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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

कवि का वेलेंटाइन-- उपहार ---गीत...डा श्याम गुप्त ...

-------कवि का वेलेंटाइन-- उपहार ---गीत---









प्रिय तुमको दूं क्या उपहार |
मैं तो कवि हूँ मुझ पर क्या है ,
 कविता गीतों की झंकार |
प्रिय तुमको दूं क्या उपहार |

गीत रचूँ तो तुम ये समझना,
पायल कंगना चूड़ी खन खन |
छंद कहूं तो यही समझना ,
कर्ण फूल बिछुओं की रुन झुन

मुक्तक रूपी बिंदिया लाऊँ ,
या नगमों से होठ रचाऊँ |
ग़ज़ल कहूं तो उर में हे प्रिय !
पहनाया हीरों का हार ||—प्रिय तुमको….

दोहा, बरवै, छंद, सवैया ,
अलंकार रस छंद – विधान |
लाया तेरे अंग- अंग को,
विविधि रूप के प्रिय परिधान |

भाव ताल लय भाषा वाणी ,
अभिधा लक्षणा और व्यंजना |
तेरे प्रीति- गान कल्याणी,
तेरे रूप की प्रीति वन्दना |

नव- गीतों की बने अंगूठी ,
नव-अगीत की मेहंदी भाये |
जो घनाक्षरी सुनो तो समझो,
नक् -बेसर छलकाए प्यार |…–प्रिय तुमको….||

नज्मों की करधनी मंगालो,
साड़ी छप्पय कुंडलियों की |
चौपाई की मुक्ता-मणि से,
प्रिय तुम अपनी मांग सजालो |

शेर, समीक्षा, मस्तक- टीका,
बाजू बंद तुकांत छंद हों |
कज़रा अलता कथा कहानी,
पद, पदफूल व हाथफूल हों |

उपन्यास केशों की वेणी,
और अगीत फूलों का हार |
मंगल सूत्र सी वाणी- वन्दना ,
काव्य-शास्त्र दूं तुझपे वार |—-प्रिय तुमको ….||

बात गीतों की--आगे ---भाग तीन --डा श्याम गुप्त ---


                   

----------बात गीतों की--आगे ---भाग तीन --------

------------------लय साधने हेतु गीतों व छंदों में तुकांत का प्रयोग सनातन परम्परा से प्रारम्भ हुआ जो हिन्दी में तुकांत वर्णिक व मात्रिक छंदों युत गीतों का प्रयोग महाकाव्यों की लम्बी कवितायें एवं शास्त्रीय काव्य में ही रहा | लोकगीतों में तुकांत की अनिवार्यता कभी पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हुई अपितु केवल लय ही गीतों का मूलतत्व बना रहा | जो महादेवी, प्रसाद, सुमित्रानंदन पन्त आदि तक गीतों के रूप में चलती रही |

----------------- वास्तव में छायावाद के पश्चात के युग में अर्थात सत्तर के दशक में समाज की भांति साहित्य भी ठिठका हुआ था | स्वतंत्रता के पश्चात साहित्य में अंग्रेज़ी साहित्य एवं अन्य विदेशी साहित्य के प्रभाववश एवं समाज में स्वतंत्र चेतना की उत्पत्ति हुई परन्तु विशिष्ट साहित्यिक दिशा के बिना साहित्य भी समाज की भांति दिशाहीन था ? 

------अतः महादेवी-प्रसाद-पन्त के संक्षिप्त भावसौन्दर्य प्रधान छायावादी गीतों के बाद, निराला के अतुकांत छंदों व गीतों की क्रान्ति के समय तक गीतों की महत्ता व उपादेयता स्पष्ट दिखाई देती रही | 

------छायावादोत्तर युग में बच्चन, नीरज आदि के विलंवित लम्बे लम्बे गीतों के काल में, खुले मंच पर कविता व कवि सम्मेलनों के प्रादुर्भाव के कारण जिनमें लम्बे गीतों को सुनने का किसी के पास समय नहीं था अपितु मंच हेतु हलके-फुल्के काव्य, हास्य-कविता आदि के प्रादुर्भाव के साथ ही विभिन्न सामयिक वस्तु-विषयों का कविता में प्रवेश के कारण गीतों का प्रभाव कम हुआ|

------गीतों का लंबा होना एक दुर्गुण है इसमें भाव एक नहीं रह पाते और श्रोता भावों की भूलभुलैया में खोजाता है और भूल जाता है की वह क्या सुन रहा था | यही कारण है कि रूढ़ गीत इस बिंदु पर जड़ीभूत हुआ

-----परन्तु यह गीत की गतिशीलता एवं मृत्युंजय रूप ही है कि वह पारंपरिक रूप बनाए रहते हुए --अतुकांत गीतविधा ‘अगीत’ एवं तुकांत गीतविधा नवगीत के नए रूप में प्रतिष्ठित होकर भी आज अपने मूल रूप में जीवित है |
-------------------------------- इन सभी कारणों से कविता जगत में विभिन्न प्रकार के आन्दोलनों का प्रवेश हुआ जो अकविता, नयी कविता, गद्यगीत, अतुकांत गीत एवं उसका संक्षिप्त रूप अगीत तथा तुकांत-गीत के संक्षिप्त रूप नवगीत का अवतरण हुआ |

-----ग़ज़ल विधा के लोकप्रिय होने से भी गीतों की चमक पर प्रभाव पड़ा और यहाँ तक कहा जाने लगा कि ‘गीत मर गया’ परन्तु इस सब के बाबजूद भी हिन्दी में लोक व पारंपरिक गीत परम्परा की अजस्र धारा निरंतर प्रवहमान रही और आज भी प्रवहमान है |

------परम्परा से हटकर तुकांत व अतुकांत गीतों की एवं कविता की नवीन धाराओं के रूप में अतुकांत गीत की धारा अगीत एवं तुकांत गीत की धारा नवगीत ही आज जीवित हैं | अन्य सभी धाराएं काल के गाल में समा चुकी हैं|
--------------अगीत - अतुकांत गीत का संक्षिप्त रूप है जो गीत की मुख्य शर्त लय पर ही आधारित सामायिक आवश्यकता – संक्षिप्तता एवं तीब्र भाव-सम्प्रेषण के आधार दोहे व शेर की तर्ज़ पर रचा गया है |
-----अगीत का एक सुनिश्चित छंद विधान “ अगीत साहित्य दर्पण “ ( लेखक- डा श्यामगुप्त, प्रकाशक-सुषमा प्रकाशन एवं अखिल भारतीय अगीत परिषद्, लखनऊ..प्रकाशन –जनवरी २०१२ ई.) प्रकाशित होचुका है
-----एवं तुकांत गीति विधा के भांति ही इसके विभिन्न प्रकार के विविध छंद भी सृजित किये जाचुके हैं | आज यह गीत की एक सुस्थापित विधा है |
--------------नवगीत - वास्तव में मूल रूप से गीत ही है गीत के पारंपरिक रूप का पुनर्नवीनीकरण | गीत और नवगीत में काव्यरूपात्मक अंतर नहीं है। यह कोई नवीन विधानात्मक तथ्य भी नहीं है अपितु पारंपरिक गीत को ही मोड़-तोड़ कर लिख दिया जाता है |
----इसमें मूलतः तो तुकांतता का ही निर्वाह होता है और मात्राएँ भी लगभग सम ही होती हैं, कभी-कभी मात्राएँ असमान व अतुकांत पद भी आजाता है |
----मेरे विचार से इसे गीत का सलाद या खिचडी भी कहा जा सकता है | इसका स्पष्ट तथ्य-विधान भी नहीं मिलता तथा प्रायः कवि अपने निजी (ज़्यादातर काल्पनिक) अवसाद-आल्हाद को ऐकान्तिक भाव में गाता दिखाई देता है |
-----वस्तुतः यह है पारंपरिक गीत ही जिसे टुकड़ों में बाँट कर लिख दिया जाता है | ----उदाहरणार्थ---- एक नवगीत का अंश है—
टुकड़े टुकड़े
टूट जाएँगे     १६
मन के मनके
दर्द हरा है      १६ = ३२
धीरे-धीरे
ढल जाएगा
वक्त आज तक
कब ठहरा है?     ३२ ---- पूर्णिमा वर्मन का नवगीत ..

