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गुरुवार, 5 नवंबर 2015

पेशावर वाली माँ

पेशावर वाली माँ एक महीना हो गया अब चली जाओ तुम मुझे आजाद कर दो अपनी क़ैद से तुम जीती जागती भला कैसे रूह बन कर मुझ पर साया हो सकती हो तुम भूत नहीं हो|
वो तो तुम्हारे बच्चे नहीं नहीं नहीं वो नाजुक नाजुक से बच्चे भूत नहीं बन गए  वो तो फ़रिश्ते हैं
फ़रिश्ते हैं या थे ? फ़रिश्ते होते हैं या मरने के बाद बन जाते हैं ? फ़रिश्ते होते हैं तो मर क्यूँ जाते हैं ?
नहीं वो मार दिए जाते हैं शैतान मार देते हैं ?
जो भी हो तुम चली जाओ मुझसे और नहीं सहा जाता तुम्हारा साथ | आजकल ठण्ड भी कितनी हैं तुम्हारे हाँ भी होगी ?
पापा का हर तीसरे दिन फ़ोन आ जाता है बहुत ठण्ड है आज बच्चो को अच्छे से कपडे पहना कर रखना | पेशावर वाली माँ तुम्हारे बच्चो को भी ठण्ड लगती होगी ना उफ़ इतनी सर्द रातो में तुम खुद से कोसो दूर सीली मिटटी में कैसे छोड़ सकती हो भला अपने बच्चो को ?अरे कैसी माँ हो तुम? हाथ और छोटी छोटी उँगलियाँ भी अकड़ गयी होगी ठण्ड में उन नाजुकबदन बालको की |अरे रहम करो उन बच्चो पर निकाल लाओ उन्हें | क्या टीस नहीं उठती सीने  में देखा ही नहीं तुमने जिगर के टुकडों को एक महीने से |  क्या छाती में कुछ कुलबुलाता नहीं जब स्कूल से वापस आते ही गले से लग कर तुम में फिर से पनाह पाने की कोशिश  याद आती है थके हारे बच्चों की ?
अरे जालिम माँ जा ले आ अपने बच्चे को बैठा दे उसे गरम कम्बल में लपेट कर और खजूर बादाम का गरम गरम दूध अपने हाथों से पिला |
जा चली जा एक तो तेरे मुझ में होने का बोझ, दूसरा तू हर वक़्त जो ये सवाल करती हैं, मैं इनके जवाब कंहा से दूँ ? जब से तू आई है मैंने दौड़ दौड़ कर बात बे बात अपनी बेटियो को गले लगाया है और जितनी बार उन्हें गले लगाती हूँ तू बांहे फैला लेती है, क्यूँ पूछती है मुझ से ?
मैं कैसे बताऊँ, क्या बताऊँ कि तू किसे बांहों में भरेगी अब, तू किस के बालो चेहरे को बोसो से ढक देगी मुझे क्या मालूम तू अब किस को छाती से चिपका कर सोएगी ?
किस की एक छोटी सी पुकार पर तू आई बेटा  कह कर रसोई से दौड़ी जाएगी ।
किस की पेंटिंग्स,प्रोजेक्ट्स देख कर तू अरे वाह शाबाश बोलेगी ।
और सुनो ये जो तुम पागलों की तरह अपलक देखती हो न, जब में नन्ही सी बेटी को उस पर अनायास उमड़ आए प्यार पर बांहों में छुपा कर 'मेरा नोना बाबू 'कहती हूँ ,ये मुझे बहुत डराता है मेरी पकड़ ढीली हो जाती है बिटिया पर |तुम से डर  कर मैं चुपचाप रसोई में जाकर बिना काम के काम निकाल लेती हूँ ।
ख़बरदार जो ये सोचा कि तुम सी होकर दिखाती हूँ तुम्हें ।नहीं नहीं मैं तुम सी नहीं
मेरे बच्चे,मेरे ज़िगर के टुकड़े साथ हैं मेरे।कोई बुरी निगाह उनका कुछ बिगड़ना क्या ऐसा सोच भी नहीं सकती ।
मैं हूँ ना ..उनकी माँ .....जब मैं हूँ,जब माँ हैं तो ,तो किसी बच्चे का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता .....ये बात सब जानते हैं मैं भी, तुम भी,दुनिया भी ।
फिर उस दिन तुमने अपने बच्चों को जाकर बचाया क्यूँ नहीं पेशावर वाली माँ ?
माँ के होते किसी को कुछ नहीं हो सकता इस विश्वास के सबसे बड़े विश्वास करने वाले बच्चे ही तो होते हैं । ओ निर्मोही जरा सोच तो उस आख़िरी वक़्त तक भी उन नन्ही जानों को भरोसा होगा के उनकी माँ बचा लेगी उन्हें ?जरा सोच तो बारूद का दर्द ज्यादा हुआ होगा ,मरने का या उस आख़िरी घड़ी पर भी जब तू बचाने नहीं पहुंची तो उनके टूटे विश्वास से टूटे दिल का ?
पता नहीं गोलियों के सितम से या तेरे न आने के सदमे में आँखे खुली की खुली रह गयी बेचारे की।
वो आख़िरी घड़ियाँ क्या क़यामत झेल चल निकले वो बहादुर शूरमा बच्चे ?
देख अब तू  और न सता, इम्तिहान आने वाले हैं बच्चो के ,अब मुझे फुरसत नहीं तू भी जा अरे अपने बच्चों का ख्याल कर, क्या कॉफ़ी नहीं देनी देर रात तक जागकर पढ़ते बच्चे को?
सुबह उनका फरमाईशी लंच बॉक्स भी बनाना होगा?
