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शनिवार, 14 अप्रैल 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--आठ --डा श्याम गुप्त


                               

 भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--आठ  --डा श्याम गुप्त
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----पूर्वा पर ----
आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
-----------------विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक  आलेख-पोस्टों द्वारा |
-------पोस्ट आठ ---- कथन/समाधान  ३१से ३४ तक---


कथन ३१--
--------असुर, गोंड और मूलनिवासी धर्म :---लोकायत धर्म को मानने वाले असुर असल में इस देश के प्राचीन मूल निवासी थे। उनकी संस्कृति को छलपूर्वक आर्यों ने नष्ट किया और उन्हें समाज मनोवैज्ञानिक तरीकों से कालान्तर में हीन स्थान देकर समाज की निचली पायदानों पर धकेल दिया गया। यह बात डॉ. अंबेडकर की सबसे प्रमुख स्थापनाओं में से एक है। 
--------इसी तरह गोंडी संस्कृति और धर्म के विशेषज्ञ डॉ. मोतीरावण कंगाली (1949-2015) ने भी अपनी जमीनी शोध से यह स्थापित किया है कि मूलनिवासी संस्कृति की अधिकाँश ऊँची उपलब्धियां आर्यों या ब्राह्मण धर्म के द्वारा स्वयं में समाहित कर ली गयी हैं और अब उन्हें पहचानना ही कठिन हो गया है। 
------- उनकी खोज गोंडी धर्म और गोंडी लोक कहावतों और गीतों की वाचिक परम्परा पर आधारित है और इस वाचिक परम्परा में बिखरे हजारों सूत्रों को एकसाथ रखने पर वे भी स्वामी अछूतानंद, भदंत बोधानंद या अंबेडकर व ज्योतिबा फूले सहित देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय की ही तरह समान निष्कर्षों पर आ रहे हैं। 
--------उनका निष्कर्ष ये है कि आज के गोंड सहित अन्य अनेक जनजातीय समाज जो कि घोटुल नाम की संस्था से आपस में जुड़े रहे हैं वे सब के सब किसी अन्य लुप्त हो चुकी महान संस्कृति के वारिस हैं जिनकी संस्कृति को छलपूर्वक नष्ट किया गया है और चुराया गया है। 
--------चुराए गए इन प्रतीकों और चरित्रों की लिस्ट लंबी है। उदाहरण के लिए हिन्दुओ की बम्लेश्वरी देवी के बारे में उनका दावा है कि असल में यह गोंडों की बम्लाई दाईहैं जिसे कि आर्य ब्राह्मण पंडितों ने बमलेश्वरी देवी बना दिया है, इसी तरह गोंडी समुदाय के आदिपुरुषसंभूशेकबाद में हिन्दुओं के महादेवबन जाते हैं, इसी तरह गोंडी जनों का पवित्र भूभाग पेंकमेढ़ीबाद में पचमढ़ीबना दिया जाता है, और इसी तरह बीसियों नाम और प्रतीक व व्यवहार हैं जो थोड़े बदलाव के साथ सीधे सीधे  ब्राह्मणी धर्म के अनुयायियों ने चुरा लिए हैं (Kangali, 2011)।---
समाधान ३१--
------यह सब व्यर्थ की कसरत है इतिहास को पीछे लेजाकर उलटा देखने की प्रथा ---- विजेता जाति अपनी संस्कृति फैलाती है न की हारने वाले की संस्कृति को अपनाती है यह सौहार्दमय समन्वय एवं प्रगतोन्मुखी संस्कृति में होता है |
     सत्य ही है कि ये सब वनांचल निवासियों के देव देवी थे जो समन्वित सभ्यता में समस्त देश के देव देवी होगये एवं स्थानीय प्रकारांतर से नए नामों से जाने जाने लगे, इसमें नयी बात क्या है, यह सामान्य मानवीय, सामाजिक व राष्ट्रीय विकास की प्रक्रिया है | 
------शिव तो अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक देव हैं तो क्या यह नहीं माना जायगा कि वैदिक सभ्यता, आर्यों व हिन्दुओं ने बनांचल के पशुपति, शम्भूसेक या जुन्नारदेव अर्थात शिव को समस्त विश्व में आदरणीय रूप में फैलाया | आज इन कथित मूलनिवासियों को उनका आभारी होना चाहिए |
 कथन ३२-  