----सीधा -सीधा ३२ मात्राओं का पारंपरिक गीत है ...

----इसे ऐसे लिखिए --
धीरे धीरे ढल जाएगा वक्त आज तक, कब ठहरा है , ३२
टुकड़े-टुकड़े टूट जायंगे मन के मनके , दर्द हरा है | ३२

--------------------कहने का अर्थ है कि गीत आज भी जीवित है, अपने पारंपरिक रूप में भी एवं विविध नवीन रूपों में भी | वर्तमान में अनेकों गीतकार अपने गीतों से सरस्वती का भण्डार भर रहे हैं|
------भविष्य में या साहित्य के इतिहास में जब कभी सुरुचिपूर्ण गेय साहित्य या कविता की बात होगी तो गीतों-लोकगीतों-प्रेमगीतों का नाम सर्वोपरि रहेगा एवं गीत के दोनों नवीन रूपों अगीत एवं नवगीत का भी महत्वपूर्ण उल्लेख अवश्य किया जाएगा |
-----सजग रचनाकार सदैव परिष्कार और नवता के प्रति आग्रहशील रहे हैं, अतः पारम्परिक गीतों से गीत के इन नये स्वरूपों की समन्वित पहचान बनी |
-----यही कारण है, कि गीत के मर जाने की घोषणा का गीत के नये प्रारूपों, अगीत व नवगीत, दोनों विधाओं ने न केवल प्रतिकार किया अपितु स्वयं को सक्षम व प्रभावशाली रूप में साहित्य व समाज के सम्मुख विस्तृत रूप में प्रस्तुत भी किया |

-----क्रमशः---भाग चार ( अंतिम किश्त )-----

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

बात गीतों की ----भाग दो-------डा श्याम गुप्त-----


                          

बात गीतों की ----भाग दो-------डा श्याम गुप्त-----

                        वैदिक गीत स्वर-प्रधान थे| लौकिक संस्कृत में लयसाम्य और नाद-सौन्दर्य आधारित गीत परंपरा प्राप्त होती है | लौकिक काव्य परम्परा का श्रीगणेश आदिकवि बाल्मीकि से माना जाता है| यहीं से काव्य में वर्णानात्मकता के स्थान पर गीति-काव्यात्मकता का प्रवेश हुआ |विश्व की सर्वप्रथम मानवीय कथा उर्वशी-पुरुरवा की विरह कथा एवं क्रोंच-वध की घटना के कारण आदिकवि में पीड़ा-संवेदना द्वारा उत्पन्न काव्य के कारण ही परवर्ती काल में काव्य में कवियों में ‘वियोगी होगा पहला कवि ..’ जैसी एकल धारणा बनी, जो पूर्ण सत्य नहीं है |
                      वस्तुतः पूर्ण सत्य यही है कि प्रथम गीत/कविता प्रकृति के सुखद आश्चर्य मिश्रित रोमांच के कारण ही रची गयी| वैसे भी संयोग के बिना वियोग कहाँ, प्रेम के बिना विरह कहाँ, सुख के बिना दुःख कहाँ | अतः गीत में भावों व रसोद्द्वेगों की उत्सर्जना, विभिन्न संवेदनाओं, सुख-दुःख, प्रेम, श्रृंगार, सौन्दर्य, आश्चर्य, शौर्य सभी के द्वारा उद्भूत होती है | प्रेमी मन पहले प्रेमगीत गाता है तदुपरांत विरह दुःख होने पर विरह गीत |
                      प्रारंभिक लौकिक काव्य में गीत की अनिवार्य शर्त छंद एवं लयात्मकता रही है आदि कवि वाल्मीकि से लेकर अब तक गीत इसी रूप में पहचाना जाता रहा है। इसके पूर्व वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएं, जो गीत ही मानी जाती हैं लयबद्ध रचनाएँ ही हैं जो तुकांत आधारित नहीं हैं परवर्ती लौकिक काव्य में गीत की शर्तें छंद संतुलन और अंत्यानुप्रास (तुकान्त) मानी गयीं । परन्तु लोकगायकों के लोकगीतों व जनकाव्य में स्वर की महत्ता आरोह-अवरोह-स्वरित बनी रही तथा मात्रा व वर्णसंख्या व तुकांत की कठोर अनिवार्यता नहीं थी |
                       स्पष्ट है कि वैदिक साहित्य से लेकर अद्यतन अगीत / नवगीत तक लय ही एकमात्र ज़रूरी शर्त रही है गीत की | लम्बे गीतों में भाव-सौन्दर्य स्थिर नहीं रह पाता अतः गीत संक्षिप्त ही होने चाहिए | भावों एवं विचारों के सुन्दर समन्वय के साथ-साथ गीतात्मकता का सही सन्तुलन सफल गीत रचना की अनिवार्यता है। छंदशास्त्रों के नियमों को ध्यान में रखकर भी गीत लिखे जाते हैं और उन्मुक्त गायन के भाषा से भी गीतों की रचना होती है।
               जीवनगत भावों से गहरे संबंधित होने के कारण गीतों की रचना-प्रक्रिया जटिल होती है एवं भावुक क्षणों में छंदों के शास्त्रीय बंधन आवश्यक नहीं रह जाते तथापि लयात्मकता एवं संगीतात्मकता का तत्व सतत् बना रहता है।   खासकर लोकगीतों में तो यह धारा अविछिन्न बनी रहती है और छंद शास्त्र के अज्ञानी बने रहकर भी कवि मस्ती में, अपनी धुन में गाए जाता है, अमृत रस का संचार करते हुए |
              अन्तर्निहित भाव जब द्रव्यीभूत होकर तरलीकृत होते हैं तो गीत रूप में निसृत होते हैं | गीत जब व्यक्तिपरक उद्गार बन जाता है तब भी वह समाज के सामूहिक संवेग का ही प्रतिनिधित्व करता है|
                गीत की सबसे बड़ी अनिवार्यता उसकी लय है, उसमें विद्यमान गेयता है। निराला ने कविता को छन्दों के बन्धन से मुक्तहोने का जो कार्य किया है वह भी एक आवश्यकता थी। लेकिन निराला ने कविता में अन्त:संगीत की अनिवार्यता को भी नहीं नकारा।
              निराला-रचित मुक्तछंद की कविताओं में अन्त:गीत-संगीत सर्वथा विद्यमान है। इसी भाव पर डा रंगनाथ मिश्र सत्य द्वारा सातवें दशक में स्थापित अगीत कविता भी अपनी स्वर-लयबद्धता सहित अन्तः संगीत-गीत से आप्लावित है |

               गीत, प्रत्येक युग में मनुष्य के साथी रहे हैं। लोकजीवन अगर कहीं अपने नैसर्गिक रूप में आज भी सुरक्षित है तो वह है गीतों में। जब तक लोक रहेगा एवं लोक जीवन रहेगा तब तक गीतों में लोकजीवन का स्पन्दन विद्यमान रहेगा एवं भविष्य में जब कभी भी सरस कविताओं की बात होगी तो उसमें गीतों का स्थान सर्वोपरि रहेगा।
               आधुनिक युग में गीतों के भविष्य के बारे में प्रश्न चिन्ह लगाए जाते रहे हैं | परन्तु प्रश्न उठाने वाले भूल जाते हैं कि गीतों का संसार एक बहुरंगी संस्कृति है| प्रेम, श्रृंगार, पीड़ा आदि भाव मानव की मूलवृत्ति हैं, जब तक प्रकृति में सौंदर्य है, जगत में संवेदना का प्रवाह है, तब तक गीतों का अस्तित्व विद्यमान रहेगा। हाँ गीत युगानुसार अपना स्वरुप बदलते रहे हैं |
              सजग रचनाकार सदैव परिष्कार और नवता के प्रति आग्रहशील रहते हैं यह साहित्य व काव्य का धर्म भी है | सृजनशील व्यक्ति प्रयोगशील होता है, उसकी प्रतिभा एक पूर्व निश्चित ढाँचे में संतुष्टि नहीं पाती, वह नूतन आयामों को खोजकर अभिव्यक्ति के नवीन शिल्प, भाव, विधान व कथावस्तु में तृप्ति पाता है|
               सच्चे साहित्यकार परम्परा एवं नव-प्रयोग के सामंजस्य से आगे बढ़ते हैं | आदिकाल से अधुनातन युग तक काव्य में प्रवृत्यात्मक परिवर्तन निरन्तर होता रहा है, लोकप्रियता के आधार पर कभी किसी एक काव्यरूप को प्रमुखता मिली तो कभी दूसरे को|
              गीत और गीतेतर कविता का विवाद केवल अभी कुछ दशकों के उपज है | यह टकराव भी तथाकथित छांदसिक और अछांदसिक काव्य रूपों के बीच अधिक है जो केवल तुकांत छंदों को ही छंद समझने के भ्रम व सीमित ज्ञान के कारण है|
                        आचार्य भरत ने अत्यंत व्यापक रूप में वाक् तत्व को शब्द और काल तत्व को छन्द कहा है....
----. “छन्दहीनो न शब्दोSजस्त नच्छन्द शब्दवजजातम्। “-----अर्थात कोई शब्द या ध्वनि छन्द रहित नहीं और न ही कोई छन्द शब्द रहित है क्योंकि ध्वनि काल के बिना व्यक्त नहीं होती काल का ज्ञान ध्वनि के बिना संभव नहीं |  
                     आज मुक्तछंद कविता को कोई 'नई कविता` नहीं कहता।

--------क्रमशः बात गीतों की ..भाग तीन -----

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

बात गीतों की******-भाग एक..... डा श्याम गुप्त .......


                        बात गीतों की ----डा श्याम गुप्त ).......


-----भाग एक ------



-----------आज गीतों के ऊपर तमाम प्रश्न उठाये जा रहे हैं | गीत मर गए , अब तक प्रचलित सनातन गीत आज के समय के अनुकूल नहीं है, आदि आदि | उत्तर में नवगीत आदि विविध प्रकार की कविता विधाओं को खडा किया जा रहा है | काव्य एक गतिशील विधा है , समयानुसार उसमें प्रगति आना आवश्यक है, चाहे जितनी विधाओं की उत्पत्ति हो परन्तु उससे गीतों की मूल सनातन प्रकृति नहीं बदलती, वे प्रत्येक अवस्था में 'गीत' ही रहते हैं |
------------- ब्रह्म व प्रकृति के द्वैत-प्राकट्य पर अनाहतनाद से उद्भूत ओंकार की आदि ध्वनि से सृजित पुंजीभूत सृष्टि के साथ उत्पन्न स्वर-सप्तक के साथ ही प्रकृति में लयात्मकता युत प्रवाह से गीत का प्रादुर्भाव हुआ होगा |
-----आदि मानव ने जब उन्मुक्त प्रकृति के प्रांगण में प्रकृति की लयात्मकता, संगीतमयता युत विविध भावों, बादलों के गर्जन में एक भय-मिश्रित रोमांच, नदियों-झरनों के नाद घोष में, खगवृंदों के कल-कंठों के गायन में जीवन की पुकार को सुना होगा, चांद-तारों की रोशनी में, फूलों की हंसी में एक आकर्षण, एक सौंदर्य भावबोध का अनुभव किया होगा, गीत की वाणी तभी से थिरकने लगी होगी।
-----वैदिक ऋषियों का वचन है कि 'तेने ब्रह्म हृदा य आदि कवये'- अर्थात कल्प के प्रारंभ में आदि कवि ब्रह्मा के हृदय में वेद का प्राकट्य हुआ था।
---------------- स्वर के आविर्भाव के साथ सृष्टि के सर्वाधिक भावुक प्राणी मानव ने मूक इंगितों के स्थान पर शब्दहीन ध्वन्यात्मक इंगितों, अर्थहीन ध्वनियों द्वारा प्रकृति के दृश्यों-रूपों से उत्पन्न भय मिश्रित रोमांच, सुखद आश्चर्यप्रद अनुभूति की मुग्धावस्था एवं उससे उत्पन्न श्रद्धा के स्व-भावों का स्वयं में ही अथवा आपस में सम्प्रेषण करना प्रारम्भ किया होगा |
------शिव के डमरू से उत्पन्न स्वर-ताल व अक्षर एवं माँ सरस्वती की वीणा ध्वनि से उद्भूत वाणी के बैखरी रूप की उत्पत्ति पर उन्मुक्त प्रकृति के विभिन्न स्वर—संगीत, वायु के मर्मर स्वर, नदी की कल कल कल, झरने की झर झर झर, मेघ की घनन घनन घन, तडित की गर्ज़न, पशु पक्षियों के विवध कलरव के अनुकरण द्वारा विभिन्न स्वरों में ताल–लय बद्धता के साथ प्रसन्नता, रोमांच, आश्चर्य, श्रद्धा का प्रदर्शन करने लगा होगा | निश्चय ही यही संगीतमय उत्कंठित स्वर गीत के प्रथम स्वर थे|
------ मानव ने जब सर्वप्रथम बोलना प्रारम्भ किया होगा तो वह गद्य-कथन ही था, तदुपरांत गद्य में गाथा व गद्यगीत | अपने कथन को विशिष्ट, स्व व पर आनन्ददायी, अपनी व्यक्तिगत प्रभावी वक्तृता व शैली बनाने एवं दीर्घकालीन स्मृत्यांकन हेतु उसे सुर, लय, प्रवाह व गति देने के प्रयास में पद्य का, गीत का जन्म हुआ |
---------------माँ सरस्वती के कठोर तप स्वरुप ब्रह्मा द्वारा वरदान में प्राप्त पुत्र ‘काव्यपुरुष’ के अवतरण पर मानव मन में लयबद्ध एवं विषयानुरूप गीत का आविर्भाव हुआ जो पृथ्वी पर मानव जीवन के अस्तित्व के विविध भावों, कृतित्वों, कलापों, स्पंदनों के साथ लोकगीतों के रूप में हुआ |
-------इस प्रकार भौरों की गुंजार, कोयल की तान, मयूर के नृत्य, शिशुओं की मुस्कान, किसानों के श्रम, बादलों की गर्जन, दामिनी की चमक, पक्षियों की कलरव आदि प्रकृति के आदिम संगीत-गीत से जीवन में ऊर्जा एवं ताजगी का संचरण प्राप्त करते हुए, प्रकृति के हर क्रिया-व्यापार में स्थित लय से साम्य करते हुए विभिन्न भाव-स्वर लयबद्ध रूप में आविर्भूत हुए है और यह लय ही गीत है |
-------------- गीत, काव्य की सबसे पुरानी विधा है। सृष्टि की सबसे सुन्दर है कृति है मानव, और मानव की कृतियों में सबसे सुन्दर है- कविता | गीत--काव्य की सुन्दरतम प्रस्तुति है ।
-----गीत होते ही हैं मानव मन के सुख-दुख व अन्तर्द्वन्द्वों के अनुबन्धों की गाथा। जहां भावुक मन गीत सृष्टा हो तो वे मानव ह्रदय, जीवन, जगत, की सुखानुभूति, वेदना, संवेदना के द्वन्द्वों व अन्तर्संबंधों की संगीतमय यात्रा हो जाते हैं गीत के मूल में भावना व कल्पना दोनों का ही समत्व होता है |
-----यद्यपि कल्पना अनुरंजनशील वृत्ति की भांति है जिसमें संभाव्य एवं संभावित वस्तु का मानवीय अंकन किया जाता है| कल्पना पूर्ण अनुभूति का स्थान नहीं ले पाती | मनोवेगों के आरोह-अवरोह में उनके आधारों का संयोजन भावना करती है जो कल्पना से अधिक वास्तविक, स्थिर व कोमल वृत्ति है |
----- मन की एकाग्रता के लिए आतंरिक व वाह्य आधार का अवलंबन भावना द्वारा ही प्रस्तुत किये जाते हैं- कल्पना द्वारा नहीं | प्रेमी व भक्त अपने इष्ट की भावना करता है, कल्पना नहीं |
------------- भारतीय गीतिकाव्य की परम्परा विश्व साहित्य में सबसे पुरातन है | ऋग्वेद के पूर्व भी गीत पूर्ण-परिपक्व व सौन्दर्यमय रहा होगा | वैदिक मन्त्रों में स्वर संबंधी निर्देश मिलने से एवं स्थान स्थान पर पुरा-उक्थों के कथन से यह प्रतीत होता है कि मौखिक गीत-रचना परम्परा वेदों से पूर्व भी अवश्य रही होगी |
----- मानव इतिहास के प्राचीनतम साहित्य ऋग्वेद में मानव इतिहास के सर्वप्रथम गीत पाए जाते हैं | वे गीत प्रकृति व ईश्वर के प्रति सुखद आश्चर्य, रोमांच एवं श्रद्धा भाव के गीत ही हैं | ऋषियों ने प्रकृति की सुकुमारिता व सौन्दर्य का सजीव चित्रण किया है जो भावमयता व अर्थग्रहण के साथ मनोहारी कल्पनाएँ हैं | ऋग्वेद ७/७२ में वैदिककालीन एक प्रातः का वर्णन कितना सुन्दर व सजीव है ---

“विचेदुच्छंत्यश्विना उपासः प्र वां ब्रह्माणि कारवो भरन्ते |
उर्ध्व भानुं सविता देवो अश्रेद वृहदग्नयः समिधा जरन्ते ||”

----हे अश्वनी द्वय ! उषा द्वारा अन्धकार हटाने पर स्तोता आपकी प्रार्थना (स्वाध्याय, व्यायाम, योग आदि स्वास्थ्य वर्धक कृत्य की दैनिक चर्या ) करते हैं | सूर्य देवता ऊर्धगामी होते हुए तेजस्विता धारण कर रहे हैं | यज्ञ में समिधाओं द्वारा अग्नि प्रज्वलित हो रही है |
-----तथा …..
“एषा शुभ्रा न तन्वो विदार्नोहर्वेयस्नातो दृश्ये नो अस्थातु
अथ द्वेषो बाधमाना तमो स्युषा दिवो दुहिता ज्योतिषागात |
एषा प्रतीचि दुहिता दिवोन्हन पोषेव प्रदानिणते अणतः
व्युणतन्तो दाशुषे वार्याणि पुनः ज्योतिर्युवति पूर्वः पाक: ||”

----प्राची दिशा में उषा इस प्रकार आकर खड़ी होगई है जैसे सद्यस्नाता हो | वह अपने आंगिक सौन्दर्य से अनभिज्ञ है तथा उस सौन्दर्य के दर्शन हमें कराना चाहती है | संसार के समस्त द्वेष-अहंकार को दूर करती हुई दिवस-पुत्री यह उषा प्रकाश साथ लाई है, नतमस्तक होकर कल्याणी रमणी के सदृश्य पूर्व दिशि-पुत्री उषा मनुष्यों के सम्मुख खडी है | धार्मिक प्रवृत्ति के पुरुषों को ऐश्वर्य देती है | दिन का प्रकाश इसने पुनः सम्पूर्ण विश्व में फैला दिया है |
----------------- ऋग्वेद में प्रकृति के अतिरिक्त उर्वशी-पुरुरवा, यम-यमी, इंद्र-सरमा, अगस्त्य-लोपामुद्रा, इंद्र-इन्द्राणी के रूप में विभिन्न भावों की सूक्ष्म व्यंजनायें, नारी ह्रदय की कोमलता, दुर्बलता, काम-पिपासा, आशा, निराशा, विरह वेदना सभी के संगीत-गीत की अभिव्यक्ति हुई है |
---- यही सृष्टि के प्राचीनतम गीत हैं जिनकी पृष्ठभूमि पर परवर्ती काल में समस्त विश्व में काव्य का विकास हुआ, लोकगीतों-गीतों के विविध भाव-रूपों में | यजु, अथर्व एवं साम वेद में इनका पुनः विक्सित रूप प्राप्त होता है | साम तो स्वयं गीत का ही वेद है यथा- ऋषि कहता है......
”ओ3म् अग्न आ याहि वीतये ग्रृणानो हव्य दातये |
नि होता सत्सि बर्हिषि ||”
साम 1 ....
---- हे तेजस्वी अग्नि (ईश्वर) आप ही हमारे होता हो, समस्त कामना पूर्तिकारक स्त्रोता हो, हमारे ह्रदय रूपी अग्निकुंड ( यज्ञ ) हेतु आप ही गीत हो आप ही श्रोता हो |



-----------क्रमशः-----भाग दो-----

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

बात ग़ज़ल की ----डा श्याम गुप्त ....



        -----बात ग़ज़ल की -----



. ( -----कविता व शायरी ---- कविता, काव्य या साहित्य किसी विशेष, कालखंड, भाषा, देश या संस्कृति से बंधित नहीं होते | मानव जब मात्र मानव था जहां जाति, देश, वर्ण, काल, भाषा, संस्कृति से कोई सम्बन्ध नहीं था तब भी प्रकृति के रोमांच, भय, आशा-निराशा, सुख-दुःख आदि का अकेले में अथवा अन्य से सम्प्रेषण- शब्दहीन इंगितों, अर्थहीन उच्चारण स्वरों में करता होगा |
------आदिदेव शिव के डमरू से निसृत ध्वनि से बोलियाँ, अक्षर, शब्द की उत्पत्ति के साथ ही श्रुति रूप में कविता का आविर्भाव हुआ|
-----देव-संस्कृति में शिव व आदिशक्ति की अभाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह की सर्वप्रथम कथा के उपरांत देव-मानव या मानव संस्कृति की, मानव इतिहास की सर्वप्रथम भाषित रूप में व्यक्त प्रणय-विरह गाथा.... ‘उर्वशी–पुरुरवा’ ....की है |

------कहते हैं कि सुमेरु क्षेत्र, जम्बू-द्वीप, इलावर्त-खंड स्थित इन्द्रलोक या आज के उजबेकिस्तान की अप्सरा ( बसरे की हूर) उर्वशी, भरतखंड के राजा पुरुरवा पर मोहित होकर उसकी पत्नी बनी जो अपने देश से उत्तम नस्ल की भेड़ें तथा गले के लटकाने का स्थाली पात्र, वर्फीले देशों की अंगीठी –कांगड़ी- जो गले में लटकाई जाती है, लेकर आयी।
-------प्रणय-सुख भोगने के पश्चात उर्वशी …गंधर्वों अफरीदियों के साथ अपने देश चली गई और पुरूरवा उसके विरह में छाती पीटता रोता रहा, विश्व भर में उसे खोजता रहा। उसका विरह-रूदन गीत ऋग्वेद के मंत्रों में है, यहीं से संगीत, साहित्य और काव्य का प्रारम्भ हुआ।

------अर्वन देश (घोड़ों का देश) अरब तथा फारस के कवियों ने इसी की नकल में रूवाइयां लिखीं एवं तत्पश्चात ग़ज़ल आदि शायरी की विभिन्न विधाएं परवान चढी जिनमें प्रणय भावों के साथ-साथ मूलतः उत्कट विरह वेदना का निरूपण है । ------शायरी ईरान होती हुई भारत में उर्दू भाषा के माध्यम से आयी, प्रचलित हुई और सर्वग्राही भारतीय संस्कृति के स्वरूपानुसार हिन्दी ने इसे हिन्दुस्तानी-भारतीय बनाकर समाहित कर लिया| आज देवनागरी लिपि में उर्दू के साथ-साथ हिन्दुस्तानी, हिन्दी एवं अन्य सभी भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में भी शायरी की जा रही है |
-------शायरी अरबी, फारसी व उर्दू जुबान की काव्य-कला है | इसमें गज़ल, नज़्म, रुबाई, कते व शे’र आदि विविध छंद व काव्य-विधाएं प्रयोग होती हैं, जिनमें गज़ल सर्वाधिक लोकप्रिय हुई |
------गज़ल मूलतः शे’रों (अशार या अशआर) की मालिका होती है और प्रायः इसका प्रत्येक शे’र विषय–भाव में स्वतंत्र होता है |----

----- यहाँ हम ग़ज़ल के मूल रूप-भावों के बाते में बात करेंगे ....)



