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शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

३० वर्ण की दो घनाक्षरी-----सूर घनाक्षरी...व श्याम-घनाक्षरी....डा श्याम गुप्त ...


                      

३० वर्ण की दो घनाक्षरी-----सूर घनाक्षरी...व श्याम-घनाक्षरी.......

 
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१. श्याम-घनाक्षरी, ...वर्ण- १६-१४ ..८ ८, ७ ७ पर यति, अंत में तीन गुरु (sss मगण)--
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बहु भांति पुष्प खिलें, कुञ्ज क्यारी उपवन,
रंग-विरंगी ओढे, धरन रजाई है |
केसर अबीर रोली, कुंकुंम, मेहंदी रंग,

घोल के कटोरों में, भूमि हरषाई है |
फैलि रहीं चहुँ ओर, लता मनमानी किये,
द्रुम चढीं शर्मायं, मन मुसुकाई हैं |
तिल मूंग बादाम के, लड्डू घर घर बनें ,
गज़क मंगोड़ों की, बहार सी छाई है ||
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२.सूर घनाक्षरी --३० वर्ण, चरणान्त लघु या गुरु, ८ ८, ८ ६ पर यति – ISS यगण)
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थर थर थर थर, कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु, सखि वो सुजानी |
सिहरि सिहरि उड़े, जियरा पखेरू सखि,
उर मांहि उमंगाये, पीर वो पुरानी |
बाल वृद्ध नारी नर, धूप बैठे तापि रहे,
धूप भी है कुछ खोई, सोई अलसानी |
शीत की लहर तीर, भांति तन बेधि रही,
मन उठै प्रीति की वो, लहर अजानी ||

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

श्याम स्मृति-१२६. --- काव्य -- मानवीय सृजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण – डा श्याम गुप्त

-----श्याम स्मृति-१२६. ---
*****काव्य -- मानवीय सृजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण – ***
-------- काव्य मानव-मन की संवेदनाओं का बौद्धिक सम्प्रेषण है--मानवीय सृजन में सर्वाधिक कठिन व रहस्यपूर्ण ; क्योंकि काव्य अंतःकरण के अभी अवयवों ---चित्त (स्मृति व धारणा ), मन ( संकल्प ), बुद्धि ( मूल्यांकन ), अहं ( आत्मबोध ) व स्वत्व (अनुभव व भाव ) आदि सभी के सामंजस्य से उत्पन्न होता है | तभी वह युगांतरकारी, युगसत्य, जन सम्प्रेषणीय, विराट-सत्याग्रही, बौद्धिक विकासकारी व सामाजिक चेतना का पुनुरुद्धारक हो पाता है |
---------काव्य--- इतिहास, दर्शन या विज्ञान के भांति कोरा कटु यथार्थ न होकर मूलरूप से वास्तविक व्यवहार जगत के अनुसार सत्यं, शिवं, सुन्दरं होता है, तभी उसका कथ्य युगानुरूप के साथ सार्वकालिक सत्य भी होता है|
---------साहित्यकार का दायित्व- नवीन युग-बोध को सही दिशा देना होता है तभी उसकी रचनाएँ कालजयी हो पाती हैं| आधुनिक व सामयिक साहित्य रचना के साथ-साथ ही सनातन व एतिहासिक विषयों पर पुनः-रचनाओं द्वारा समाज के दर्पण पर जमी धूलि को समय-समय साफ़ करते रहने से समयानुकूल प्रतिबिम्ब नए-नए भाव-रूपों में दृश्यमान होते हैं एवं प्रगति की भूमिका बनते हैं|

भारत ७० साल का होगया है - डा श्याम गुप्त

                               

                       

१.भारत ७० साल का होगया है -----एक समाचार , हिन्दुस्तान----
----हम भूल जाते हैं कि यह देश -जो भारत है - का जन्म १९४७ में नहीं हुआ ,अपितु लाखों वर्ष प्राचीन यह देश सृष्टि का आदि देश है , १९४७ में तो यह विदेशियों की गुलामी से स्वतंत्र हुआ था ---अतः पुनः स्वतंत्रता का ७०वा साल है |
--------हम, हमारा मीडिया कब अपना दायित्व समझेंगे ---अपनी भावी पीढी के समुचित मार्गदर्शन का -----