------- डॉ. मोतीरावण कंगाली प्राचीन हरप्पन सभ्यता की सैन्धव लिपि को गोंडी व्याकरण के आधार पर सफलता से पढ़ सकने वाले पहले विद्वान हैं। भाषाशास्त्रीय आधारों पर वे स्थापित करते हैं कि सैन्धव सभ्यता के सामाजिक धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य आज के गोंडों के मूल्यों से गहराई से एकरूप रहे हैं (Kangali, 2002)। भाषा की समानता के आधार पर भी उनकी शोध के आधार पर यह मान्यता स्थापित होती है कि गोंडों की आज की भाषा असल में द्रविड पूर्व भाषा थी इसीलिये गोंडी भाषा को द्रविड़ परिवार की सभी भाषाओं की जननी माना जा सकता है। उनके इस दावे में बहुत सच्चाई मालूम होती है। क्योंकि आज भी अधिकाँश द्रविड़ भाषाओं में और गोंडी भाषा में समानता पायी जाती है
        प्रोफ़ेसर दासगुप्ता (1925) का अध्ययन भी यह बतलाता है कि असुर लोगों में शव को दफनाने की प्रथा रही है जिसके उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद में भी मिलते हैं। आज भी यह प्रथा कई आदिवासी समुदायों में है। गोंड जनजाति में इसे आज भी माना जाता है।
समाधान ३२--
------इसमें कोइ नयी बात नहीं है अवश्य ही गोंडी भाषा भारतीय आदिवासी वनांचल की भाषा होगी द्रविड भाषाओं की जननी |
     शव दफनाने की प्रथा आदिकाल से चली आरही है | ऋग्वेद में दोनों प्रथाओं का वर्णन है दफनाने एवं जलाने का | आज भी प्राचीन स्थलों पर तमाम पुरानी पौराणिक कब्रें पाई जाती हैं | मिश्र आदि अन्य प्राचीन देशों में तो केवल दफनाने की ही प्रथा थी | दाह संस्कार प्रगतिशील वैज्ञानिक प्रथा है जिसमें पृथ्वी को अत्यधिक घेरने की आवश्यकता नहीं होती |
कथन ३३
------------उल्लेख करना जरुरी है कि मध्यप्रदेश के बालाघाट में लांजी नामक स्थान पर नेताम वंश के गोंड शासकों के प्राचीन दुर्ग की खुदाई में जो मूर्तियाँ प्राप्त हुयी हैं उनमे बुद्ध महावीर गणपति और संभोगरत युगल की मूर्ती भी पायी गयी है।
      गणपति के बारे में स्वयं चट्टोपाध्याय का अध्ययन बतलाता है कि यह किसी अन्य प्राचीन मूलनिवासी समुदाय का टोटम या नायक या देवता था जिसे ब्राह्मण धर्म में बाद में शामिल कर लिया गया। इसलिए यहाँ गणपति का होना असल में लोकायतिक या असुर परम्परा के ही किसी नायक का संकेत देता है।
    डॉ. कंगाली की अन्य स्थापनाओं पर गौर करें तो हम पाते हैं कि ब्राह्मणी धर्म के महादेव व पार्वती सहित सती और काली भी असल में गोंडों के मिथकीय चरित्र हैं जिन्हें बाद में उनके दर्शन और उन दर्शनों से जुड़े प्रतीक व कर्मकांडों सहित आर्य ब्राह्मणों ने चुरा लिया है। इसीलिये यह मानना चाहिए कि प्राचीन असुर, आज के गोंड, बौद्ध, रविदासी और कबीरपंथी एक ही श्रेणी में हैं और उनके सनातन शत्रु देव या सुर या आर्य या ब्राह्मण एक ही हैं।
समाधान ३३—
---------एक तरफ तो यहाँ महादेव, पार्वती, गणेश, सती काली को गोंडों के मिथकीय चरित्र बतलाया जाता है, दूसरी ओर पार्वती को आर्यों द्वारा भेज कर शम्भूसेक को पटाने की बात कही जाती है | वास्तव में सब कोरी कल्पना गढ़ी जारही है, भुस में लट्ठ मारने जैसी | वही बात है जीतने वाली जाति अपनी सभ्यता फैलाएगी या हारने वाले की सभ्यता चुरायेगी |
      माना जा सकता है की गणेश जो कि गणपति हैं आदिवासी सभ्यता में ग्राम के गणपति के रूप में पूजे जाते होंगे जैसे हर ग्राम में एक पथवारी देवी, एक ग्रामणी देवी, तालाब की देवी, आदि हुआ करती थीं | वनदेवी, पथदेवी का वर्णन तो वैदिक साहित्य में भी है |
  कथन ३४---  
------  आज प्रचलित ब्राह्मणी धर्म में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माने जाने वाले महादेव या शिव जिनका एक नाम शंभू भी है और उनकी संगिनी पार्वती सहित गौरी और सती से मिलते जुलते उल्लेख गोंडी संस्कृति की प्राचीन कथाओं में पाए जाते हैं।
