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गुरुवार, 8 सितंबर 2016

संतुलित कहानी---डा श्याम गुप्त....

------ संतुलित कहानी -----

--------संतुलित कहानी, कथा की एक विशेष धारा है | इन कहानियों में मूलतः सामाजिक सरोकारों से युक्त कथाएं होती है जिनमें सरोकारों को इस प्रकार संतुलित रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि उनके किसी कथ्य या तथ्यांकन, चित्र, बिम्व या वर्णन का समाज व व्यक्ति के मन-मष्तिष्क पर कोई विपरीत अनिष्टकारी प्रभाव न पड़े अपितु कथ्यांकन में भावों व विचारों का एक संतुलन रहे एवं समाज व मानवता के उच्चादर्शों से समन्वित रहे तथा वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक व सामाजिक तथ्यों कथ्यों को इस प्रकार समन्वित भाव में प्रस्तुत किया जाय कि राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक रूप में समतामूलक संतुलन स्थापित का प्रयत्न रहे |
--------जिस प्रकार बहुत सी कहानियों या सिने-कथाओं में सेक्स वर्णन, वीभत्स रस या आतंकवाद-अनाचार, अत्याचार, अपराध, वलात्कार, हिंसा, नारी शोषण व हिंसा, डकैती, लूटपाट, द्वेष-द्वंद्व, चारित्रिक दुर्बलता, षडयंत्रों के जाल आदि के सामान्य, घिनौने या अतिशय चित्रांकन, कथन, वर्णन आदि से जनमानस में उसे नकारात्मक रूप में अपनाने की प्रवृत्ति व्याप्त हो सकती है | अतः संतुलित कहानियों में इन सबके वर्णन, कथ्यांकन, चित्रण, कथोपकथन से बचा जाता है |
--------कथा साहित्य में यह विधा डा रंगनाथ मिश्र सत्य द्वारा १९७५ ई में आतंकवाद की विभीषिका के विरुद्ध स्थापित की गयी | जो हिन्दी जगत में आतंकवाद, अत्याचार, अनाचार व शोषण के विरुद्ध मानवीय-मनोवैज्ञानिक ढंग से वैचारिक-सांस्कृतिक जागृति उत्पन्न करने का विशिष्ट कृतित्व है एवं समाज को भटकाव से बचाने हेतु एक स्तुत्य प्रयास |
--------संतुलित कहानियों के कई संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, यथा संतुलित कहानी के नौ रत्न-१९९६ संतुलित कहानी के पंचादश रत्न-२००२ ---सम्पादन साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य |
---------डा रंगनाथ मिश्र सत्य की कहानी ‘अनंत पिपासा, व केक्टस..मंजू सक्सेना की कथा-;चितकबरी...स्नेहप्रभा की ‘ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया’.. राजेश द्विवेदी की वाह मानव बेड़ा’ क्षमापूर्णा पाठक की ‘अंततोगत्वा’ अनिल किशोर शुक्ल निडर की प्रायश्चित आदि प्रारम्भिक कहानियां है | वर्तमान में गिरिजाशंकर पाण्डेय, राजेन्द्रनाथ सिंह, सुरेन्द्र नाथ, मंजू सक्सेना, डा श्यामगुप्त आदि की संतुलित कथाएं उल्लेखनीय हैं | हाल में ही श्री टेकचंद प्रेमी का कथा संग्रह 'कालदंड' इस श्रेणी की अगली कड़ी के रूप में प्रकाशित व लोकार्पित हुई है |

