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गुरुवार, 5 मार्च 2015

पिचकारी के तीर.......डा श्याम गुप्त....


             पिचकारी के तीर  

गोरे  गोरे  अंग पै, चटख चढि गये रंग,
रंगीले  आंचर  उडैं,  जैसें  नवल पतंग ।


चेहरे  सारे  पुत गये,  चढे  सयाने  रंग,
समझ कछू आवै नहीं, को सजनी को कंत ।

भये लजीले श्याम दौऊ, गोरे गाल, गुलाल,
गाल गुलावी होगये, भयो गुलाल रंग लाल |


लाल  हरे  पीले रंगे,  रंगे   अंग - प्रत्यंग ,
कज़्ज़ल-गिरि सी कामिनी, चढौ न कोऊ रंग।

चन्चुमुखी पिचकारि ते, वे छोडें रंग धार,
वे घूंघट की ओट ते , करें नैन के वार ।

भरि पिचकारी सखी पर,  वे रंग बान चलायं,
लौटें नैनन बान भय,  स्वयं सखा रंगि जायं ।


भ्रकुटि तानि बरजै सुमुखि, मन ही मन ललचाय,
पिचकारी ते श्याम की, तन मन सब रंगि जाय ।


लकुटि लिये सखियां खडीं, बदला आज चुकायं,
सुधि-बुधि भूलीं श्याम जब ले पिचकारी धायं ।


आज न मुरलीधर बचें,राधा मन मुसुकाय,
दौड़ी सुध बुधि भूलकर ,मुरली दाई बजाय |


भाँति भाँति की योजना, सभी धरी रह् जायं,
भरी पिचकारी श्याम जब, सम्मुख आ मुसुकायं |

होली खेली लाल नै, उडे अबीर गुलाल,
सुर,मुनि,ब्रह्मा,विष्णु,शिव,तीनोंलोक निहाल।


भक्ति  ज्ञान   औ प्रेम  की,  मन में उठै तरंग,
कर्म भरी पिचकारि ते,   रस भीजै अंग-अंग ।

एसी  होली  खेलिये,   जरै  त्रिविधि  संताप,
परमानन्द  प्रतीति हो,  ह्रदय बसें प्रभु आप ।


यह वर मुझको दीजिये, चतुर राधिका सोय,
होरी खेलत श्याम संग, दर्शन श्याम' को होय ॥

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