         कोई यह तर्क दे सकता है कि ये प्रतीक और चरित्र गोंडों ने हिन्दू या ब्राह्मणी धर्म से लिये हैं। लेकिन इस आरोप का परीक्षण करें तो यह आरोप अपनी मौत खुद ही मर जाता है। ज्ञात इतिहास में कोयवंशी गोंड या आदिवासी समुदाय एक वनवासी समुदाय रहा है उनका स्थान आर्यों की वर्ण व्यवस्था में कहीं भी नहीं है, वे वर्णाश्रम धर्म की किसी भी व्यवस्था में किसी भी सामाजिक राजनीतिक स्थिति या भूमिका में नहीं रहे हैं। उन्हें किसी भी तरह न तो ब्राह्मणी धर्म की पवित्र भाषा संस्कृत सिखाई जा सकती थी ना ही वे ब्राह्मणी मंदिरों में प्रवेश करके दीक्षित हो सकते थे। बल्कि इसके विपरीत उनसे आर्यों के युद्ध और संघर्ष के अनेक उल्लेख मिलते हैं। इसीलिये उनके सम्बन्ध में यदि यह माना जाए कि वे आर्यों के साथ सामाजिक या धार्मिक प्रक्रियाओं के माध्यम से शिक्षित हुए और फिर उन्होंने ब्राह्मणी प्रतीकों के आधार पर दक्षिण में सुदूर मदुरै, कोणार्क से लेकर मध्य के अजन्ता-एलोरा, गढ़-चिचोली, अमरकंटक सहित सुदूर पश्चिम के कांधार और हड़प्पा मोहन जोदारो तक अपने प्रतीक व भाषा सहित मिथक भी रच लिए तो यह कल्पना, सुझाव या आरोप हास्यास्पद ही सिद्ध होगा।---
                 यह लेख यह दावा करना चाहता है कि असुरों से भी पहले आर्यों का सामना कोयवंशी गोंडों और संभुशेक द्वारा निर्मित संस्कृति से हुआ था। कालान्तर में आर्यों ने इस संस्कृति को सिलेक्टिव ढंग से आत्मसात करके उसी के आधार पर अपने विशवास और कर्मकांड रचे। यह घटना समय के सुदीर्घ विस्तार में हुई होगी और इसके बाद यहाँ स्थापित हो जाने के बाद उन्होंने देव और असुर जैसे दो स्पष्ट श्रेणियों का निर्माण करके उसके आधार पर मिथक और मिथकीय इतिहास रचा।
                  इस तरह के दावे करने का एक बहुत बड़ा कारण है वह ये है कि गोंडों की वाचिक परम्परा में संभुशेक का उल्लेख है जो बाद में हिन्दुओं के महादेव बन जाते हैं इसी तरह वैदिक और पौराणिक साहित्य में भी प्रमाण हैं कि शिव या महादेव कोई अचानक से प्रगट हो गए देवता नहीं हैं कहीं कहीं तो गणेश और शिव एक ही समान प्रतीत होते हैं। इस प्रकार हिन्दू परम्परा में महादेव और गणेश दोनों की उत्पत्ति और अस्तित्व बहुत जटिल है।
 ------------आर्य गोंड संग्राम को देवासुर संग्राम से प्राचीन मानने का दूसरा कारण है कि आर्यों का देव असुर संग्राम असल में ब्राह्मण आर्यों द्वारा गोंडी संस्कृति और गोंडी देवताओं को विशेषकर संभुशेक आत्मसात कर महादेव बना देने के बहुत बाद में आकार ले रहा है। इसीलिये देव असुर संग्राम के ब्राह्मणवादी संस्करण में अक्सर ही महादेव या शंभू का जिक्र आता है जो देवताओं को बचाने के लिए स्वयं युद्ध में उतरते हैं या ब्रह्मा या विष्णु या अन्य किसी देवी देवता के जरिये आर्यों या देवों की मदद करते हैं। इस प्रकार गण, शंभू, पार्वती, महादेव, त्रिशूल, त्रिमूर्ति, नर्मदा, पंचमढ़ी इत्यादि अनेकों अनेक शब्द और उनसे जुडी दार्शनिक या धार्मिक मान्यताएं असल में गोंडी धर्म भाषा और संस्कृति से सीधे सीधे चुराए गए हैं।
समाधान ३४--- 
---------दक्षिण में सुदूर मदुरै, कोणार्क से लेकर मध्य के अजन्ता-एलोरा, गढ़-चिचोली, अमरकंटक सहित सुदूर पश्चिम के कांधार आदि बहुत नवीन काल के हैं अतः इन्हें आदि संस्कृति गोंडी से जोड़ना हास्यास्पद ही है |
-------- हड़प्पा मोहनजोदारो इन उपरोक्त से बहुत पुरा काल के हैं जिन्हें गोंडी काल के कहा जा सकता है | वास्तव में तो असुर काल में आर्य थे ही नहीं आर्यों व असुरों के काल में युगों युगों का अंतर है | इंद्र, विष्णु आदि भी आर्य नहीं थे, इंद्र देवराज थे..सुर-असुर काल में तो आर्यों का अस्तित्व ही नहीं था, न ब्राह्मणी धर्म आदि |  वास्तव में तो यह है कि दोनों धर्म-संस्कृतियों का समन्वय हुआ और वे एक होगयीं ----अब व्यर्थ विदेशी शत्रुओं की चाल में फंसकर वितंडावाद खडा किया जा रहा है | 
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  ---------------- वास्तव में भारत के अफ्रीका से पृथक होकर द्वीप व प्रायद्वीप बनने तक शंभूसेक अपनी प्रजा जिसे आदिकालीन मानव गोंडी कह सकते हैं जो मानव वहीं दक्षिण भारत में ही बने रहे

