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रविवार, 20 अक्तूबर 2013

दो छंद ....डा श्याम गुप्त.......

            सवैया..... छलके

छलके सत-शुचि जो विचार रहें, तिनकी भाषा कर्मनि छलके,
छलके शुभ-कर्म की आभा से, आत्मा की शुचिता मन छलके |
छलके तन से भाषा मन की, आनन पै तन-मन दुति छलके |
छलके उर में प्रभु भक्ति की धार, औ नयनन आनंद-रस छलके ||


          कुंडली छंद .....छंद

गति जाने नहीं छंद की, छंद छंद चिल्लाय,
अनुशासन युत कथ्य जो, कविता वही कहाय | 
कविता वही कहाय, भिन्न हो गद्य भाव से,
हो अतुकांत -तुकांत, सजे हों भाव काव्य के |
बस तुकांत ही छंद, भाव यह अल्प-ज्ञान मति,
छान छंद चिल्लाय, छंद की नहीं जाने गति ||

4 टिप्‍पणियां:


  1. बहुत सुन्दर है डॉ साहब भाषा में प्रवाह है शैली में माधुर्य विषय अनुरूप प्रांजल भाषा।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (21-10-2013)
    पिया से गुज़ारिश :चर्चामंच 1405 में "मयंक का कोना"
    पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं