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सोमवार, 28 सितंबर 2015

उदयपुर..नाथद्वारा ...कोटा यात्रा ...भाग -३ कोटा .....ड़ा श्याम गुप्त ...

                  
 उदयपुर..नाथद्वारा ...कोटा यात्रा ...भाग -३..कोटा ...



कोटा राजस्थान का एक प्रमुख औद्योगिक एवं शैक्षणिक शहर है। यह राजस्थान का पांचवां बड़ा शहर है | राजधानी जयपुर से लगभग २४० किलोमीटर दूर सडक एवं रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है | दक्षिण राजस्थान में चंबल नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित कोटा उन शहरों में है जहां औद्योगीकरण बड़े पैमाने पर हुआ है। कोटा अनेक किलों, महलों, संग्रहालयों, मंदिरों और बगीचों के लिए लोकप्रिय है। यह शहर नवीनता और प्राचीनता का अनूठा मिश्रण है। जहां एक तरफ शहर के स्मारक प्राचीनता का बोध कराते हैं वहीं चंबल नदी पर बना हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्लान्ट और न्यूक्लियर पावर प्लान्ट आधुनिकता का एहसास कराता है।
कंसुआ --  कन्व ऋषि का आश्रम --छोटी सी नदी की धरा के किनारे अत्यंत प्राचीन शिव मंदिर है |जिसे शकुन्तला व दुष्यंत पुत्र भरत को पालने वाले कंव ऋषि का आश्रम कहा जाता है |  शकुंतला व भरत यहीं पीला थे यह तो निश्चित नहीं है | यहाँ चतुर्मुखी शिवलिंग हैं जो एकलिंग शिव के प्रतीक लगते हैं एवं शिवलिंग के साथ बनी हुई द्रोणी की बनावट से अत्यंत प्राचीन प्रतीत होती है|मंदिर भी अत्यंत पूरा शैली का बना हुआ है |
कण्व ऋषि का आश्रम ,कंसुआ, कोटा

अति-प्राचीन शिवलिंग -- चौकोर द्रोणिका

प्राचीन-चतुर्मुखी शिवलिंग
वे विष्णु (उत्तर), सूर्य (पूर्व), रुद्र (दक्षिण), और ब्रह्मा (पश्चिम) का प्रतिनिधित्व करते हैं।

 शिवपुरी धाम थेकड़ा--- ५२५ शिव लिंगों का मंदिर -जिनके मध्य में चतुर्मुखी शिव विराजमान हैं| एक ही पत्थर( काले ग्रेनाईट )
पारद का शिवलिंग एवं नंदी

ग्रेनाईट का १४ टन भार का शिवलिंग

५२५ शिवलिंगों के मध्य चतुर्मुखी शिवलिंग
से बना १४ टन वजनी व १५ फीट ऊंचा प्रदेश का सबसे बड़ा शिव लिंग भी यहीं स्थित है पारद का शिव लिंग भी यहाँ स्थित है |

दाड देवी -- खुले हुए मुख से दंतपंक्ति दिखाती हुई देवी की मूर्ति यहाँ स्थित है |
लंगूरों की फौज व स्थानीय भक्त

दाड देवी

खिड़की पर कब्जा जमाये हुए हनुमान जी
 

दाड देवी मंदिर -श्रीकांत, सुषमाजी व गीता जी 








खड़े गणेश जी ---
हिन्दू मंदिर का सामाजिक सरोकार -गुटखा खाने वालों के लिए महा-बम्पर पुरस्कार योजना

खड़े गणेश जी के मंदिर में



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उदयपुर..नाथद्वारा ...कोटा यात्रा ...भाग -2 उदयपुर .....ड़ा श्याम गुप्त ...

उदयपुर..नाथद्वारा ...कोटा यात्रा ...भाग -2 उदयपुर .....

                                   
 उदयपुर..नाथद्वारा ...कोटा यात्रा ...----भाग -2 उदयपुर  .....