                     गज़ल दर्दे-दिल की बात बयाँ करने का सबसे माकूल खुशनुमां अंदाज़ है | इसका शिल्प भी अनूठा है | नज़्म  रुबाइयों, छंदों, गीतों  से जुदा | इसीलिये विश्व भर में जन-सामान्य में प्रचलित हुई | हिन्दी काव्य-कला में इस प्रकार के शिल्प की विधा नहीं मिलती | परन्तु हाँ, घनाक्षरी-छंद ( कवित्त ) एवं सवैया छंद  का शिल्प अवश्य ग़ज़ल की ही पद्धति का शिल्प है जिसमें रदीफ़ व काफिया के ही शब्द-भाव रहते हैं और गैर-रदीफ़ ग़ज़ल के भाव भी, परन्तु मतला नहीं होता। मेरे विचार से शायद कवित्त-छंद, ग़ज़ल का मूल प्रारम्भिक रूप है। उदाहरण देखिये......निम्न घनाक्षरी में रहीरदीफ़ है एवं शरमा व हरषा...आदि काफिया हैं.....
गाये कोयलिया तोता मैना बतकही करें,
कोंपलें लजाईं कली कली शरमा रही
झूमें नव पल्लव चहक रहे खग वृन्द,
आम्र बृक्ष बौर आये, ऋतु हरषा रही“ --- डा श्याम गुप्त

   इसी प्रकार  गैर-रदीफ़ ग़ज़ल का प्रारूप घनाक्षरी देखें --- जिसमें पदांत स्वयं सुजानी ...पुरानी आदि काफिया है।

थर थर थर थर कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु सखि वो सुजानी
सिहरि सिहरि उठे जियरा पखेरू सखि,
उर मांहि उमंगाये प्रीति वो पुरानी
बाल वृद्ध नर नारी बैठे धूप ताप रहे,
धूप भी है कुछ खोई-सोई अलसानी
शीत की लहर तीर भांति तन वेधि रही,
मन उठे प्रीति की वो लहर अजानी” ---डा श्याम गुप्त

सवैया छंद के प्रारूप भी देखें----
 -----बा रदीफ़ प्रारूप....
 पीने वाला यही चाहता गली गली मधुशाला हो |
 हर नुक्कड़ हर मोड़ जो मिले मदिरा पीने वाला हो |
अपनी अपनी सोच सभी की मन गोरा या काला हो |
सभी चाहते उनकी दुनिया में हर ओर उजाला हो ||     ---डा श्याम गुप्त

------गैर रदीफ़ प्रारूप देखें----
बैन वही जो उचारे सदा वही गोविन्द नाम भजे जग सारो |
रसना वही रसधार बहाय भजे जेहि गोविन्द नाम पियारो |
भक्ति वही गज़राज करी परे दुःख: में गोविन्द काज संवारो |
श्याम वही नर गोविन्द गोविन्द गोविन्द गोविन्द नाम उचारो ||      --डा श्याम गुप्त


          मैं कोई शायरी गज़ल का विशेषज्ञ ज्ञाता नहीं हूँ | परन्तु हम लोग हिन्दी फिल्मों के गीत सुनते हुए बड़े हुए हैं जिनमें वाद्य-इंस्ट्रूमेंटेशन की सुविधा हेतु गज़ल नज़्म आदि को भी गीत की भांति प्रस्तुत किया जाता रहा है-यथा…. साहिर लुधियानवी की प्रसिद्द हिन्दी ग़ज़ल...

संसार से भागे फिरते हो संसार को तुम क्या पाओगे।
इस लोक को भी अपना सके उस लोक में भी पछताओगे।

हम कहते हैं ये जग अपना है तुम कहते हो झूठा सपना है
हम जन्म बिता कर जाएंगे तुम जन्म गँवाकर जाओगे।

       छंदों गीतों के साथ-साथ दोहा अगीत-छंद लिखते हुए गज़ल सुनते, पढते हुए मैंने यह अनुभव किया कि उर्दू शे भी संक्षिप्तता सटीक भाव-सम्प्रेषण में दोहे अगीत की भांति ही है और इसका शिल्प दोहे की भांति ...अतः लिखा जा सकता है, और नज्में तो तुकांत-अतुकांत गीत के भांति ही हैं, और गज़लोंनज्मों का सिलसिला चलने लगा |

       गज़ल मूलतः अरबी भाषा का गीति-काव्य है जो काव्यात्मक अन्त्यानुप्रास युक्त छंद है और अरबी भाषा में कसीदा अर्थात प्रशस्ति-गान हेतु प्रयोग होता था जो राजा-महाराजाओं के लिए गाये जाते थे एवं असहनीय लंबे-लंबे वर्णन युक्त होते थे जिनमें औरतों औरतों के बारे में गुफ्तगू एक मूल विषय-भाग भी होता था | कसीदा के उसी भाग ताशिब को पृथक करके गज़ल का रूप नाम दिया गया

     गज़ल शब्द अरबी रेगिस्तान में पाए जाने वाले एक छोटे, चंचल पशु हिरण ( या हिरणी, मृग-मृगी ) से लिया गया है जिसे अरबी में ग़ज़ल (ghazal या guzal ) कहा जाता है | इसकी चमकदार, भोली-भाली नशीली आँखें, पतली लंबी टांगें, इधर-उधर उछल-उछल कर एक जगह टिकने वाली, नखरीली चाल के कारण उसकी तुलना अतिशय सौंदर्य के परकीया प्रतिमान वाली स्त्री से की जाती थी जैसे हिन्दी में मृगनयनी | अरबी लोग इसका शिकार बड़े शौक से करते थे | अतः अरब-कला प्रेम-काव्य में स्त्री-सौंदर्य, प्रेम, छलना, विरह-वियोग,  दर्द का प्रतिमान गज़ल के नाम से प्रचलित हुआ | जैसे भारतीय काव्य-गीतों में वीणासारंग का पीड़ात्मक-भावुक प्रसंग |  

       शायर फिराक गोरखपुरी के अनुसार  जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरन का पीछा करता हैं और हिरन भागते-भागते झाड़ी में फंस जाता है और निकल नहीं पाता, उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज निकलती है, उसी करूण स्वर को गजल कहते हैं. इसलिये विवशता का दिव्यतम रूप में प्रकट होना, स्वर का करूणतम हो जाना ही गजल का आदर्श है |
      यही गज़ल का अर्थ भी ..अर्थात इश्के-मजाज़ी - आशिक-माशूक वार्ता या प्रेम-गीत, जिनमें मूलतः विरह वियोग की उच्चतर अभिव्यक्ति होती है| मानव इतिहास की सर्वप्रथम प्रणय-विरह गाथा उत्तरापथ-उज्बेकिस्तान की अप्सरा उर्वशी एवं भरतखंड के नृपति पुरुरवा की है| उर्वशी के चले जाने पर पुरुरवा के विरह वेदनात्मक गीत ऋग्वेद में वर्णित हैं| यहीं से साहित्य व काव्य का प्रादुर्भाव हुआ | अरबी-फारसी कवियों ने इसी पर रुबाइयां लिखीं जो शायरी कहलाई एवं उसकी एक विशिष्ट विधा ग़ज़ल के नाम से परवान चढी | इसीलिये ग़ज़ल में शमा-परवाना, दीपक-शलभ, गुल-बुलबुल, कलिका-भ्रमर आदि प्रसंग प्रभावी हुए |  अरबी गज़ल ईरान होती हुई सारे विश्व में फ़ैली और जर्मन इंग्लिश में काफी लोक-प्रिय हुई | यथा.. अमेरिकी अंग्रेज़ी शायर ..आगा शाहिद अली कश्मीरी की  एक अंग्रेज़ी गज़ल का नमूना पेश है...
             Where are you now? Who lies beneath your spell tonight.                                                  
             Whom else rapture’s road you  expel  tonight ?

