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रविवार, 31 मई 2015

मेरी पहली दोस्त

जब हुआ मेरा सृजन,
माँ की कोख से|
मैं हो गया अचंभा,
यह सोचकर||

कहाँ आ गया मैं,
ये कौन लोग है मेरे इर्द-गिर्द|
इसी परेशानी से,
थक गया मैं रो-रोकर||

तभी एक कोमल हाथ,
लिये हुये ममता का एहसास|
दी तसल्ली और साहस,
मेरा माथा चूमकर||

मेरे रोने पर दूध पिलाती,
उसे पता होती मेरी हर जरूरत|
चाहती है वो मुझे,
अपनी जान से  भी बढ़कर||

उसकी मौजूदगी देती मेरे दिल को सुकून,
जिसका मेरी जुबां पर पहले नाम आया|
पहला कदम चला जिसकी,
उंगली पकड़कर||

http://hindikavitamanch.blogspot.in/2015/05/blog-post_13.html

शुक्रवार, 29 मई 2015

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी २८-५-१५.... डा श्याम गुप्त ...


                              
                               साप्ताहिक गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी दी.२८-५-१५ को डा श्याम गुप्त के आवास , सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना कोलोनी, लखनऊ पर संपन्न हुई | 
                 घनाक्षरी छंदों में  वाणी वन्दना से गोष्ठी का प्रारम्भ करते हुए डा श्याम गुप्त ने सातवें दशक में काव्य एवं गीत की दिशाहीनता की एतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए अतुकांत कविता में अगीत के  प्रादुर्भाव एवं आगे बढ़ने पर तथा गीत के नए कलेवर नवगीत के प्रादुर्भाव पर चर्चा की एवं अपना अगीत-गीत सुनाया--
मीत तुम गाओ  न गाओ अगीत हम गाकर रहेंगे |
मीत  मानो  या न मानो , छंद भावों में सजेंगे |

               श्री डा रंगनाथ मिश्र सत्य, श्री शीलेन्द्र चौहान, श्रीमती सुषमागुप्ता, रामदेव लाल विभोर, डा सुरेश प्रकाश शुक्ल, डा अखिलेश , श्री श्याम जी श्रीवास्तव, रवीन्द्र अनुरागी, मधुकर अस्थाना, श्री दुबे , श्री कृपाशंकर विश्वास, श्री अग्निहोत्री एवं डा श्याम गुप्त ने काव्य पाठ किया |

सुषमा गुप्ता काव्यपाठ करते हुए
श्री श्याम जी श्रीवास्तव का गीत
                उपस्थित कवियों द्वारा गंगा दशहरा, मानव आचरण एवं सामाजिक सरोकार के  विभिन्न विषयों पर गीत , गज़लें ,घनाक्षरी, सवैया  छंद , अगीत , नवगीत प्रस्तुत किये गए |
             श्रीमती सुषमा गुप्ता ने अपने उद्बोधन गीत द्वारा कवियों को नारियों के मान-सम्मान के प्रति गीत लिखने को प्रेरित करते हुए कहा--
नारियों के मान के हित , जग उठे अभिमान नर में |
आत्म के सम्मान की इच्छा उठे हर एक मन में |

            श्री अग्निहोत्री जी ने अपने गद्य में लिखे जाने वाले काव्य 'महाभारत' के अंश प्रस्तुत किये | डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने समापन काव्यपाठ के साथ सभी कवियों के काव्य पाठ की  संक्षिप्त समीक्षा सहित भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए  आभार प्रकट किया |
डा श्याम गुप्त  काव्य पाठ करते हुए साथ में -डा सुरेश शुक्ल, मधुकर अस्थाना, रामदेव लाल विभोर, डा श्याम गुप्त, शीलेन्द्र चौहान, डा रंगनाथ मिश्र सत्य,व डा अखिलेश
रवीन्द्र अनुरागी का काव्य पाठ --श्री


.दुबे, डा श्याम गुप्त, शीलेन्द्र चौहान, डा सत्य, डा अखिलेश, कृपाशंकर विश्वास ,श्याम जी श्रीवास्तव, रवीन्द्र अनुरागी
डा सुरेश शुक्ल का काव्य पाठ
संचालन श्री मधुकर अष्ठाना द्वारा किया गया | धन्यवाद ज्ञापन  श्रीमती सुषमा गुप्ता द्वारा किया गया |

बुधवार, 27 मई 2015

अगीत साहित्य दर्पण... की समीक्षा ---हिन्दी प्रचारक पत्रिका वाराणसी ----डा श्याम गुप्त

अगीत साहित्य दर्पण... की समीक्षा ---हिन्दी प्रचारक पत्रिका वाराणसी ----डा श्याम गुप्त


                                  
                        मेरे लक्षण ग्रन्थ -----अगीत साहित्य दर्पण.... अगीत साहित्य का छंद विधान व शास्त्रीय पक्ष की समीक्षा ---हिन्दी प्रचारक पत्रिका , वाराणसी में ......


शनिवार, 9 मई 2015

गज़ल्नुमा कविता


पत्नी एक इंसान है ,उसे देवी मत बनाइये
पति भी हाड़-मांस का है,उसे देव न बनाइये |

इंसान है तो उसे इंसान ही रहने दीजिये
न उसे राक्षस, न दानव ,न देव बनाइये |

देवी बनाकर पूजा नारी को, फिर किया छल
परदे के पीछे उसको, शोषण का शिकार न बनाइये |

पुत्र होना या पुत्री होना ,इसका जिम्मेदार है पुरुष

दकियानुस बनकर ,निर्दोष औरत को दोषी न बनाइये |


गर दोष नारी में है ,दोष पुरुष में भी है
दोषारोपण में जीवन को नरक न बनाइये |

कोई नहीं पूर्ण इस जग में,नारी हो या पुरुष हो 
पूर्णता के चक्कर में ,जीवन को दुखी न बनाइये |

कालीपद 'प्रसाद'