समर्थक

Google+ Followers

मित्रों!
आज से आप अपने गीत
"सृजन मंच ऑनलाइन" पर
प्रकाशित करने की कृपा करें।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिए Roopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। आपका मेल मिलते ही आपको सृजन मंच ऑनलाइन के लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

गुरुवार, 5 जून 2014

"बिगड़ा हुआ है आदमी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


फालतू की ऐँठ मेंअकड़ा हुआ है आदमी।
वानरों की कैद मेंजकड़ा हुआ है आदमी।।

सभ्यता की आँधियाँजाने कहाँ ले जायेंगी,
काम के उद्वेग नेपकड़ा हुआ है आदमी।

छिप गयी है अब हकीकतकलयुगी परिवेश में,
रोटियों के देश में, टुकड़ा हुआ है आदमी।

हम चले जब खोजने, उसको गली-मैदान में
ज़िन्दग़ी के खेत मेंउजड़ा हुआ है आदमी।

बिक रही है कौड़ियों में, देख लो इंसानियत,
आदमी की पैठ में, बिगड़ा हुआ है आदमी।

रूप तो है इक छलावा, रंग पर मत जाइए,
नगमगी परिवेश में, पिछड़ा हुआ है आदमी।

1 टिप्पणी:

  1. बिक रही है कौड़ियों में, देख लो इंसानियत,
    आदमी की पैठ में, बिगड़ा हुआ है आदमी।
    शास्त्री जी बहुत सुन्दर ..यथार्थ परक ...कब मानव मानव बनेगा
    भ्रमर ५

    उत्तर देंहटाएं