             My rivals, for your love, you have invited them all.
             This is mere insult, this is no farewell to night.

           गज़ल का मूल छंद शे या शेअर है | शेर वास्तव में दोहा का ही विकसित रूप है जो संक्षिप्तता में तीब्र सटीक भाव-सम्प्रेषण हेतु सर्वश्रेष्ठ छंद है | आजकल उसके अतुकांत रूप-भाव छंद, मेरे द्वारा सृजित..अगीत, नव-अगीत त्रिपदा-अगीत भी प्रचलित हैं| अरबी, तुर्की फारसी में भी इसे दोहा ही कहा जाता है अंग्रेज़ी में कसीदा मोनो राइम( quasida mono rhyme)|  अतः जो दोहा में सिद्धहस्त है अगीत लिख सकता है वह शे भी लिख सकता है..गज़ल भी | शेरों की मालिका ही गज़ल है | ग़ज़लों के ऐसे संग्रह को जिसमें हर हर्फ से कम से कम एक ग़ज़ल अवश्य हो दीवान कहते हैं।

       तुकांतता के अनुसार ग़ज़लें मुअद्दस या मुकफ्फा होती है| मुअद्दस गज़ल में रदीफ और काफिया दोनों का ध्यान रखा जाता है इसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल  भी कहते हैं .. यथा ....

                    उनसे मिले तो मीना सागर लिए हुए, 
                      
हमसे मिले तो जंग का तेवर लिए हुए
 
                     लड़की किसी ग़रीब की सड़कों पे गई
                    
गाली लबों पे हाथ में पत्थर लिए हुए |... - (जमील हापुडी)
एवं मुकफ्फा ग़ज़ल में केवल काफिया का ध्यान रखा जाता है इसे  ग़ैर मुरद्दफ़  या गैर रदीफ़ ग़ज़ल भी कहते हैं|  जैसे...
         जग कुछ भी कहे दास्ताँ तो सुनायेंगे |
         साथ मोहब्बत का निभाते ही जायेंगे |

         खाई है कसम न जाने की मयखाने 
         श्याम यादों की मय पीना न भुलायेंगे |   ...डा श्याम गुप्त  

             ग़ज़ल में  ग़ज़ल का प्रत्येक शे' अपने आप में पूर्ण होता है तथा शायर ग़ज़ल के प्रत्येक शे' में अलग अलग भाव को व्यक्त कर सकता है एवं प्रत्येक शेर में एक ही मूल भाव को क्रमिक भी रख सकता है | जब किसी ग़ज़ल के सभी शेर एक ही भाव को केन्द्र मान कर लिखे गए हों तो ऐसी ग़ज़ल को क्रमिक, जारी अर्थात मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं| यदि ग़ज़ल के प्रत्येक शे' अलग अलग भाव को व्यक्त करें तो ऐसी ग़ज़ल को ग़ैर मुसल्सल ग़ज़ल कहते हैं

          वस्तुतः  काव्य के मूल भाव के अनुरूप  ग़ज़ल में भी तकनीक की अपेक्षा भाव, प्रभावोत्पादकता प्रवाह ही अच्छी ग़ज़ल की पहचान है जिसमें मौलिकता हो, जिससे गीत कविता की ही भांति पढ़ने वाला समझे कि यह उस की स्वयं की दिल की  बातों का वर्णन है | प्रायः सुरूचिपूर्ण  जाने-पहचाने और सरल शब्दों का ही प्रयोग होना चाहिए | क्लिष्ट शब्द प्रवाह, गति, सम्प्रेषणता  एवं काव्यानंद में अवरोध उत्पन्न करते हैं | भाव चाहे कितना भी उच्च हो, छंद चाहे कितना ही उपयुक्त सुंदर हो लेकिन कथ्य की अस्पष्टता तथ्य की अवास्तविकता एवं उचित शब्दचयन भाषा व्याकरणीय शब्दक्रम आदि के होने से ग़ज़ल या कविता प्रभावहीन हो  जाती है। यह प्रायः काफिया या रदीफ़ को पूर्वोक्त से समान करने के क्रम में होता है, इसीलिये तो ग़ज़ल कहना आसान नहीं है | अस्पष्ट भाव, कथ्य एवं तथ्य  के बारे में एक प्रसिद्द शेर है-

           मगस को यूं बाग में जाने दीजिये
            महज़ परवाने बर्बाद होजाएंगे |

     शेर लाजवाब है लेकिन उसका अर्थ  समझ के परे है।  व्याख्या है कि - माली तू मगस (मधुमक्खी) को बाग में न जाने दे| वह गुलों का रस चूस कर पेड़ पर शहद का छत्ता बनायेगी, उस से मोम निकलेगा, उससे शमा बनेगी | जब शमा जलेगी तो बेचारा परवाना उस पर मंडराएगा और बिना वजह जल कर राख हो जाएगा।
            शब्द क्रम भी हिन्दी में अत्यंत महत्त्व रखता है | ग़ज़ल में शब्द क्रम का ख्याल न रहने से अर्थ-अनर्थ होजाता है देखिये ...
       नर्म होकर रुई सी लगी
      वो जो लड़की थी सख्त वारिश में | ...सूर्यभानु गुप्त, दै. जा.

शायद कवि कहना चाहता है कि जो लड़की सख्त थी वो भी वारिश में भीग कर नर्म होगई, परन्तु असम्बद्ध स्थान पर वारिश शब्द रखने से लगता है कि लड़की वारिश में सख्त थी |  तथा----

      कहाँ खो गई उसकी चीखें हवा में
    हुआ जो परिंदा ज़िबह ढूँढता है- ---संजय मासूम

शायद कवि कहना चाहता है कि 'ज़िबह' (कत्ल) हुआ पंछी हवा में खो गई अपनी 'चीखें' ढूँढ रहा है। लेकिन 'ज़िबह' ल़फ़्ज़ गलत जगह पर आने से अर्थ यही निकलता है कि वह ज़िबह की तलाश में है।

           भारत में शायरी गज़ल फारसी के साथ सूफी-संतों के प्रभाववश प्रचलित हुई जिसके छंद संस्कृत छंदों के समनुरूप होते हैं | फारसी में गज़ल के विषय रूप में सूफी प्रभाव से शब्द इश्के-मजाज़ी के होते हुए भी अर्थ रूप में इश्के हकीकी अर्थात ईश्वर-प्रेम, भक्ति, अध्यात्म, दर्शन आदि सम्मिलित होगये | प्रेमी को साधक और प्रेमिका को ब्रह्म का दर्जा मिल गया। सूफी साधना  विरह प्रधान साधना है। इसलिए फ़ारसी ग़ज़लों में भी  संयोग के बजाय वियोग पक्ष को ही प्रधानता मिली।
      फारसी से भारत में उर्दू में आने पर सामयिक राजभाषा के कारण विविध सामयिक विषय भारतीय प्रतीक कथ्य आने लगे | प्रारंभिक दौर में उर्दू गज़ल में श्रंगार के दोनों पक्षों संयोग-वियोग का ही वर्णन रहता था लेकिन बाद में उसमें परिवर्तन आया। उसमें उपदेश, नीति, चिंतन और देश-प्रेम की बातों का ज़िक्र किया जाने लगा यथा---

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में हैं

वक्त आने दे बताएंगे तुझे आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है। - --रामप्रसाद बिस्मिल

       उर्दू से हिन्दुस्तानी हिन्दी में आने पर गज़ल में वर्ण्य-विषयों का एक विराट संसार निर्मित हुआ और हर भारतीय भाषा में गज़ल कही जाने लगी | तदपि साकी, मीना सागर इश्के-मजाज़ी गजल का सदैव ही प्रिय विषय बना रहा | बकौल मिर्जा गालिव....

                    बनती नहीं है वादा सागर कहे बगैर |  

             यूं तो हिन्दी में ग़ज़ल कबीरदास जी द्वारा भी कही गयी बताई जाती है जिसे
  कतिपय विद्वानों द्वारा हिन्दी की सर्वप्रथम ग़ज़ल कहा जाता है, यथा....

              हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
               रहें आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?

