश्री अपार्टमेंट, विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.)

रविवार, 22 सितंबर 2013

हे निराकार!


                           


हे निराकार निर्गुण ,कहो कहाँ छुपे हो तुम 
ढूंढ़ु कहाँ बतलाओ ,किस रूप में हो तुम 
हर घड़ी बदलते अनन्त  रूप तुम्हारा
कुछ देर ठहरकर ,पहचान अपना कराओ तुम। 

पल पल बदलते रूप तुम्हारा 
पल पल बदलती तुम्हारी सत्ता 
पल पल बदलती तुम्हारी स्थिति 
पलपल बदलती हमारी जिंदगी।


तुम हो सर्वोपरि शिरोमणि सर्वशक्तिशाली 
तुम हो सर्वेश्वर सिरमौर सर्वक्षमताशाली
कृपासिंधु दीनबन्धु तुम हो परोपकारी
तुम हो शीलवन्त सर्वव्यापी सर्वगुणशाली।

कृपालु हो ,दयालु हो  ,हो तुम वनमाली 
गौ पर असीम कृपा तुम्हारा ,करते हो रखवाली 
सखा तुम्हारा समर्पित ,घर तुम्हारा जग सारा 
मुझे बना लो सेवक अपना ,करूँगा तुम्हारी रखवाली।


कालीपद "प्रसाद "

© सर्वाधिकार सुरक्षित
 



फ़ॉलोअर