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बुधवार, 31 दिसंबर 2014

भारतीय नव वर्ष--- डा श्याम गुप्त....



 नव वर्ष---


. देव घनाक्षरी ( ३३ वर्ण , अंत में नगण )

पहली जनवरी को मित्र हाथ मिलाके बोले ,
वेरी वेरी हेप्पी हो ये न्यू ईअर,मित्रवर |
दिसंबर -जनवरी
हम बोले शीत की इस बेदर्द ऋतु में मित्र ,
कैसा  नव वर्ष,  तन काँपे  थर थर थर |
ठिठुरें खेत बाग़ दिखे कोहरे में कुछ नहीं ,
हाथ पैर हुए  छुहारा सम  सिकुड़ कर |
सब तो नादान हैं पर आप क्यों हैं भूल रहे,
अंगरेजी लीक पीट रहे नच नच कर ||

. मनहरण कवित्त (१६-१५, ३१ वर्ण , अंत गुरु-गुरु.)-मगण |

चैत्र
अपना तो नव वर्ष चैत्र में होता प्रारम्भ ,
खेत बाग़ वन जब हरियाली छाती है |
सरसों चना गेहूं सुगंध फैले चहुँ ओर ,
हरी पीली साड़ी ओड़े भूमि इठलाती है |
घर घर उमंग में झूमें जन जन मित्र ,
नव अन्न की फसल कट कर आती है |
वही है हमारा प्यारा भारतीय नव वर्ष ,
ऋतु भी सुहानी तन मन हुलसाती है ||

मनहरण --
सकपकाए मित्र फिर औचक ही यूं बोले ,
राग बसन्ती
भाई आज कल सभी इसी को मनाते हैं |
आप भला छानते क्यों अपनी अलग भंग,
अच्छे खासे क्रम में भी टांग यूं अडाते हैं |
हम बोले आपने जो बोम्बे कराया मुम्बई,
और बंगलूरू , बेंगलोर को बुलाते हैं |
कैसा अपराध किया हिन्दी नववर्ष ने ही ,
आप कभी इसको नज़र में न लाते हैं |

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