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बुधवार, 9 अगस्त 2017

रिश्ता सारमेय सुत का.-----..डा श्याम गुप्त की कहानी ----

रिश्ता सारमेय सुत का.-----..डा श्याम गुप्त की कहानी ----
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कालू कुत्ते ने झबरीली कुतिया का गेट खटखटाया और बोला,-
'भौं .s.s.भौं ऊँ भुक -अरे कोई है। '
झबरीली ने गेट की सलाखों के नीचे से झांका और गुर्राई, 'भूं ऊँ ऊँ भौं, कौन है ?'
भूं s भुक , मैं कालू ।
ओ s sभूं अक , क्या है, क्यों आये हो?
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                 रिश्ता लाया हूँ , कालू बोला,मेरी बेटी शरवती की आपके झबरू बेटे के साथ जोड़ी अच्छी रहेगी। क्या ख्याल है। झबरू भी शरबती के आगे पीछे घूमता रहता है।
-----------झबरीली इन्जीनियेर शर्मा साहब की कोठी में रहने वाली बड़े बड़े बालों वाली सफ़ेद अच्छी नस्ल की कुतिया थी। इठला कर गुर्राई,'भूं .s.s.भौं s sऔं भूट, तो इससे क्या , कालू कहीं का । चल हट, मेरा बेटा कोठी में पला-बढ़ा , साहबों की सोहबत में है, तू फटेहाल झौंपडी में रहने वाला कुत्ता! तेरी क्या मजाल । बड़ा आया। तेरे पास क्या है देने को? क्या दहेज़ देगा? कल ही नीलू कुतिया अपनी मिंकी बेटी का रिश्ता लाई थी। शगुन पर ही चांदी का पट्टा देने की बात कर रही थी।
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           भौं s s अंग.. भट, दो हड्डियां है मेरे पास, दावत के लिए, झोंपड़ी के पीछे दबा कर रखी हैं । पर ये दहेज़ क्या होता है? कालू असमंजस में पड़कर बोला।
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           भूं .s.s..s भू...अक:॥, अरे तभी तो। तुम गली के छोटे लोग हो, बड़े घरों की बातें कहाँ जानते हो। चल हट, बड़ा आया।
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          बातें सुनकर इधर-उधर के कुछ कुत्ते भी एकत्र होगये थे ।
--------अरे, ये आदमियों के चोंचले हैं । पड़ोस के सिल्की कुत्ते ने भों भों करके बताया। आदमी लोग बेटों की शादी में खूब माल काटते हैं। सोना, चांदी,कार, नकद रुपया-पैसा के साथ ही बेटे की शादी करते हैं। जो भी अधिक से अधिक दे सके..... ।-
---------हाँ हाँ , 'उस दिन जब में कोठी न. सोलह के साहब के यहाँ दावत में फैंकी हुई मिठाई, पूड़ी, सब्जी के मज़े लेरहा था तो मैंने भी सुना कि साहब को खूब माल व इम्पोर्टेड कार मिली है। कोई पच्चीस लाख की शादी थी । ' ब्राउनी कुत्ता बोला।
---------' पर जो देते हैं वे इतना सारा माल लाते कहाँ से होंगे। ' कालू ने पूछा।
            'कुछ नं. दो का चक्कर है। मैंने कुछ लोगों को यह भी कहते सुना था।' ब्राउनी बोला।
;-------यार ! ये आदमी भी अजीब , वेवकूफ जानवर है, मिठाई, पूड़ी आदि खाना, आखिर ये लोग फैंकते ही क्यों हैं? क्या मिलता इन्हें इसमें । '
'चलो हमारे लिए तो मज़े ही रहते हैं। '