               कबीरा इश्क का मारा, दुई को दूर कर दिल से,
               जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सर बोझ भारी क्या ?  .

            परन्तु मेरे विचार से इस ग़ज़ल की भाषा कबीर की भाषा से मेल नहीं खाती | हो सकता है यह प्रक्षिप्त हो एवं कबीर नाम के किसी और गज़लकार ने इसे कहा हो, एक शायर शाहिद कबीर भी हुए हैं |

          वास्तव में तो  हिन्दी में गज़ल का प्राम्म्भ आगरा में जन्मे पले शायर अमीर खुसरो (१२-१३ वीं शताब्दी)  से हुआ जिसने सबसे पहले इस भाषा को हिन्दवी कहा और वही आगे चलकर हिन्दी  कहलाई | खुसरो अपने ग़ज़लों के मिसरे का पहला भाग फारसी या उर्दू में दूसरा भाग हिन्दवी में कहते थे | उदाहरणार्थ... 
 
               जेहाले  मिस्कीं  मकुल तगाफुल,
                दुराये नैना बनाए बतियाँ |

              कि ताब--हिजां, न दारम--जाँ,                                                                                                                            
             लेहु काहे लगाय छतियाँ |”   

                            १७ वीं सदी में उर्दू के पहले शायर वली  ने भी हिन्दी को अपनाया देवनागरी लिपि का प्रयोग किया | ..यथा....                                       
         सजन सुख सेती  खोलो  नकाब आहिस्ता-आहिस्ता,
        कि ज्यों गुल से निकलता है गुलाव आहिस्ता-आहिस्ता |

               भारत में आने पर फारसी ग़ज़ल में हिन्दी के शब्दों को आत्मसात किया जाने लगा  एवं शमसुद्दीन वली औरन्गावादी, क़ुतुबशाह, चंद्रभान बरहमन  आदि  द्वारा दक्षिण भारत में लिखी –कही गयी जो दक्खिनी हिन्दी (१४-१५ वीं सदी) की ग़ज़ल थी,  जिसमें मराठी, कन्नड़, तेलगू का मिश्रण भी था| वली ने दिल्ली आने पर दक्खिनी हिन्दी की बजाय जवान ए मोअल्ला -उर्दू में लिखना प्रारम्भ किया | इस प्रकार वली ( १६६३-१७४०) सर्वप्रथम उर्दू में ग़ज़ल लिखने वाले हुए उन्होंने हिन्दी को भी अपनाया और दरबारी भाषा होने के कारण उर्दू ग़ज़ल का प्रचलन हुआ |  
 
                  सदियों तक गज़ल राजा-नबावों के दरबारों में सिर्फ इश्किया मानसिक विचार बनी रही जिसे उच्च कोटि की कला माना जाता रहा | परन्तु १८ वीं  सदी में आगरा के नजीर अकबरावादी  ने शायरी को सामान्य जन से जोड़ा और हिन्दी गज़लें लिखी एवं १९ वीं सदी के प्रारम्भ में मिर्ज़ा गालिव ने मानवीय जीवन के गीतों से | उदाहरणार्थ..... 

         जब फागुन रंग झलकते हों, तब देख बहारें होली की |
          परियों के रंग दमकते हों, तब देख बहारें होली की |” - ---नज़ीर अकबरावादी ---   तथा.... 

                 गालिव बुरा मान जो वाइज़ बुरा कहे ,
                 ऐसा भी है कोई कि सब अच्छा कहें जिसे |.......गालिव
                    १८ वीं सदी में गज़लकार इंसा अल्ला खां, के अलावा हिन्दी में गज़ल की पहल में भारतेंदु हरिश्चंद्र,  निराला,  जयशंकर प्रसाद  आदि ने सरोकारों की अभिव्यक्ति लोक-चेतना के स्वर दिए..यथा निराला ने कहा...
                 लोक में बंट जाय जो पूंजी तुम्हारे दिल में है   
       उन्हें अवकाश मिलता ही कहाँ है मुझसे मिलने का
       किसी से पूछ लेते हैं यही उपकार करते हैं|   ...जयशंकर प्रसाद 

        तत्पश्चात गालिव, जोक, मोमिन, दाग, अकबर इलाहाबादी, चकबस्त, इक़बाल. फिराक, जिगर मुरादाबादी आदि उर्दू ग़ज़लकारों के साथ साथ वाजिद अली शाह, बहादुरशाह ज़फर अदि ने भी हिन्दी का प्रयोग किया..
दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है | ---बहादुर शाह ज़फर

तुम मेरे पास होते हो
गोया कोइ दूसरा नहीं होता |  ...मोमिन
         त्रिलोचन, शमशेर, बलबीर सिंह रंग ने भी हिन्दी ग़ज़लों को आयाम दिए |


     परन्तु आधुनिक खड़ी बोली में हिन्दी-गज़ल के प्रारम्भ का श्रेय दुष्यंत कुमार को दिया जाता है जिन्होंने हिन्दी भाषा में गज़लें लिख कर गज़ल के विषय भावों को राजनैतिक, संवेदना, व्यवस्था, सामाजिक चेतना आदि के नए नए आयाम दिए |... दुष्यंत कुमार की एक गज़ल देखिये....  
  
                         कहाँ तो तय था चरागां हरेक घर के लिए
                        कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए ।

 इस प्रकार फारसी ग़ज़ल, फारसी से हिन्दवी, दक्खिनी हिन्दी में आई तत्पश्चात उर्दू में आई एवं पुनः उर्दू से हिन्दी व हिन्दी की समस्त बोलियों के साथ खड़ी बोली एवं सभी भारतीय देशज भाषाओं में प्रचलित हुई |  

              वस्तुतः हिन्दी भाषा ने अपने उदारचेता स्वभाववश उर्दू-फारसी के तमाम शब्दों को भी अपने में समाहित किया, अतः आज के अद्यतन समय में हिन्दी कवियों ने भी ग़ज़ल को अपनाया  समृद्ध किया है| हिन्दी गजल के पास अपनी विराट शब्द-संपदा है, मिथक हैं, मुहावरे, बिम्ब, प्रतीक, रदीफ-काफिये हैं। आज  हिन्दी-गजल में पारम्परिक गजल की काव्य-रूढ़ियों से मुक्त होने का प्रयास है तथा नए शिल्प और विषय के उत्तरोत्तर विकास का भी|  फलस्वरूप आज गज़ल हिन्दी-गज़ल में विषयों ग़ज़लकारों का एक विराट रचना संसार है जो प्रकाशित पुस्तकों, पत्रिकाओं, रचनाओं एवं अंतर्जाल( इंटरनेट) पर प्रकाशन द्वारा समस्त विश्व में फैला हुआ है तथा जो उर्दू गज़ल, हिन्दी ग़ज़ल, शुद्ध खड़ी-बोली, हिन्दी एवं हिन्दी की सह-बोलियों के शुद्ध मिश्रित रूपों से समस्त शायरी-विधा ग़ज़ल को समर्थ व समृद्ध कर रहे  है  तथा दिन दिन ग़ज़ल में गीतिका, नई ग़ज़ल, त्रिपदा-अगीत ग़ज़ल  आदि नाम से नए-नए प्रयोग भी होरहे हैं|
               
           मेरे विचार से हिन्दी ग़ज़ल के लिए एक जरूरी बात यह है कि हिन्दी व्याकरण की परिधि में शब्दों का विभाजन हो और मात्रा की गणना भी, ताकि ग़ज़ल के शिल्प और कथ्य में तारतम्य रह सके | उर्दू ज़बान का हिन्दी गज़ल पर हावी होना उसके स्वरूप के निखार में बाधक है। हिन्दी की अनेक गज़लें तो लगती हैं जैसे वे उर्दू की हैं उनमें हिन्दी की वह अपनी सोंधी-सोंधी सुगंध है ही नहीं एवं वह अरबी-फारसी के लफ्जों से दब कर रह गई है। हिन्दी की एक शुद्ध ग़ज़ल का हिस्सा देखिये...

