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मंगलवार, 2 जून 2015

"ज्येष्ठ पूर्णिमा-सन्तकबीर और नागार्जुन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

     आज ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा है। आज के ही दिन दो महान विभूतियों का जन्म हमारे भारत वर्ष में हुआ था। जिनमें एक सन्त कबीर थे और दूसरे जनकवि बाबा नागार्जुन थे। सन्त कबीर एक समाज सुधारक थे और उनके नाम पर आज कई मठ बने हैं और उनमें मठाधीशों आधिपत्य है। जबकि बाबा नागार्जुन के नाम के जुड़ा न कोई मठ है और न कोई मन्दिर है। उनकी यही विशेषता उनको दूसरों से अलग करती है।

मैं उन सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से हूँ जिसे बाबा की सेवा और सान्निध्य मिला था।
बाबा नागार्जुन को शॉल भेंट करते हुए डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
सनातन धर्मशाला, खटीमा में 9 जुलाई,1989 को सम्पन्न 
कवि गोष्ठी के चित्र में-गम्भीर सिंह पालनी, जवाहरलाल वर्मा, 
दिनेश भट्ट, बल्लीसिंह चीमा, वाचस्पति, कविता पाठ करते हुए
ठा.गिरिराज सिंह, बाबा नागार्जुन तथा ‘डा. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सन् 1989 का जून जुलाई का महीना मेरे जीवन के लिए
आज भी अविस्मरणीय  है!
बाबा नागार्जुन को स्कूटर पर बैठाकर सैर कराना! 
बाबा के साथ घंटों बतियाना!
कुछ अपनी कहना और कुछ उनकी सुनना!
बाबा के पास लोगों के मिलने का ताँता लगा रहता था!
सारा परिवार बाबा के साथ बहुत खुश रहता था!
मेरे पिता जी श्री घासीराम आर्य 
और दोनों पुत्रों के साथ बाबा घूम भी लेते थे!
बच्चों से तो बाबा बहुत घुल-मिल जाते थे!
इस दौरान कई कवि गोष्ठिया भी 
बाबा के् सम्मान में आयोजित की गईं!
बाबा को शॉल और मालाओं से 
सम्मानित भी तो किया गया था!
मुझे आज भी याद है कि खटीमा बस स्टेशन पर
मैं ही बाबा को दिल्ली की बस में बैठाने आया था!
यह है बाबा का पत्र मेरे नाम
जो उन्होंने दिल्ली से मुझे लिखा था!
 आर्य समाज के बारे में बाबा का क्या मत था!
यह आलेख मैंने "उत्तर-उजाला" में लिखा था!
जनकवि और साहित्यकार
बाबा नागार्जुन को मैं 
उनके जन्मदिन पर
कोटि-कोटि नमन करता हूँ!

जीवन परिचय

   बाबा के नाम से प्रसिद्ध कवि नागार्जुन का जन्म ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा(30 जून 1911) को अपने ननिहाल सतलखाजिला दरभंगाबिहार में हुआ था। आपका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। नागार्जुन तरौनी गाँवजिला मधुबनीबिहार के निवासी रहे। आपकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुई। बाद में  वाराणसी और कोलकाता में अध्ययन किया।1936 में आप श्रीलंका चले गए और वहीं बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की।  कुछ समय श्रीलंका में ही रहे फिर 1938 में  भारत लौट आए। अपनी कलम से आधुनिक हिंदी काव्य को और समृद्ध करने वाले नागार्जुन का नवम्बर सन्1998 को ख्वाजा सरायदरभंगाबिहार में निधन हो गया।
नागार्जुन का साहित्य सृजन
फक्कड़पन और घुमक्कड़ी प्रवृति  नागार्जुन के जीवन की प्रमुख विशेषता रही कि उन्होंने अपनी रचनाएँ हमेशा घूम-घूमकर ही लिखीं हैं और उस स्थान विशेष का जीवन्त चित्रण अपने काव्य में किया है। कैलाश मानसरोवर में बाबा गये और वहाँ के परिवेश का जो वर्णन उन्होंने किया वह अद्भुत है बाबा को नमन करते हुए उनकी कालजयी रचना को प्रस्तुत कर रहा हूँ-
"अमल धवल गिरि के शिखरों पर
बादल को घिरते देखा है।

छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है
बादल को घिरते देखा है।

तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी-बड़ी कई झीलें हैं
उनके श्यामल-नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिस-तंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है
बादल को घिरते देखा है।

ऋतु वसंत का सुप्रभात था
मंद-मंद था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणें थीं
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे
एक-दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती
निशाकाल से चिर-अभिशापित
बेबस उस चकवा-चकवी का
बंद हुआ क्रंदनफिर उनमें
उस महान सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है।

दुर्गम बर्फ़ानी घाटी में
शत्-सहस्र फुट ऊँचाई पर
अलख नाभि से उठने वाले
निज के ही उन्मादक परिमल
-के पीछे धावित हो-होकर
तरल तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है"  
         1935 में दीपक (मासिक) तथा 1942-43 में  विश्वबंधु  (साप्ताहिक) पत्रिका का संपादन किया। अपनी मातृभाषा मैथिली में वे यात्री नाम से रचना करते थे। मैथिली में नवीन भावबोध की रचनाओं का प्रारंभ उनके महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रह, 'चित्रसे माना जाता है। नागार्जुन ने संस्कृत तथा बांग्ला में भी काव्य-रचना की है।
    लोकजीवनप्रकृति और समकालीन राजनीति उनकी रचनाओं के मुख्य विषय रहे हैं। विषय की विविधता और प्रस्तुति की सहजता नागार्जुन के रचना संसार को नया आयाम देती है। छायावादोत्तर काल के वे अकेले कवि हैं जिनकी रचनाएँ ग्रामीण चौपाल से लेकर विद्वानों की बैठक तक में समान रूप से आदर पाती हैं। जटिल से जटिल विषय पर लिखी गईं उनकी कविताएँ इतनी सहजसंप्रेषणीय और प्रभावशाली होती हैं कि पाठकों के मानस लोक में तत्काल बस जाती हैं। नागार्जुन की कविता में धारदार व्यंग्य मिलता है। जनहित के लिए प्रतिबद्धता उनकी कविता की मुख्य विशेषता है।
    नागार्जुन ने छन्दबद्ध और छन्दमुक्त दोनों प्रकार की कविताएँ रचीं। उनकी काव्य-भाषा में एक ओर संस्कृत काव्य परम्परा की प्रतिध्वनि है तो दूसरी ओर बोल-चाल की भाषा की रवानी और जीवन्तता भी। पत्रहीन नग्न गाछ (मैथिली कविता संग्रह) पर उन्हें  साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्हें उत्तर प्रदेश के  भारत-भारती पुरस्कारमध्य प्रदेश के मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार और बिहार सरकार के राजेंद्र प्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें दिल्ली की ̄हदी अकादमी का  शिखर सम्मान भी मिला।
उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं -
युगधाराप्यासी पथराई आँखेंसतरंगे पंखों वालीतालाब की मछलियाँ,हजार-हजार बाहों वालीपुरानी जूतियों का कोरसतुमने कहा था,  आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने,  मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ारत्नगर्भाऐसे भी हम क्या: ऐसे भी तुम क्यापका है कटहल,  भस्मांकुर ।
बलचनमारतिनाथ की चाचीकुंभी पाकउग्रताराजमनिया का बाबा,वरुण के बेटे जैसे उपन्यास भी विशेष महत्त्व के हैं।
आपकी समस्त रचनाएँ नागार्जुन रचनावली (सात खंड) में संकलित हैं।
साभार-भारतदर्शन साहित्यिक पत्रिका (रोहित कुमार हैप्पी)

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