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             ' हाँ सो तो है। पर हमारे साथ कुछ दुबले-पतले किस्म के इंसान भी तो टूट पड़ रहे थे उस खाने पर। क्या उन लोगों के पास इतना खाना नहीं होता।' ब्राउनी बोला।
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            'पता नहीं, ये इंसान भी विचित्र प्राणी है। कोई खूब खाना फैंकता है, कोई फैंके हुए को उठाता है। इसमें भी उसका कुछ मतलब ही होगा। क्योंकि मैंने सुना है कि आदमी बड़ा चतुर जानवर होता है, कोई काम बिना मतलब के नहीं करता।' सिल्की ने बताया।
--------' हो सकता है कोठी वाले आदमी लोग भी किसी के पालतू होते होंगे, जैसे झबरीली कुतिया और ये दुबले-पतले इंसान हमारी तरह गली झौंपडी वाले जानवर।' पप्पी पिल्ले ने अपना दिमाग लड़ाया ।
---------'हो..हो..हो॥, सब हंसते हुए भोंके, ये आदमी की लाइफ भी हम कुत्तों जैसी ही है। ' पर इनके गले में पट्टा तो नहीं दिखाई देता। ' ब्राउनी हंसते हुए बोला। 'शायद इनको पालने वाला जानवर इनसे भी अधिक चतुर होता होगा। '
         'भुक..भुक...भुक .s.s.और हम कुत्ते दहेज़ भी तो नहीं माँगते,बेटियों को नहीं जलाते। इसमें तो आदमियों से अच्छे ही हैं। अब सोलह न. वाले साहब को शादी में इतना मिला फिर भी साल भर बाद ही बहू को जलाने की कोशिश में जेल में हैं। ' ब्राउनी ने बताया।
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            ' वो तो भला हो भूरा का,' लंगडाकर धीरे धीरे आता हुआ चितकबरा कुत्ता बोला,'जो रात में भौंक भौंक कर सारा मोहल्ला जगा दिया, और बहू-बिटिया बच गयी।
-------- पड़ोस की पढी-लिखी सुमन दीदी, जो समाज-सेवा का काम करती है ; और वो जाने क्या होता है, नारी जागरण, के भाषण देती रहती है; अचानक जाग गयी और कुत्ता क्यों जाने लगातार भोंक रहा है, यह देखने दौड़ी चली आई। वरना ये लोग तो महीनों से हरकत कर रहे थे कोई आदमी बीच में पड़ने नहीं आया। '
---------' कृष्णा ..कृष्णा..एसा नीच कुकर्म, कमीना कुत्ता कहीं का। '
           ' भों.s..s.भौं .sss.. क्यों कुत्तों को गाली दे रहा है।' सिल्की गुर्राया।
--------'भूं.n.n..भूं..n.अक..सारी' , कालू सकपका कर बोला, 'मेरा मतलब था आदमी कहीं का। '
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             'अजीव है ये आदमी भी' , कालू सोचते हुए बोला, 'अपने भाई बंधुओं से ही दुश्मनी निकलता है,अपनी ही बहू-बेटियों को बिकने, जलने, मरने देता है। और कहावत बना रखी है,'क्यों कुत्तों की तरह लड़ते हो'; 'क्या इनका राजा या मुखिया नहीं होता,वो कुछ नहीं कहता?'
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                राजा..s..s..s.चितकबरा सोचते हुए बोला,' आदमी लोग स्वयं अपने राजा होते हैं,आज कल इनके यहाँ वो न जाने क्या है...मन्त्र या तंत्र व्यवस्था ; बड़ी अजीब सी चीज है। ये लोग स्वयं को वोट जैसी कुछ चीज देते हैं और खुद ही राजा बन जाते हैं। ----