--प्रस्तुत है एक मेरी संतुलित कहानी ----


------ आठवीं रचना --- ड़ा श्याम गुप्त ------

----कमलेश जी की यह आठवीं रचना थी | अब तक वे दो महाकाव्य, दो खंड काव्य व तीन काव्य संग्रह लिख चुके थे | जैसे तैसे स्वयं खर्च करके छपवा भी चुके थे | पर अब तक किसी लाभ से बंचित ही थे | आर्थिक लाभ की अधिक चाह भी नहीं रही| जहां भी जाते प्रकाशक, बुक सेलर, वेंडर, पुस्तक-भवन, स्कूल, कालिज, लाइब्रेरी एक ही उत्तर मिलता, आजकल कविता कौन पढ़ता है, वैठे ठाले लोगों का शगल रह गया है या फिर बुद्धिबादियों का बुद्धिविलास, न कोई बेचने को तैयार है न खरीदने को | हां नाते-रिश्तेदार, मित्रगण मुफ्त में लेने को अवश्य लालायित रहते हें और फिर घर में इधरउधर पड़ी रहतीं हैं |
----काव्य गोष्ठियों में उन्हें सराहा जाता, तब उन्हें लगता कि वे भी कवि हैं तथा कालिदास, तुलसी, निराला के क्रम की कड़ी तो हैं ही | पर यश भी अभी कहाँ मिल पाया था | बस एक दैनिक अखवार ने समीक्षा छापी थी, आधी-अधूरी | एक समीक्षा दो पन्ने वाले नवोदित अखवार ने स्थान भरने को छापदी थी | कुछ काव्य संग्रहों में सहयोग राशि के विकल्प पर कवितायें प्रकाशित हुईं | पुस्तकों के लोकार्पण भी कराये, आगुन्तुकों के चाय-पान व कवियों के पत्र-पुष्प समर्पण व आने-जाने के खर्च में जेब ढीली ही हुई | अधिकतर रचनाएँ रिश्तेदारों, मित्रों व कवियों में ही वितरित हो गईं | कुछ विभिन्न हिन्दी संस्थानों को भेज दी गईं जिनका कोई प्रत्युत्तर आजतक नहीं मिला जबकि हुल्लड़-हुडदंग वाली कवितायेँ, नेताओं पर कटाक्ष वाली फूहड़ हास्य-कविताओं वाले मंचीय-कवि, मंच पर, दूरदर्शन पर, केबुल आदि पर अपना सिक्का जमाने के अतिरिक्त आर्थिक लाभ से भी भरेपूरे रहते हैं |
----किसी कवि मित्र के साथ वे प्रोत्साहन की आशा में नगर के हिन्दी संस्थान भी गए | अध्यक्ष जी बड़ी विनम्रता से मिले, बोले, पुस्तकें तो आजकल सभी छपा लेते हैं, पर पढ़ता व खरीदता कौन है? संस्थान की लिखी पुस्तकें भी कहाँ बिकतीं हैं | हिन्दी के साथ यही तो होरहा है, कवि अधिक हैं पाठक कम | स्कूलों में पुस्तकों व विषयों के बोझ से कवितायें पढ़ने-पढ़ाने का समय किसे है | कालिज के छात्र अंग्रेज़ी व चटपटे नाविलों के दीवाने हैं, तो बच्चे हेरी-पोटर जैसी यथार्थ कहानियों के | युवा व प्रौढ़ वर्ग कमाने की आपाधापी में शेयर व स्टाक मार्केट के चक्कर में, इकोनोमिक टाइम्स, अंग्रेज़ी अखवार, इलेक्ट्रोनिक मीडिया के फेर में पड़े हैं | थोड़े बहुत हिन्दी पढ़ने वाले हैं वे चटपटी कहानियां व टाइम पास कथाओं को पढ़कर फेंक देने में लगे हैं | काव्य, कविता, साहित्य आदि पढ़ने का समय-समझने की ललक है ही कहाँ |
----पुस्तक का शीर्षक पढ़कर अध्यक्ष जी व्यंग्य मुद्रा में बोले, " काव्य रस रंग” अच्छा है पर शीर्षक देखकर इसे खोलेगा ही कौन | अरे ! आजकल तो दमदार शीर्षक चलते हैं, जैसे- 'शादी मेरे बाप की', ईश्वर कहीं नहीं है’, ‘नेताजी की गप्पें', ‘राज-दरवारी’ आदि चौंकाने वाले शीर्षक हों तो इंटेरेस्ट उत्पन्न हो |
---- वे अपना सा मुंह लेकर लौट आये | तबसे वे यद्यपि लगातार लिख रहे हैं, पर स्वांत- सुखाय; किसी अन्य से छपवाने या प्रकाशन के फेर में न पड़ने का निर्णय ले चुके हैं | वे स्वयं की एक संस्था खोलेंगे | सहयोग से पत्रिका भी निकालेंगे एवं अपनी पुस्तकें भी प्रकाशित करायेंगे | पर वे सोचते हैं कि वे सक्षम हैं, कोई जिम्मेदारी नहीं, आर्थिक लाभ की भी मजबूरी नहीं है | पर जो नवोदित युवा लोग हैं व अन्य साहित्यकार हैं जो साहित्य व हिन्दी को ही लक्ष्य बनाकर ,इसकी सेवा में ही जीवन अर्पण करना चाहते हैं उनका क्या? और कैसे चलेगा ! और स्वयं हिन्दी भाषा व साहित्य का क्या ?

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (09-09-2016) को "हिन्दी, हिन्द की आत्मा है" (चर्चा अंक-2460) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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