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बुधवार, 13 मार्च 2019

देश की जनता होशियार -डा श्याम गुप्त

देश की जनता होशियार -डा श्याम गुप्त

                           


देश की जनता होशियार ------एक -- राष्ट्र बचे या हम रोटी कपड़ा मकान में लगे रहें ----
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बिके हुए, भटके हुए, भ्रमित लोग व मीडिया -कोइ घंटी बजाएगा, कोइ विशिष्ट प्रोग्राम चलाएगा , कोइ अन्य प्रोग्राम ---आपको भूख व गरीबी में अटकाएंगे , कोइ मुफ्त माल १५ लाख में ....कोइ रोजगार को राष्ट्र से ऊपर रखेगा - व्यग्तिगत सवा-लाभ हेतु ,देश राष्ट्र के विरुद्ध भड़कायेगा ...
---- अरे ! जब राष्ट्र ही नहीं रहेगा तो -तो कहाँ रहेगा रोजगार, गरीबी-गरीब,, आप लोग ही कहाँ रहेंगे , कहाँ का रोटी कपड़ा और मकान ----सब गुलाम होंगें , जूते खाते हुए .....
---याद करें राणाप्रताप ने घास की रोटी खाकर राष्ट्रवाद को नहीं छोड़ा...
--- आवश्यकतावश शरीर बचाने हेतु कुछ भी खाया जासकता है ...व्रत भी तोड़ा जा सकता है , जब शरीर ही नहीं रहेगा तो कैसा मलाई खाना, कैसे लड़ेंगे ---
----व्यर्थ के छोटे छोटे मुद्दों पर न भटकिये -----राष्ट्र का हित सोचिये....राष्ट्रवाद से देश से बड़ा क्या होसकता है-


--- भोजन -, सोना, मैथुन ..स्व-रक्षा -तो पशु भी कर लेते हैं , केवल इसी में रत रहना पशु वृत्ति है -----मानव हैं तो देश -राष्ट्र , समाज-संस्कृति की बात सोचें 
-----देश रहेगा तो हम रहेंगे...समाज रहेगा, भारतीयता रहेगी , संस्कृति रहेगी-
----सोचें समझें , उचित उम्मीदवार को वोट दें--

------वोट अवश्य दें 
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देश की जनता होशियार ------ दो--------माना की हमें गुलामी में रहने की बुरी आदत है |
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आपने अजीत डोवाल का मर्मभेदी कथन सुना होगा----जब अपहृत विमान को सकुशल छुड़वा कर लाया गया तो उन्होंने भारतमाता की जय का नारा लगाने को कहा --किसी भी यात्री ने नारा नहीं लगाया ----यह है हमारी राष्ट्र के प्रति जागरूकता---- स्वलाभ हित हमें राष्ट्र की कोइ चिंता नहीं है ---
-----अब तो जागें स्व-लाभ के छोटे छोटे मुद्दों को छोड़कर --राष्ट्रवाद की अलख जगाएं --

बुरी आदत है ----
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माना की हमें कदमों पे झुकने की बुरी आदत है
नक़्शे कदम पे गैरों के चलने की बुरी आदत है |
रही है अपनी मेधा हज़ारों साल तक बंधक,
माना की हमें गुलामी में रहने की बुरी आदत है |
सिर्फ एक यही वज़ह नहीं कि पिछलग्गू हैं हम,
अपनी संस्कृति को भूलने की बुरी आदत है |
अपनी प्राचीन दीवारों से सबक लेकर हमें,
नयी दीवारें खडी न करने की बुरी आदत है |
अपनी संस्कृति के चन्दन की सुगंध भूल,
मिलावटी गंध पे लुटने की बुरी आदत है |
बहुत खो चुके, अब तो समझें कि ज़िंदा कौम हैं हम,
जिसको देश की मिट्टी पे मिटने की बुरी आदत है |
दुनिया फिर चलेगी तेरे नक़्शे कदम पे श्याम,
तुझे नवसृजन के गीत गढ़ने की बुरी आदत है ||

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देश की जनता होशियार -तीन--
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----आठ मिनट का भाषण ---अधिक बोलने को कुछ है ही कहाँ , इतना ज्ञान ही कहाँ है , तथ्यों का या देश की स्थिति का भान ही कहाँ है ----
----सत्तर वर्ष से देश आतंकवाद, भ्रष्टाचार , लूट-खसोट द्वारा, अपराध - अशांति की आग में, घिरा रहा तब प्रियंका गांधी को प्रेम की नफ़रत की बातें याद नहीं आईं-----आती भी कैसे इतिहास का किसे ध्यान-ज्ञान है ---फिर तब तो वे स्वयं लूट-खसोट, घुटालों के सुख में लिप्त थे, मस्त थे -----

  

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (15-03-2019) को दोहे "होता है अनुमान" (चर्चा अंक-3275) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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