---------कोई भी राजा बन जाता है। न कोई पराक्रम ,न विद्वता मंडली की या गुरु मंडली की कोई सलाह ली जाती है। न राजा का बेटा ही राजा होता है। भीड़ जिस तरफ होती है वही राजा बन जाता है। और कई बार तो साल में चार चार बार राजा बदल जाता है। कौन किसे मना करे, कौन किसे दंड दे। '
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        ' ये तो अंधेर नगरी वाली बात हुई। पर हम क्यों उनकी हरकतों को अपना रहे हैं?' सिल्की बोला।
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              ' अरे भाई! एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। अपनी जाति या समाज के पतन के लिए स्वयं हमारे काम ही तो जिम्मेदार होते हैं। ' अब देखलो साहबों के यहाँ रहने के कारण ही वो झबरीली को घमंड व दहेज़ जैसी बीमारी लग गयी है। मनुष्य तो कुत्तों को अपने स्वार्थ के लिए पालता है,गुलामी कराने को और उनकी गंदी आदतें कुत्तों में आ जाती हैं। अगर इसे शीघ्र ही नहीं रोका गया तो देखा-देखी अन्य कुत्तों में भी यह बीमारी फ़ैल सकती है। ' भूरा बोला,' आदमी शायद सभी जानवरों से बुरा है। '
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                 ' झबरीली तो बुरी तरह से बिगड़ गयी है। बस आदमियों के पीछे पीछे घूमती रहती है। उन्हीं की तरह बात करने की कोशिश करती है। अपने को आदमी ही समझने लगी है। बिस्कुट का नाश्ता,दूध-रोटी का लंच-डिनर, आदमी के खाने की अच्छी अच्छी चीज़ों के स्वाद में लालच ने इसे पागल कर दिया है। साहब ने कोट भी बनवा दिया है,साहब बनी घूमती है और गुलामी का पट्टा व ज़ंजीर गले में बांधे अपनी शान समझती है।
-------अच्छा खाना, पहनना, सोने के लालच में अपना कुत्तापन भी भूल गयी है। और बिगडैल आदमी की तरह बनती जारही है कुत्तों से तो बात ही नहीं करती, नकचढी कहीं की। ' ब्राउनी कुत्ता बोला।
---------' राम...राम ..एसा दुष्कृत्य और नीचता की बात कर रही है ये झबरीली। कमीनी आदमी कहीं की। ' कालू कुत्ता जोर से गुर्राया। ' इससे अच्छे तो हम कुत्ते ही हैं,आदमी तो कुत्तों से भी गया बीता है। कान पकडे जो अब झबरीली की तरफ पूंछ भी करूँ तो। कराले अपने बेटे की शादी आदमियों में ही। '\
' अरे जब कोई इसकी और मुंह उठाके देखेगा ही नहीं तो अपने आप झख मारकर कुत्तों की और दौड़ेगी।
--------आदमी तो इसके काम आयेगा नहीं,जब वह अपने आदमियों का ही नहीं होता , अपने लोगों को ही सताता है,उन्हें जलने मरने देता है तो कुत्तों का क्या होगा।
-------अगर सभी कुत्ते एकजुट होजाएं और इसका बायकाट करदें अपने आप ही सातवें आसमान पर चढ़ा दिमाग उतर जायगा। ' मरियल सा झबरीला कुत्ता बोला, ' मैंने इसे बहुत समझाया था पर इसने मुझे ही दौड़ाकर कोठी से बाहर निकलवा दिया। '
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अच्छा भाई कुत्तो! जय सारमेय , कालू बोला,' आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद, जो मुझे पाप में पड़ने से बचा लिया।
---------आप सब यहाँ बायकाट कराकर कुत्ता समाज सुधार संघर्ष में रत रहें , मैं अन्य कालोनियों में भी इसका बायकाट कराऊंगा। तभी एसे कुत्ते लोग ठीक होंगे। '

