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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

"आदमी को हवस ही खाने लगी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जिन्दगी और मौत पर भीहवस है छाने लगी।
आदमी कोआदमी की हवस ही खाने लगी।।

हवस के कारणयहाँ गणतन्त्रता भी सो रही।
दासता सी आजआजादी निबल को हो रही।।

पालिकाओं और सदन मेंहवस का ही शोर है।
हवस के कारणबशर लगने लगा अब चोर है।।

उच्च-शिक्षा में अशिक्षाहवस बन कर पल रही।
न्याय में अन्याय की हीहोड़ जैसी चल रही।।

हबस के साये में हीशासन-प्रशासन चल रहा।
हवस के साये में ही नरनारियों को छल रहा।।

डॉक्टरोंकारीगरों कोहवस ने छोड़ा नही।
मास्टरों ने भी हवस सेअपना मुँह मोड़ा नही।।

बस हवस के जोर पर हीचल रही है नौकरी।
कामचोरों की धरोहरबन गयी अब चाकरी।।

हवस के बल पर हलाहलराजनीतिक घोलते।
हवस की धुन में सुखनवरपोल इनकी खोलते।।

चल पड़े उद्योग -धन्धेअब हवस की दौड़ में।
पा गये अल्लाह के बन्देकद हवस की होड़ में।।

राजनीति अबकलह और घात जैसी हो गयी।
अब हवस शैतानियत कीआँत जैसी हो गयी।।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

श्याम सवैया छंद.. डा श्याम गुप्त ....

                        मेरे द्वारा नव-सृजित छंद....श्याम सवैया ......जो छः पंक्तियों का  सवैया  छंद है जिसमें २२ से २६ तक वर्ण होसकते हैं ....


श्याम सवैया छंद........२२ वर्ण  ...छ पंक्तियाँ ) )

 
 जन्म मिले यदि......

जन्म मिलै यदि मानुस कौतौ भारत भूमि वही अनुरागी |
पूत बड़े नेता कौं बनूँनिज हित लगि देश की चिंता त्यागी |
पाहन ऊंचे मौल सजूँनित माया के दर्शन पाऊं सुभागी |
जो पसु हों तौ स्वान वहीमिले कोठी औ कार रहों बड़भागी |
काठ बनूँ तौ बनूँ कुर्सीमिलि  जावै मुराद मिले मन माँगी |
श्याम' जहै ठुकराऊं मिलेया फांसी या जेल सदा को हो दागी ||

 
वाहन हों तौ हीरो होंडाचलें बाल युवा सबही सुखरासी |
बास रहे दिल्ली बैंगलूरन चाहूँ अजुध्या मथुरा न कासी |
चाकरी प्रथम किलास मिले, सत्ता के मद में चूर नसा सी  |
पत्नी मिलै संभारै दोऊ, घर-    चाकरी बात न टारै ज़रा सी |
श्याम' मिलै बँगला-गाडी, औ दान -दहेज़ प्रचुर धन रासी |
जौ कवि हों तौ बसों लखनऊ, हर्षावै गीत अगीत विधा सी