और क्या अरे आजकल बच्चों की खाने की आदते कितनी अजीब हो गयी है न मेरी बेटी को तो हर रोज कुछ नया और टेस्टी चाहिए अब हम माओं की जो हालत होती है रोज नई नई रेसिपी खोजने में क्या तेरे बच्चे को भी पास्ता और ब्रेड पिज़्ज़ा पसंद है मेरी बेटी को तो है।
बहुत उदासी होती है माहौल मे जब धूप मे मेरे पास आ बैठती है तू,और बताने लगती है किस्से अपने लाडले के, सुन वो उस दिन क्या बता रही थी तुम कि तुम्हारा बेटा कल्पना चावला को अपना आइडल मानता है वो भी नासा जाना चाहता है एस्ट्रोनाटॅ बनना चाहता है। सही है बच्चे अपना एम आजकल बहुत अच्छी तरह जानते है उनके फण्डे बडे साफ होते है जिन्दगी के बारे मे ,तू सोच वरना हमें कहाँ पता था क्या बनना है इतनी उम्र के थे जब हम। बन जाएगा, बन जाएगा ,पर.......
जानती हूँ अब कुछ नहीं होगा हर आने वाले को जाना है पर इत्ती सी उम्र मे और इस तरह जाना? ना ना पेशावर वाली माँ ऐसी मौत तो दुश्मन को भी ना आए। दुश्मन ही तो हो तुम हमारी पर यकीन कर ऐसी दुआ नहीं की थी कभी तेरे लिए ।मेरे भगवान तेरे अल्लाह की कसम ।और दुश्मन है तू तो पगली मेरे पास रोज क्यूँ आ बैठती है,क्यूँ तेरे दुख के आँसू मेरी पलकों पर आ कर जम जाते हैं । माँ हिन्दू, मुसलमान नही होती, माँ मजहब से क्या वास्ता ,वो बस अपने बच्चों की माँ होती है । कौन सा भगवान कहता है कि माँ को उसकी औलाद से ही जुदा कर दो,और अगर भगवान एक ही है तो फिर काहें का झगडा?
हमारे यहाँ भी खूब हुआ री ऐसा हमारे यहाँ क्या पूरी दुनिया मे हुआ जर्मनी,जापान,रुस मे हुआ। कुछ मिला था क्या मारने वालो को? फिर भी कुछ नही सीखा,इन्सान जानवर से तो बहुत बदतर है।
जलियांवाला बाग हुआ था तुझे याद तो होगा। उफ........
अब क्या करेगी तू, जिसकी जितनी लिखी है उतनी ही जीता है,हाँ ये तो तू सच कहती है ऐसे कोई नहीं जाता। हमारे यहाँ हर चोट का मरहम है, हमारे यहाँ अभिमन्यु भी ऐसे ही चला गया था पर उसका इलाज हमने कर लिया हमे दिल को बहलावे देने खूब आते हैं।ये कह कर कि वो किसी राक्षस की आत्मा थी,हमने दिल फुसला लिया,अभिमन्यु की  माँ सुभद्रा जब गर्भवती थी तब उसने  गलती से वो बोतल खोल ली थी जिसमे उसके भाई श्री कृष्ण ने उस आत्मा को कैद कर रखा था। और वो आत्मा गर्भस्थ शिशु अभिमन्यु के शरीर मे प्रवेश कर गई थी।
पर तुम खुद को क्या समझाओगी पेशावर वाली माँ। हम अगले जन्म की आस लगा लेते हैं तुम तो वो भी नहीं मानती । तुम खुद को कैसे सम्भालोगी। जिओगी ही कैसे अब, जब दिल की नस नस तडफेगी वो दरिंदगी याद कर के जो तेरे बच्चों पर कहर बरपा हुई तो तू खुद को कैसे माफ कर पाएगी कि तू कहाँ थी उस घडी,कि तू कुछ भी ना कर पाई अपने  नन्हें से चाँद के लिए, कि तू जिन्दा ही क्यूँ है? तू जिन्दा ही रह कर क्या करेगी पेशावर वाली माँ। इन्सानियत का तकाजा है इन्सान इन्सान के काम आए मै कुछ कर सकती तो जरूर करती तेरे नौनिहाल के लिए, जान लडा देती उसे बचाने के लिए। तू तो चली आई पर मै तो कभी तुझे बताने आ भी नही सकती कि मै तेरे गम मे अपने पति से छुप छुप कर रोज रात को रोती हूँ, कि जब तू सूजी हुई दर्द से बेहाल आँखे कुदरत  के कानून के आगे और खोले नही रह पाती और सो जाती है या बेहोस हो जाती है, क्या पता ,तो मै तुझे कम्बल उढा आती हूँ तेरे माथे पर हाथ फिरा देती हूँ, पर ये दुनिया माँ को नही समझती और माँ को दुनियादारी समझ नही आती ।तेरे गम मे शरीक हूँ पर तुझे बता  भी नहीं सकती ।
जब भी सांस आए समझना मैंने याद किया जब भी कभी बादे सबा जानी पहचानी सी लगे सोचना मैने दुआ की तेरे लिए, पर अब तू चली जा पेशावर वाली माँ मुझे अपने बच्चे पालने है,और तू तो जानती है माँ अपने बच्चो के लिए बहुत खुदगर्ज होती है वो बस अपने बच्चों के लिए सोचती है पहले। मै तेरे साथ हूँ पर तू दुश्मन देश की माँ ठहरी तेरे लिए क्यूँ रोऊं । पर है तो माँ ही री,आ गले लग जा आखिरी बार,कभी छुप कर फिर मिलेंगे अब जा चली जा पेशावर वाली माँ ।
  शामिल हूँ तेरे गम मे बहुत शर्मसार भी
लाचार हूँ खडा हूँ तमाशाईयों के साथ ।
  पारुल

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