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शुक्रवार, 23 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट-पांच--डा श्याम गुप्त





भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण 



           आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड  आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है | भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा  इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
       विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
-------पोस्ट पांच----कथन-समाधान १८ से २१ त१क-----


कथन-१८--- पश्चिम बंगाल के उत्तरी इलाके में जलपाईगुड़ी ज़िले में स्थित अलीपुरदुआर के पास माझेरडाबरी चाय बागान में रहने वाली एक जनजाति के लोग दुर्गापूजा के दौरान मातम मनाते हैं। इस दौरान वे न तो नए कपड़े पहनते हैं और न ही घरों से बाहर निकलते हैं, ये लोग असुर हैं और महिषासुर को अपना पूर्वज मानते हैं (BBC HINDI, 2015)उनकी अपनी मान्यताओं में महिषासुर एक नायक हैं और दुर्गा खलनायिका हैं। इसी वजह से पूरा राज्य जब खुशियां मनाने में डूबा होता है तब ये लोग मातम मनाते रहते हैं। इस जनजाति के बच्चे मिट्टी से बने शेर के खिलौनों से खेलते तो हैं, लेकिन उनमें से किसी के कंधे पर सिर नहीं होता। बच्चे शेरों की गर्दन मरोड़ देते हैं। यह दुर्गा की सवारी जो है। कुछ विद्वान तो आर्य आक्रमण सिद्धांत को आधार बनाकर यह भी सिद्ध करते हैं कि आर्यों का दुर्गा का मिथक भी असल में सुमेरियन/मेसोपोटामियन मिथकों से लिया गया है। सुमेरियन लोगों में इनन्नानामक युद्ध और उर्वरता की देवी की मान्यता थी और यह देवी भी सिंह पर सवारी करती थी।--- इसी देवी के मिथक ने इरान, सिन्धु सभ्यता और बाद में अन्य भारतीय महाद्वीप के मिथकों को आकार दिया (Wolpert, 2006)|
समाधान-१८.---परन्तु गोंड साम्राज्य का राज्य चिन्ह हाथी पर सवार शेर का क्या करेंगे, उसकी गर्दन कौन मरोडेगा | वास्तव में उलटा सोच जा रहा है .....ये कथाएं एवं मिथक यहीं से सारे विश्व में गयीं हैं | जब भारतीयों ने महासमन्वय ( शिव, इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा के नतृत्व में हुआ मानव इतिहास का सर्वप्रथम व सबसे बड़ा समन्वय जिसके बारे में आगे यथास्थान बताया जायगा)  के पश्चात समस्त विश्व पर राज्य किया | हो सकता है कि महिषासुर के कुछ वंशज बचे हों, इससे महिषासुर अच्छा व्यक्ति थोड़े ही होजाता है, वंशज तो आज रावण के भी हैं |
कथन -१९- डॉ. अंबेडकर ने अपनी रिसर्च में ये सवाल खड़े किये हैं कि भारत में देवियों और मातृदेवियों का उभार एक गहन पहेली है जिसके आधार पर इस देश के धर्म-दर्शन के उद्विकास के बहुत सारे पहलू उजागर किये जा सकते हैं।
----इस अर्थ में चट्टोपाध्याय और डॉ. अंबेडकर दोनों ही मातृसत्तात्मक परिवार और समाज व्यवस्था सहित ब्राह्मणी धर्म में देवियों की भूमिका के साथ प्राचीन भारतीय भौतिकवादी परम्पराओं को रखकर देखने का आग्रह कर रहे हैं। चट्टोपाध्याय अपनी अकादमिक रिसर्च से वहां पहुँच रहे हैं और डॉ. अंबेडकर अपनी धर्म-दर्शन और धर्म के समाजशास्त्र को आधार बनाकर उस निष्कर्ष तक आ रहे हैं। बालाघाट के लांजी नामक स्थान में नेताम गोंडी वंश के दुर्ग की खुदाई में भगवान् महावीर,  गणेश और बुद्ध की मूर्तियाँ मिली हैं जिनका सीधा संबंध श्रमण या लोकायत परम्परा से है |