छटा का कौन आकर्षण तिमिर में खींच लाया है
क्षितिज से व्योम में कोइ तरल तारा निकलता है |  ...त्रिलोचन शास्त्री

साहित्य सत्यं शिवं सुन्दर भाव होना चाहिए ,
साहित्य शुचि शुभ ज्ञान पारावार होना चाहिए |

ललित भाषा ललित कथ्य न सत्य तथ्य परे रहे ,
व्याकरण शुचि शुद्ध सौख्य समर्थ होना चाहिए |.. ...डा श्याम गुप्त


     यदि हिन्दुस्तानी भाषा के अनुरूप हिन्दी में घुलमिल गए उर्दू के लफ्ज़ों का इस्तेमाल हो जो सहज ही आजायें तो सौन्दर्य, प्रभाव व सम्प्रेषण की स्पष्टता बढ़ सकती है | यथा एक ग़ज़ल देखें ....

वो हारते ही कब हें जो सजदे में झुक लिए
यूं फख्र से जियो यूंही चलती रहे ये ज़िंदगी |   ---डा श्याम गुप्त

.
             चूँकि गज़ल मूलतः उर्दू से हिन्दी में आई है इसलिए यह मान लेना कि उसमें उर्दू के कुछ लफ्ज़ अवश्य हों उचित नहीं। अतः मेरे विचार में फ़ारसी, और उर्दू के क्लिष्ट शब्दों से परहेज़ करना ही उचित है | उदाहरणार्थ ऐसे उर्दू /फारसी शब्दों के प्रयोग का क्या लाभ जिसे हिन्दी वाले तो क्या उर्दू भाषी भी न समझ पायें.---..उदाहरणार्थ......

तहज़ीबो तमद्दुन है फ़कत नाम के लिए
गुम हो गई शाइस्तगी दुनिया की भीड़ में ---- कुँवर कुसुमेश

       आजकल  देखा जा रहा है कि हिन्दी ग़ज़ल में उर्दू शब्दों व व्याकरण का दबदवा बढाने व कायम रखने के प्रयास किये जारहे हैं, तर्क उस्ताद-परम्परा, ग़ज़ल-ज्ञान, उर्दू-परम्परा आदि के दिए जारहे हैं| वास्तव में आज के कुछ कवि शायर जिनका भाषा व वैयाकरण ज्ञान अल्प है, विषय आदि पर अपना कुछ मौलिक ज्ञान भी नहीं है उर्दू उस्तादों का तौर-तरीका व उन्हीं की नक़ल की लीक पर चलकर आगे बढ़ना चाहते हैं| यह हिन्दी ग़ज़ल के लिए एवं स्वयं ग़ज़ल के विकास व निखार में बाधक है अतः हिन्दी ग़ज़ल के पैरोकार उर्दू-फारसी ग़ज़ल या उस्तादी परम्परा, या उर्दू भाषा व शब्दों आदि को अधिक तवज्जो न देकर आचार्य भामह के स्व-अनुभव के कथ्यांकन पर चलते हुए आगे बढ़ रहे हैं| आखिर हिन्दी ग़ज़ल क्यों उर्दू के नियम कायदों पर ही चले | हिन्दी की अपनी स्वयं की मर्यादा है, मिजाज़ है, नीति-नियम है, विशिष्टता है, गति है, कला व भाव का अपना स्वरुप अर्थवत्ता व प्रभामंडल है |  तुलसी ने जब संस्कृत की बजाय भाखा ( हिन्दी ) में रामचरित मानस रची तब भी काशी के पंडितों ने तमाम सवाल उठाये थे |

        शायर ज़हीर कुरैशी (डा आज़म की पुस्तक --आसान अरूज़ की समीक्षा में) का विचार है कि बुनियादी कायदे क़ानून आवश्यक हैं, आवश्यक नहीं आप अरूज़ के माहिर बन जाएँ | इल्मे अरूज़ अर्थात शेर की बाहरी संरचना का महत्त्व सिर्फ २५% है तथा शेरो की आतंरिक संरचना का ७५%..जिसमें शायर के कथ्यांकन, भाव, विचार, विषय, संवेदना, कल्पनाशीलता, ज्ञान आदि रहते हैं| 

      नचिकेता का मानना है कि "हिन्दी ग़ज़ल, उर्दू ग़ज़लों की तरह न तो असंबद्ध कविता है और न इसका मुख्य स्वर पलायनवादी ही है, इसका मिजाज समर्पणवादी भी नही है !"   फैज़ अहमद फैज़ ने तो इतना तक कह डाला है कि "ग़ज़ल को अब हिन्दी वाले ही ज़िंदा रखेंगे, उर्दू वालों ने तो इसका गला घोंट दिया है !" 

          मेरा उर्दू भाषा ज्ञान उतना ही है जितना किसी आम उत्तर-भारतीय हिन्दी भाषी का | मुग़ल साम्राज्य की राजधानी आगरा (.प्र.) मेरा जन्म शिक्षा स्थल रहा है जहां की सरकारी भाषा अभी कुछ समय तक भी उर्दू ही थी | अतः वहाँ की जन-भाषा साहित्य की भाषा भी उर्दू- हिन्दी बृज मिश्रित हिन्दी है | इसी क्षेत्र के अमीर खुसरो ने सर्वप्रथम उर्दू हिन्दवी में मिश्रित गज़ल-नज्में आदि कहना प्रारम्भ किया | अतः इस कृति में अधिकाँश गज़लें, उर्दू-हिन्दी मिश्रित कहीं-कहीं बृजभाषा मिश्रित हैं | कहीं-कहीं उर्दू गज़लें हिन्दी गज़लें भी हैं |
 
             मुझे गज़ल आदि के शिल्प का भी प्रारंभिक ज्ञान ही है | अरूज़--बहर, वज्न, रुक्न, टुकड़े, सबव, वतद, मज़मूअ, तक्तीअ आदि का ज्ञान नहीं के बराबर ही है |  जब मैंने विभिन्न शायरों की शायरीगज़लें नज्में आदि सुनी-पढीं देखीं विशेषतया गज़ल...जो विविध प्रकार की थीं..बिना काफिया, बिना रदीफ, वज्न आदि का उठना गिरना आदि ...तो मुझे ख्याल आया कि बहरों-नियमों आदि के पीछे भागना व्यर्थ है, बस लय गति से गाते चलिए, गुनगुनाते चलिए गज़ल बनती चली जायगी, जो कभी मुरद्दस गज़ल होगी या मुसल्सल  या हम रदीफ,  कभी मुकद्दस गज़ल होगी या कभी मुकफ्फा गज़ल, कुछ फिसलती गज़लें होंगी कुछ भटकती ग़ज़ल |  हाँ लय गति यति युक्त गेयता भाव-सम्प्रेषणयुक्तता  तथा सामाजिक-सरोकार युक्त होना चाहिए और आपके पास भाषा, भाव, विषय-ज्ञान कथ्य-शक्ति होना  चाहिए |  यह बात गणबद्ध छंदों के लिए भी सच है | जैसा कि स्वयं भामह ने दूसरों की रचना, देखकर-पढ़कर, काव्यज्ञान की उपासना करते हुए काव्य-निर्माण में प्रवृत्त होने का भी विधान किया है| ... तो कुछ शे आदि जेहन में यूं चले आये.....

            मतला बगैर हो गज़ल, हो रदीफ भी नहीं,
             यह तो गज़ल नहीं, ये कोइ वाकया नहीं |

           लय गति हो ताल सुर सुगम, आनंद रस बहे,
             वह भी गज़ल है, चाहे  कोई काफिया नहीं | “  

            बस गाते-गुनगुनाते बिगड़ती-संभलती-फिसलती-भटकती जो गज़ले बनतीं गयीं... जिनमें त्रिपदा ग़ज़ल... त्रिपदा -अगीत गज़ल, आदि कुछ नए प्रयोग भी किये गए है.. यहाँ पेश हैं...मुलाहिजा फरमाइए ........

             मुलाहिजा फरमाइए, हो सके तो गुनगुनाइए |
               फूल या पत्थर, जिसपे जो हो, बरसाइये || “
                                                                                                                           
                                                 ------डा श्याम गुप्त