बुधवार, 2 अगस्त 2017

गरीबी, भूखे को रोटी-दूध .....मंदिर, भगवान, आस्था...डा श्याम गुप्त ....



               प्रेमचंद आदि गरीबों के मसीहा एवं आजकल कवियों, लेखकों, व्यंगकारों , समाज के ठेकेदारों, नेताओं, मीडिया का प्रिय विषय है...गरीबी, भूखे को रोटी-दूध .....मंदिरों, भगवान, मूर्तियों आदि आस्थाओं को तोड़कर उंनके स्थान पर ---गरीबों, भूखों को देना चाहिए ..आदि आदि --

-----उनके लिए कुछ छंद प्रस्तुत हैं----
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मेरे कारण नहीं है कोई, इस जगत में भूखा प्यासा,
यदि इक दिन मैं रोटी देदूं , क्या पूरी हो सब अभिलाषा |

पोथी लिखी व गाल बजाये, युगों गरीब गरीब चिल्लाए,
जो जैसा अब भी वैसा ही, क्यों न प्रभु से नेह लगाये |

जिसका जैसा भाग्य-कर्म है, उसको वैसा देता राम,
हम-तुम दें, या लिखें प्रेमचंद, आये नहीं किसी के काम |

पाथर पूजें, दूध चढे तो, रहे आस्था मन में जान,
बिना आस्था, कैसे कहिये, दे गरीब को कोई दान |

धर्म आस्था को नहीं तोडिये, यह है ईश्वर का सम्मान,
नारायण सम्मान नहीं यदि, कैसे हो नर का, श्रीमान |

मुंशी प्रेमचंद्र का आलेख-----साम्प्रदायिकता व संस्कृति---डा श्याम गुप्त ..

मुंशी प्रेमचंद्र का आलेख-----साम्प्रदायिकता व संस्कृति--चित्र में देखें ---- यह आलेख मुंशी जी ने १९३४ में लिखा था |
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-------मुंशी जी ने यहाँ संस्कृति , साम्प्रदायिकता --के बारे में लिखते हुए हिन्दू व मुस्लिम दोनों को एक ही पलड़े पर रखा था, दोनों के रहन सहन, व्यवहार, खान-पान एक ही से थे,वे कहते हैं कि ---तो लोग किस संस्कृति के रक्षण की बात करते हैं, संस्कृति रक्षण की बात लोगों को साम्प्रदायिकता की और लेजाने का पाखण्ड है |
--------वे कहते हैं कि संसार में हिन्दू ही एक जाति-- है जो गाय को अखाद्य व अपवित्र समझती है---- तो क्या इसके लिए हिन्दुओं कोसमस्त विश्व से धर्म संग्राम छेड़ देना चाहिए |
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एसा प्रतीत होता है कि वास्तव में मुंशीजी को विश्व की स्थितियों एवं इस्लाम धर्म व उसके अनुयाइयों की मूल व्यवहारिक व धार्मिक कट्टरता के बारे में अनुमान नहीं था, जो गलती गांधीजी ने की वही सभी गांधीवादी विचारों ने भी की, अन्यथा वे ऐसा न कहते ---यदि आज वे होते तो अपने कथन पर दुःख: प्रकट कर रहे होते ..उनकी कहानियों के रूप भी कुछ भिन्न होते ..आज यूरोप व एशिया के कुछ देशीं में गाय -वध दंडनीय अपराध है |

----जो उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम दोनों के समान संस्कृति, पहनावा, खान-पान की बात लिखी थी वह ब्रिटिश राज में दोनों के दास स्थिति में होने के कारण थी एवं अधिकाँश वे मुस्लिम हिन्दुओं से ही मुस्लिम बनाए हुए थे अतः अपना पहनावा आदि एक ही थे ...
-----स्वतन्त्रता मिलते ही स्थिति एक दम बदल गयी, पाकिस्तान के रूप में एवं मुस्लिमों का सहज आक्रामक रूप सामने आगया जो देश के विभाजन एवं उसके समय की वीभत्स घटनाओं से ज्ञात होता है एवं आज विश्व भर में फैले हुए आतंकवाद से |
---- तमाम बातें असत्य भी लिखी गयी है --यथा--हिन्दुओं द्वारा गाय को अपवित्र समझना --बिंदु ४..,,मद्रासी हिन्दू का संस्कृत न समझना --बिंदु -१..
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संस्कृति ही मानव का व्यवहार तय करती है और वह--सुसंस्कृति या अपसंस्कृति होती है | सुसंस्कृति का रक्षण होना ही चाहिए |

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