समाधान १९- अर्थात लोकायत परम्परा व प्राचीन आर्य वैदिक परम्परा का मिश्रण-समन्वय  हुआ है क्योंकि श्रमण संस्था भी वैदिक कालीन संस्था है जो वैदिक ऋषि अपनाते थे | गणेश जैन व बौद्ध धर्म के समय की लोकायत या श्रमण संस्था के नहीं हैं, जो इन संस्थाओं ने वैदिक धर्म से अपनाई, अपितु उनसे बहुत अधिक प्राचीन हैं वे वैदिक देव हैं |.. और यह मूर्तियाँ मिलना कोइ पुराकाल का तथ्य नहीं है अपितु नवीन जैन या बौद्ध काल का तथ्य है | अति पुराकाल में मूर्तिकला कहाँ थी |
      कथन २०- गोंडों सहित बैगा, मारिया, भील, ओराव, हलवा आदि जनजातियों में भूमि, वन, जल, पर्वत सहित धरती और स्त्री की उर्वरा शक्ति को सम्मान देने की परम्पराएं एक जैसी हैं। ये लोग अपनी विशेष जीवन शैली लिए जंगलों में सिमटते रहे हैं या सिमटने को मजबूर हुए हैं और इनके परितः शहरी या नागर समाज में भिन्न किस्म की या पित्रसत्तात्मक संस्कृति ने सत्ता स्थापित की है। इस तरह देखें तो दो ही संभावनाएं हैं पहली यह कि या तो मूलनिवासी जनजातियों ने कभी भी नगर नहीं बसाए और खेती नहीं की है और सदैव ही वनवासी जीवन व्यतीत किया है और दूसरी यह कि उन्होंने नागर सभ्यता भी पैदा की लेकिन किसी कारण से कालान्तर में उनकी सभ्यता जंगलों में सिकुड़ते जाने को विवश हो गयी।
     भौतिकवादी, श्रमण, नास्तिक, वेदविरोधी, मूलनिवासी, स्त्रीवादी और अंबेडकरवादी विचारक सब के सब अपने-अपने और अलग-अलग प्रस्थान बिन्दुओं से यात्रा करते हुए भी एक साझे निष्कर्ष तक चले आ रहे हैं। वे सब के सब अनिवार्य रूप से ब्राह्मणवाद को मूल भारतीय भौतिकवादी और मातृसत्तात्मक संस्कृति के खिलाफ खड़ी की गयी प्रतिसंस्कृतिनिरूपित करते हैं।
      इसका सीधा अर्थ ये है कि वर्तमान में जो दलित, मूलनिवासी या स्त्रीवादी आन्दोलन हैं वे जिस संस्कृति का नक्शा बना रहे हैं या खोज कर रहे हैं वही असल में इस देश की प्राचीन और प्रगतिशील संस्कृति थी जिसके खिलाफ षड्यंत्रपूर्वक ब्राह्मणवादी और भाववादी दर्शन पर आधारित प्रतिसंस्कृति खड़ी की गयी थी।
समाधान २०---ये सभी जातियां निश्चय ही हमारी पुरा आदि निवासी जातियां हैं जो सदैव से ही भारत के वनांचल सभ्यता रही हैं | यही सभ्यताएं समय समय पर नागरी सभ्यता में परिवर्तित होती रही हैं | यह ऐसा ही है जैसे आज भी भारत के ग्रामीण क्षेत्र व नागरी क्षेत्र भिन्न भिन्न है उनके रहन-सहन भिन्न भिन्न हैं और समय समय पर ग्रामीण परिवार नगर में आकर बसते रहते हैं तथा दोनों के क्रियाकलाप व्यवहार आदि का मिश्रण-समन्वय होता रहता है |
     निश्चय ही प्रतिसंस्कृति किसी उन्नत संस्कृति के प्रति ही खडी की जाती है, जिसे विनष्ट नहीं किया जा सकता | यह इस देश का, किसी भी देश का इतिहास रहा है, बुरी संस्कृति को तो विनष्ट किया जाता है चाहे वह कितनी भी वलशाली हो, जैसा दैत्यों, असुरों, रावण, कंस, दुर्योधनों आदि शक्तिशाली अप-संस्कृतियों का किया गया |
     इस देश में सदा से ही प्रगतिशील, भाववादी संस्कृति रही है | कथन में वर्णित आन्दोलन जिस संस्कृति की खोज का नक्शा बनारहे हैं यह वही संस्कृति है जो देश की सनातन आदि संस्कृति है जो सदा से वनांचल संस्कृति, ग्रामीण संस्कृति व नागरी संस्कृति का समन्वित रूप है और आज भी वही संस्कृति बहुरंगी रूप में भारत के कोने कोने गाँव गाँव नगर नगर में मौजूद है | जो हमारे त्यौहार, ऋतुएँ, पर्व, रहन-सहन, खान-पान, धार्मिक व्यवहार की सर्वत्र समानताओं से परिलक्षित होता है जिसे अनेकता में एकता कहा जाता है ,जिसे तोड़ने के असफल प्रयत्न किये जारहे हैं|
कथन २१- देवअसुर संग्राम,  ब्राह्मणक्षत्रिय या ब्राह्मणबौद्ध संघर्ष  ----