सहेलियों की बाडी

सहेलियों की बाडी



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सिटी पेलेस -बाहरी गेट
 
सिटी पेलेस -मुख्य प्रवेश द्वार
सिटी पेलेस
       उदयपुर शहर, दक्षिणी राजस्थान राज्य की  पश्चिमोत्तर भारत  में, अरावली पर्वत श्रेणी  पर स्थित है। उदयपुर नगर मेवाड़ के गर्वीले राज्य की राजधानी है। उदयपुर को पहले मेवाड़ के नाम से जाना जाता था। यहां का मेवाड़ राजवंश अपने को सूर्यवंश से जोड़ता है। प्राचीन नगर प्राचीर द्वारा आबद्ध है जिसके चतुर्दिक्‌ रक्षा के लिए खाई खुदी हुई है | उदयपुर मेवाड़ के महाराणा प्रताप के पिता सूर्यवंशी नरेश महाराणा उदयसिंह के द्वारा 16वीं शती में बसाया गया था। मेवाड़ की प्राचीन राजधानी चित्तोड़ गढ़ थी।
फ़तेह सागर झील --पीछे लेक पेलेस
लेक पेलेस
फतेहसागर लेक --
स्थानीय महिलाओं के साथ सुषमाजी बोट पर
सिटी पेलेस

मूल श्रीनाथ जी
मूल श्रीनाथजी मंदिर -उदयपुर के निकट जहां पहले मथुरा से लाकर श्रीनाथजी को रखा गया था , नाथद्वारा में मंदिर बनने के पश्चात् ठाकुरजी को वहा स्थापित किया गया
       

          उदयपुर जिसे झीलों का शहर कहा जाता है उत्तरी भारत का सबसे आकर्षक पर्यटक शहर माना जाता है। है। झीलों के साथ मरुभूमि का अनोखा संगम अन्यम कहीं नहीं देखने को मिलता है। उदयपुर को हाल ही में विश्व का सबसे खूब सूरत शहर घोषित किया गया है |
खुर्रम ने जब जहांगीर के खिलाफ विद्रोह किया था तो वह उदयपुर में ही रहा था।
सात बहनें --उदयपुर के शासक जल के महत्वं को समझते थे। इसलिए उन्हों ने कई बाँध तथा जलकुण्ड बनवाए थे। ये कुण्ड उस समय की विकसित इंजीनियरिंग का सबूत हैं। पिछोला, दूध थाली, गोवर्धन सागर, कुमारी तालाब, रंगसागर, स्वरुप सागर तथा फतह सागर यहां की सात प्रमुख झीलें हैं। इन्हेंन सामूहिक रुप से उदयपुर की सात बहनों के नाम से जाना जाता है। ये झीलें कई शताब्दियों से उदयपुर की जीवनरेखा हैं। ये झीलें एक-दूसरें से जुड़ी हुई हैं। एक झील में पानी अधिक होने पर उसका पानी अपने आप दूसरे झील में चला जाता है।
हल्दी घाटी ----
उदयपुर से नाथद्वारा जाने वाली सड़क से कुछ दूर हटकर पहाडि़यों के बीच स्थित हल्दीघाटी इतिहास प्रसिद्ध वह स्थान है, जहां 1576 ई. में महाराणा प्रताप  और अकबर  की सेनाओं के बीच घोर युद्ध हुआ था। इस स्थान को 'गोगंदा' भी कहा जाता है। यह अरावली शृंखला में एक दर्रा (pass) हैइसका नाम 'हल्दीघाटी' इसलिये पड़ा क्योंकि यहाँ की मिट्टी हल्दी जैसी पीली है। 

हल्दी घाटी
हल्दी घाटी -संग्रहालय
हल्दी घाटी संग्रहालय 

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

उदयपुर..नाथद्वारा ...कोटा यात्रा ...भाग १--नाथद्वारा .....ड़ा श्याम गुप्त

...भाग १--नाथद्वारा .....ड़ा श्याम गुप्त

                           

                    राजस्थान में कोटा में मेरे मित्र श्रीकांत त्रिपाठी काफी समय से कोटा आने को आमंत्रित किये हुए थे |  अतः  नाथद्वारा साहित्य मंडल, राजस्थान  द्वारा हिंदी दिवस  १४ -९-१५ पर  मुझे 'हिन्दी साहित्य विभूषण की उपाधि' हेतु आमंत्रण किये जाने  पर  मैने इस अवसरको न गवाने का फैसला किया एवं सपत्नी उदयपुर व कोटा भ्रमण का  प्रोग्राम बनालिया |



