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रविवार, 4 मई 2014

ग़ज़ल ज्ञान .. डा श्याम गुप्त ...

ग़ज़ल की कोइ किस्म नहीं होती है दोस्तो|
ग़ज़ल का जिस्म उसकी रूह ही होती है दोस्तो |

हो जिस्म से ग़ज़ल विविध रूप रंग की ,
पर रूह लय गति ताल ही होती है दोस्तों |

कहते हैं विज्ञ कला-कथा ग़ज़ल ज्ञान की ,
यूं ग़ज़ल दिले-रंग ही होती है दोस्तो |

बहरें वो किस्म किस्म की, तक्ती सही-गलत ,
पर ग़ज़ल दिल का भाव ही होती है दोस्तो |

उठना व गिरना लफ्ज़ का, वो शाने ग़ज़ल भी ,
बस धडकनों का गीत ही होती है दोस्तो |

मस्ती में झूम कहदें श्याम ' ग़ज़ल-ज्ञान क्या ,
हर ग़ज़ल सागर ज्ञान का ही होती है दोस्तों ||

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (05-05-2014) को "मुजरिम हैं पेट के" (चर्चा मंच-1603) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. कहते हैं विज्ञ कला-कथा ग़ज़ल ज्ञान की ,
    यूं ग़ज़ल दिले-रंग ही होती है दोस्तो |

    बहुत सही कहा।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह ... ग़ज़ल में ही ग़ज़ल के भाव .. गागर में सागर ...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद दिगंबर जी...आभार...

      हटाएं
  4. इस ग़ज़ल की ग़ज़ल के रंगों-भाव में ,
    यह कद्रदानी ही ग़ज़ल होती है दोस्तों

    उत्तर देंहटाएं
  5. umda gazal
    http://thoughtpari.blogspot.com/2014/05/blog-post.html?spref=bl

    उत्तर देंहटाएं