![]() अंक है धवल-धवल।
पंक में खिला कमल।।
हाय-हाय हो रही,
गली-गली में शोर है,
रात ढल गई मगर,
तम से भरी भोर है,
बादलों में घिर गया,
भास्कर अमल-धवल।
अंक है धवल-धवल।
पंक में खिला कमल।।
पर्वतों की चोटियाँ,
बर्फ से गयीं निखर,
सर्दियों के बाद भी,
शीत की चली लहर,
चीड़-देवदार आज,
गीत गा रहे नवल।
अंक है धवल-धवल।
पंक में खिला कमल।।
चाँदनी लिए हुए,
चाँद भी डरा-डरा,
पादपों ने खो दिया
रूप निज हरा-भरा,
पश्चिमी लिबास में,
रूप खो गया सरल।
अंक है धवल-धवल।
पंक में खिला कमल।।
|
यह ब्लॉग खोजें
शनिवार, 17 मई 2014
"पंक में खिला कमल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
फ़ॉलोअर
-
निर्मम दुनियाँ से सदा , चाहा था वैराग्य पत्थर सहराने लगा , हँसकर अपना भाग्य हँस कर अपना भाग्य , समुंदर की गहराई ...
-
हलचल होती देह से, मन से होता ध्यान लहरों को माया समझ, गहराई को ज्ञान गहराई को ज्ञान , मिलें गहरे में मोती सीधी-सच्ची बा...
-
राष्ट्रीय ग्रन्थ हम कितने मूर्ख हैं जो विश्व की धरोहर महात्मा गांधी को भारत का राष्ट्रपिता बनाकर सीमित किये दे रहे हैं, बिना मतलब के ...

Isbaar ponkmein NPK (fertilizer) balance maatra me thaa isliyeh komal khil goyaa
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर गीत !
जवाब देंहटाएंlatest post: रिस्ते !
अति सुन्दर
जवाब देंहटाएं