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सोमवार, 27 अगस्त 2018

एक और शम्बूक कथा---- डा श्याम गुप्त

एक और शम्बूक कथा----
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भारतीय शास्त्रों की महत्ता उनमें स्थित मानव के सभी आचरण व दुराचरणों का सत्य सत्य ज्यों का त्यों वर्णन एवं समाधान हेतु सदाचरण प्रस्तुति के कारण ही है, जिसके कारण यह देश-समाज उत्तरोत्तर अपनी कमियों पर अंकुश लगा कर उत्तरोत्तर प्रगति के पथ पर चल कर विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति बन सका |
-------प्रारंभ से ही इस संस्कृति के विरुद्ध अनाचरण युत अप-संस्कृति के भाव उपस्थित होते आये हैं, जो असुर कथाएं, शम्बूक कथा, रावण प्रसंग आदि विभिन्न रूप में सर उठाती रही हैं|
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एक ताजा आधुनिक शम्बूक कथा जैसा प्रसंग, प्रस्तुत चित्र में आलेख देखिये |
------ये महाशय नेहरू के पश्चिमी ज्ञानोदय से प्रेरणा लेते हैं एवं उनकी सामान्य पुस्तक भारत एक खोज को साइंटिफिक टेम्पर बताते हैं |
------ इनके अनुसार वैदिक साइंस व वेदों में स्थित समस्त ज्ञान अंधविश्वास और अवैज्ञानिक है | पता नहीं ये देश की किस वास्तविक संस्कृति की बात करते हैं | यही शम्बूक –भाव है |
----इन्हें अत्याधुनिक खोजों , भारतीय वैदिक व शास्त्रीय ज्ञान के आधुनिक सन्दर्भों का कोइ न ज्ञान है न संज्ञान |
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शम्बूक एक वेद विरुद्ध, भारतीय-अध्यात्मिक जीवन की धारा के विरुद्ध, धर्म विरुद्ध अति-भौतिक विचारधारा का पोषक था | अनैतिक अविचारशील विचारधारा का पोषण होने से पूर्व ही उसे जड़ से उखाड़ देना चाहिए | यही शम्बूक की कथा का अर्थार्थ है |
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आज भी ऐसी विचारा धाराएं अनधिकृत प्रश्रय पा रही हैं | आवश्यकता है इन्हें रोकने की | आगे न बढ़ने देने की |
----- पर आज राम नहीं हैं |

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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (29-08-2018) को "कुछ दिन मुझको जी लेने दे" (चर्चा अंक-3078) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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