नाथद्वारा- श्रीनाथ जी की प्रतिकृति

नाथद्वारा ---१४/१५/१६ -९-१५ .
          उदयपुर से 47 किलोमीटर उत्तरमें है| यहां श्रीनाथजी का मंदिर है। अतः इसे श्रीनाथद्वारा भी कहा जाता है| यह मंदिर पुष्टिमार्ग संप्रदाय के अनुयायियों का सबसे पवित्र स्थान है। श्रीनाथजी भगवान कृष्ण के ही रुप हैं। इस संप्रदाय की स्थाापना 16वीं शताब्दी में वल्लभाचार्य ने की थी। इस मंदिर में भगवान विष्णु की एक मूर्त्ति है। यह मूर्त्ति काले पत्थर की बनी हुई है। इस मूर्त्ति को औरंगजेब के कहर से सुरक्षित रखने के लिए 1669 ई. में मथुरा से लाया गया था। यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए दिन में सात बार खोला जाता  है, लेकिन हर बार सिर्फ आधे घण्टे के लिए। यह स्थान पिच्चमवाई पेंटिग्स के लिए भी प्रसिद्ध है। उदयपुर से यहां के लिए बसें चलती हैं।
सहित्य मंडल के प्रधान मंत्री श्री श्याम जी देवपुरा एवं श्री विट्ठल पारीक सञ्चालन करते हुए
         नाथद्वारा साहित्य मंडल के प्रधानमंत्री श्री श्याम जी देवपुरा द्वारा हिन्दी लाओ-देश बचाओ --कार्यक्रम के अंतर्गत ३ दिन का एक वृहद् साहित्यिक आयोजन किया गया | १५-९-१५ को राजस्थान ब्रजभाषा मंडल द्वारा ब्रजभाषा साहित्य पर परिचर्चा एवं काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया |
हिन्दी लाओ-देश्बचाओ अभियान

नाथद्वारा नगर में हिन्दी रैली

पुस्तक मेला


हिन्दी साहित्य विभूषण की उपाधि से सम्मानित साहित्यकार

ड़ा श्याम गुप्त-हिन्दी भाषा, साहित्य व अगीत पर वक्तव्य 

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

"हिन्दी साहित्य के 'सुदामा' थे 'श्रीश' जी" (अमन चाँदपुरी)

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हिन्दी साहित्य के 'सुदामा' थे 'श्रीश' जी

      पूर्वाचल के शब्दर्षिऔर 'साहित्य-सुदामाकहे जाने वाले छायावादोत्तर युग के अन्तिम कवि पंडित सत्यनारायण द्विवेदी 'श्रीशहिन्दी साहित्य जगत में अपना एक विशेष स्थान रखते हैं। इनका जन्म अम्बेडकर नगर (तत्कालीन फैजाबाद) के सेठवां गाँव में 12 अक्टूबर 1920 ई. में पंडित हरिप्रसाद द्विवेदी के प्रथम पुत्र के रूप में हुआ था,इनकी माता का नाम सोनादेवी था। सत्यनारायण व्रत कथा सुनने के बाद जन्म लेने के कारण ही इनका नाम सत्यनारायण पड़ा।