-------जबकि अन्य मानव प्रगति करते हुए( हिमालय उत्थान से पहले ) भारतीय द्वीप व यूरेशिया खंड के मध्य स्थित दिति सागर ( टेथिस सागर ) को पार करता हुआ सरस्वती-मानसरोवर क्षेत्र –मेरु क्षेत्र में पूर्ण मानव में विक्सित होकर सर्वत्र फैलने लगा | 

--------वही ब्रह्मा, इंद्र , विष्णु के नेतृत्व वाला मानव सुमेरु के क्षेत्र एवं हिमालय की नीची श्रेणियों को पार करता हुआ पुनः उत्तर भारत होता हुआ मध्य क्षेत्र में पहुंचा 

--------जहां वहीं रहगए मानव अपने नेता शम्भूसेक के नेतृत्व में उन्नति करते हुए उत्तर की ओर बढ़ते हुए हरप्पा तक पूर्व हरप्पा सभ्यता बसाते हुए पहुंचे

-------- जहां दोनों सभ्यताओं का एक दूसरे को पहचान कर पुनः संगम हुआ | ( सन्दर्भ---पोस्ट ६ में विस्तार से )
आदि महादेव ( शंभू सेक ) व नंदी - आदि देवी( महिषी ) को प्रणाम साथ में सप्त-देवियाँ ---सिन्धु घाटी सभ्यता सील


गोंडवाना लेंड और भारत

गोंडवाना लेंड ,टेथिस सागर व लारेशिया लेंड
सिन्धु घाटी----मुख्य महिषी ( रानी) एवं पुरोहित-ब्राह्मण  ( या राजा-क्षत्रिय )
भारतीय भूखंड का गोंडवाना लेंडअफ्रीका से टूटकर उत्तर की और प्रवाह



सिन्धु घाटी सील----आदि योगी शिव का पूर्व रूप --पशुपति -महादेव या त्रिदेव का पूर्व रूप ...

प्रथम---आदिमानव का गमनागमन

द्वितीय मानव गमनागमन

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-------आदि-मानव कालीन नेता शम्भू सेक, जो मानव जाति के महान समन्वयक के रूप में सामने आये ने, इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा आदि के साथ दोनों सभ्यताओं के समन्वय से एक महान सभ्यता को जन्म दिया जो सरस्वती सभ्यता, सिन्धु घाटी सभ्यता व वैदिक सभ्यता कहलाई और शिव के कैलाश पर बसने के साथ वैदिक त्रिदेवों का उदय हुआ | ( सन्दर्भ -मेरा आलेख----जलप्रलय,गोंडवाना लेंड व भारत खंड , कहीं से हम आये थे नहीं व आर्य भारत के मूल निवासी ---ब्लॉग https://vijaanaati-vijaanaati-science.blogspot.com .....and....google.| )
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यह मानव इतिहास का प्रथम मानव समन्वय था अतः शंभू महादेव, देवाधिदेव कहलाये | अतः उपरोक्त त्रिशूल आदि सभी नाम समन्वित सभ्यता में प्रचलित रहे|

          क्रमश --पोस्ट नवम.......

 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (15-04-2017) को "बदला मिजाज मौसम का" (चर्चा अंक-2941) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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