     प्राचीन कोयवंशीय गोंडों,  असुरों और बौद्धों को एक ही दर्शन के हिस्से के रूप में देखना न केवल तर्कपूर्ण है बल्कि अब आवश्यक भी हुआ जा रहा है। प्राचीन संहिताएँ और मिथक जिन संघर्षों का उल्लेख करते हैं वे बहुत महत्वपूर्ण हैं।....इनसे जुड़े रूपक व् प्रतीक दंतकथाओं और लोक कथाओं के रूप में भारत के बहुत सारे हिस्सों में फैले हुए हैं। इनमे गजब की समानता है और इनके धर्मदर्शन और समाज मनोवैज्ञानिक अनुप्रयोग (इम्प्लीकेशंस) एक जैसे हैं।
         यह समानता यह सिद्ध करती है कि एक आततायी संस्कृति ने किसी प्राचीन संस्कृति के वाहकों  को एक जैसे समाज मनोवैज्ञानिक उपाय से छलपूर्वक नष्ट किया था।
     इस बात का स्पष्ट उल्लेख न सिर्फ महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. अंबेडकर के चिन्तन में मिलता है, बल्कि जनजातीय समाज से आने वाले विद्वानों और धार्मिक नेताओं से भी यही सूत्र प्राप्त होता है। इनमें एक नया और महत्वपूर्ण नाम है डॉ. मोतिरावण कंगाली (1949-2015) का जो गोंड समाज की धार्मिक परम्पराओं और भाषाओं के विद्वान थे।
    भारत के अनेकों राज्यों में एक समान समाज मनोवैज्ञानिक आशय लिए हुए सैकड़ों दन्त कथाएं हैं जिनमें  देवों  और असुरों के संघर्ष का जिक्र आता है। ये संघर्ष असल में ब्राह्मणों और क्षत्रियों का संघर्ष रहा है (Ambedkar,1970)
    स्वयं ऋग्वेद की अनेकों रिचाओं में स्पष्ट संकेत हैं कि आर्य युद्धखोर और मदिरासेवी लोग थे (Ross, 2008) । इन आर्यों के लिए भारत की जलवायु बहुत सुखद और सहायक सिद्ध हुई और वे यहीं रूककर अपना विस्तार करने लगे। स्वाभाविक रूप से अपने साथ अपने पशु हथियार और परम्पराओं के साथ अपनी मान्यताएं और मिथक भी लाये थे (Keith,1925)। इन परम्पराओं और मिथकों ने स्थानीय परम्पराओं और मिथकों के साथ मिलकर बहुत ही चकरा देने वाला कथानक रचा है, जिसे समझ पाना अब संभव हो पा रहा है।
     धर्म दर्शन, साहित्य, इतिहास, मिथक और पुरातत्व सहित भाषा विज्ञान से अब जो सूत्र मिल रहे हैं। वे किसी एक साझे संश्लेषण की तरफ इशारा करते हैं। वह संश्लेषण इस अर्थ में है कि अगर भारतीय राज्यों में अलग-अलग फ़ैली दंतकथाओं लोककथाओं और वाचिक परम्पराओं में फैले सूत्रों को ठीक से देखा जाए तो उनमे एक जैसी प्रवृत्तियाँ हैं। समाज मनोवैज्ञानिक अर्थ में रची गयी वर्जनाओं और पुरस्कारों सहित उनके प्रस्थान बिंदु और उनके लक्ष्य एक जैसे हैं. ---       ये समानता कोयवंशी गोंडों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण नायक संभूशेकसहित बाद में असुरों और बौद्धों के खिलाफ रचे गए मिथकों में एकदम साफ़ नजर आती है।
समाधान २१—जो रूपक व् प्रतीक दंतकथाओं और लोक कथाओं के रूप में भारत के बहुत सारे हिस्सों में फैले हुए हैं। इनमे गजब की समानता है और इनके धर्मदर्शन और समाज मनोवैज्ञानिक अनुप्रयोग (इम्प्लीकेशंस) एक जैसे हैं। ----इससे इस संस्कृति के लोग आततायी कैसे हुए अपितु निश्चय ही यह एक समन्वित उच्च संस्कृति की ओर इशारा करते हैं जो भारत भर में फ़ैली हुई थी सभी धर्म दर्शन, पंथ , सम्प्रदाय उसी संस्कृति के अंग थे जिसका वर्णन समाधान २० में किया गया है | पहले ही स्पष्ट होचुका है कि गोंडों के तथाकथित नायक शम्भूसेक स्वयं ही महादेव शिव हैं जो स्वयं वेदों के निर्माता हैं | 

चित्र---१. गोंडों के जुन्नार देव का त्रिशूल----अर्थात शिव के पूर्व रूप के त्रिशूल...
चित्र-२.--कथित गोंड राज्य चिन्ह ---कोणार्क--हाथी पर सवार शेर---अर्थात दुर्गा की सवारी ..

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----------क्रमश पोस्ट ६ आगे----

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-03-2017) को "रचो ललित-साहित्य" (चर्चा अंक-2920) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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