   इन्होनें प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालयों से प्राप्त की एवं स्वाध्याय से हिन्दीब्रजसंस्कृत और फारसी आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान अर्जित किया। इनका हस्तलेख मुद्रित अक्षरों को भी मात देता थावाणी में इतनी मधुरतासरलता एवं प्रेम घुला रहता कि हर कोई अपने-आप ही आकर्षित हो जाए।
   सन 1946 में पंडित संतरामधीरेन्द्र मजूमदार और आचार्य नरेन्द्र देव ने मिलकर गोसाईगंज में एक विद्यालय की स्थापना कीउसी में ये अध्यापन करने लगे। जब तक विद्यालय में रहेकवि सम्मेलन करता रहे और आस-पास के इलाकों में भी पचासों कवि सम्मेलन करा डालते। जिसमें देश के बड़े-बड़े कवियों की उपस्थिति होती थी। कभी-कभी तो कविगणों की संख्या50 को भी पार कर जाती थी। जिनमें सूंड फैजाबादीश्याम नारायण पांडेय,रमईकाकाउमाकांत मालवीयचंद्रशेखर मिश्रशिशुपाल सिंह 'शिशु',सीताराम चतुर्वेदीपारभ्रमरभारत भूषणमतवालामृगेशबलवीर सिंह'रंग', शारदश्रीपाल क्षेमसुमेर सिंह बेघलब्रजेंद्र अवस्थीशैलेश आदि प्रमुख रहे। निरन्तर साहित्य-साधना के कारण अयोध्यासिंह उपाध्याय'हरिऔध', सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानन्दन पंतमहादेवी वर्मा,डॉ. रामकुमार वर्मामहापंडित राहुल सांस्कृत्यायनविश्वनाथ प्रसाद मिश्र,आचार्य नन्ददुलारे बाजपेयीआचार्य रामकृष्ण दासशांतप्रिय द्विवेदी,भवानीभीख त्रिपाठी 'दिव्य', सनेहीउदयनारायण तिवारीपंडित क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्यायलक्ष्मीनारायण मिश्रश्रीनारायण चतुर्वेदीबाबा नागार्जुन और अंचल आदि से भी इनका अच्छा सम्बन्ध रहा।
    छात्र जीवन में ये इतिहासभूगोल आदि विषयों को भी छंदोबद्ध कर स्मरणीय बना लेते थे जिसका अन्य सहपाठी भी उपयोग करते थे। काव्य श्रृजन की प्रेरणा इन्हें परमपूज्य पिताश्री और भवानीभीख त्रिपाठी 'दिव्य'जी से मिली। इनकी पहली कविता अमेठी से निकलने वाली पत्रिका'मनस्वीमें और पहली कहानी 'नरेश' 6 दिसम्बर 1945 में 'आज'वाराणसी में प्रकाशित हुई।
    इन्होनें कुछ समय तक डॉ. रामकुमार वर्मा और महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन के साथ रहकर उनके पुस्तकों की पांडुलिपियाँ भी तैयार की। राहुल जी के रूस चले जाने पर ये हिंदी साहित्य सम्मेलनप्रयाग से जुड़ गए और यहाँ पर नागार्जुन जी से घनिष्टता हो गई और उन्हीं के साथ रहने भी लगे।
    इनकी चार पुस्तकें पाठकों के समक्ष आ सकी हैं जिनमें पहली पुस्तक'संकल्पिता' 1942 में शारदा प्रेसइलाहाबाद से प्रकाशित हुईइसी साल दूसरी पुस्तक 'सुभाष की विभाभी ज्योति प्रेसवाराणसी से प्रकाशित हुई,तीसरी पुस्तक 'गीतिकल्प' 1989 में और चौथी पुस्तक श्रीधर शास्त्री जी ने भारती परिषदप्रयाग द्वारा उनके पुत्रसुकवि श्री प्रकाश द्विवेदी जी के सम्पादन में 'कविता काकलीनाम से 2006 में प्रकाशित करायी। इनकी अन्य रचनाओं में दर्जनभर पांडुलिपियाँ हैं जो आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण पुस्तक का आकार नहीं ले सकी हैं। एक सामाजिक उपन्यास'उगता ताराभी इन्होनें लिखा थाजो अप्रकाशित ही है। साहित्य के प्रति अत्यंत उदासीन होने के कारण इनके 'द्रोणाचार्यएवं 'हनुमानआदि महाकाव्यों की पांडुलिपियाँ भी कहीं लुप्त हो गईजो भी इनसे मिलने आता और रचनाएँ पढने को माँगताये अपनी पांडुलिपियाँ थमा देते थेकुछ ही लोग लौटातेलेकिन ज्यादातर लोग या तो रख लेते या फिर खो देते।
     15 अक्टूबर 2001 को वीरेश्वर द्विवेदी (दिल्ली) की अध्यक्षता में अकबरपुर में इन्हे 'सारस्वत सम्मानसे विभूषित किया गया। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सन 2000 में इन्हें 'साहित्य भूषण' (50,000 रुपये) से भी सम्मानित किया गया। अन्य कई काव्य मंचों एवं संस्थाओं ने भी इन्हें सम्मानित किया।
    माँ शारदे के इस वरद पुत्र ने अपने पैतृक आवास सेठवां में 26 फरवरी2012 को दोपहर करीब 1:20 बजे लम्बी बीमारी के बाद 92 वर्ष की अवस्था में अन्तिम साँसें ली। हिन्दी साहित्य जगत में टिमटिमाते तारे की तरह 'श्रीशजी आज भी प्रकाशमान हैं। मुझे पूरे जीवन भर खेद रहेगा कि मैं इस विभूति का एकबार भी दर्शन नहीं कर सका और ये चले गये। इसी साल मैनें 15 मई को कागजी दुनिया में प्रवेश किया था। मैं अपनी चन्द पंक्तियाँ इन्हें समर्पित करता हूँ।
'श्रीशजी मुझको रहेगा ज़िन्दगी भर यह मलाल। 
आपके दर्शन से पहले ले गया आपको काल।। 
जनपदीय साहित्य में है आपका शीर्ष स्थान। 
शायद ही कोई हो पायेआगे आप समान।। 
(रचनाकाल -11 सितम्बर 2015)
अमन चाँदपुरी