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शनिवार, 24 जनवरी 2015

बसंत ऋतु आई है ... ...डा श्याम गुप्त.....

बसंत ऋतु आई है ... ...डा श्याम गुप्त.....



                                    
 वसंत

नर कोयल
मादा-कोयल


 
   बसंत  ---- बागों में, वनों में, सुधियों में बगरा हुआ रहता है और समय आने पर पुष्पित-पल्लवित होने लगता है .....प्रस्तुत है ..बसंत
पर एक रचना .....वाणी की देवी .सरस्वती वन्दना से....
        
                   
सरस्वती वन्दना 
जो कुंद इंदु तुषार सम सित हार, वस्त्र से आवृता 
वीणा है शोभित कर तथा जो श्वेत अम्बुज आसना ।
जो ब्रह्मा शंकर विष्णु देवों से सदा ही वन्दिता ।
माँ शारदे ! हरें श्याम' के तन मन ह्रदय की मंदता ।।

                  
बसंत ऋतु आई है ....
 
                  (
घनाक्षरी छंद )
     
गायें कोयलिया तोता मैना बतकही करें ,           
कोपलें लजाईं, कली कली शरमा रही |
झूमें नव पल्लव, चहक रहे खग  वृन्द ,
आम्र बृक्ष बौर आयेऋतु हरषा रही|
नव कलियों पै हैं, भ्रमर दल गूँज रहे,
घूंघट उघार कलियाँ भी मुस्कुरा रहीं |
झांकें अवगुंठन से, नयनों के बाण छोड़ ,
विहंस विहंसवे मधुप को लुभा रहीं ||

सर फूले सरसिज, विविध विविध रंग,
मधुर मुखर भृंग, बहु स्वर गारहे |
चक्रवाक वक जल कुक्कुट औ कलहंस ,
करें कलगान, प्रात गान हैं सुना रहे |
मोर औ मराल, लावा  तीतर चकोर बोलें,
वंदी जन मनहुंमदन गुण गा रहे |
मदमाते गज बाजि ऊँट, वन गाँव डोलें,
पदचर यूथ ले, मनोज चले आरहे ||

पर्वत शिला पै गिरें, नदी निर्झर शोर करें ,
दुन्दुभी बजाती ज्यों, अनंग अनी आती है |
आये ऋतुराज, फेरी मोहिनी सी सारे जग,
जड़ जीव जंगम मन, प्रीति मदमाती है |
मन जगे आसप्रीति तृषा  मन भरमाये ,
नेह नीति रीति, कण कण सरसाती है |
ऐसी बरसाए प्रीति रीति, ये बसंत ऋतु ,
ऋषि मुनि तप नीति, डोल डोल जाती है ||

लहराए क्यारी क्यारी,सरसों गेहूं की न्यारी,
हरी पीली ओड़े  साड़ीभूमि इठलाई  है |
पवन सुहानी, सुरभित सी सुखद सखि !
तन मन  हुलसेउमंग मन छाई है |
पुलकि पुलकि उठें, रोम रोम अंग अंग,
अणु अणु प्रीति रीति , मधु ऋतु लाई है |
अंचरा उड़े सखी री, यौवन तरंग उठे,
ऐसी मदमाती सी, बसंत ऋतु आई है ||
                                                              ----चित्र ..निर्विकार  एवं गूगल साभार

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