समर्थक

Google+ Followers

मित्रों!
आज से आप अपने गीत
"सृजन मंच ऑनलाइन" पर
प्रकाशित करने की कृपा करें।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिए Roopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। आपका मेल मिलते ही आपको सृजन मंच ऑनलाइन के लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

रविवार, 30 जून 2013

तपी दोपहर

       तपी दोपहर
तपी धूप करती रही,  टुकड़ा छांव तलाश |
नहीं मिली तो आ गई,थक सूरज के पास||

तपी धूल पर तप रहे,हर पल सबके पांव |
वृक्षों से खाली हुए, लगभग सारे   गांव||

तपी दुपहरी हो गई,असहनीय अब धूप |
लकड़ी-चोरों ने किया,  सामंजस्य  प्रदूप||

भरी दुपहरी ना मिली ,  ढूंढ-ढूढकर छांव |
निजीस्वार्थ ने कर दिया,वृक्षहीन हर ठांव||

रेखा सी नदिया हुई,शुष्क तलैया-ताल |
तपी दोपहर में हुआ,जन-जीवन बेहाल||

सर पर सूरज तप रहा,भ्रूभंगिम कर आज |
वृक्ष काटने का मिला, कठिन दण्ड यह'राज'||

              - डा.राज सक्सेना

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा लगी ये त्वरित रचना
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज सोमवार (01-07-2013) को प्रभु सुन लो गुज़ारिश : चर्चा मंच 1293 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  3. तपती दुपहरी जैसे खरी खरी बात कहते दोहे बहुत बढ़िया आपको बधाई राज जी

    उत्तर देंहटाएं
  4. तपती दुपहरी जैसे खरी खरी बात कहते दोहे बहुत बढ़िया आपको बधाई राज जी

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज मंगलवार (02-07-2013) को "कैसे साथ चलोगे मेरे?" मंगलवारीय चर्चा---1294 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुंदर सृजन के लिए बधाई हो

    उत्तर देंहटाएं