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शनिवार, 21 मार्च 2015

नव संवत्सर-----डा श्याम गुप्त ...


सृष्टि रचयिता ने किया, सृष्टि सृजन प्रारम्भ |
चैत्र  शुक्ल  प्रतिपदा से, संवत्सर  आरम्भ ||

ऋतु बसंत  मदमा रही, पीताम्बर को ओढ़ |
हरियाली  साड़ी पहनधरती हुई विभोर  |

स्वर्ण थाल सा नव, प्रथम, सूर्योदय मन भाय |
धवल  चांदनी  चैत की, चांदी सी बिखराय |

फूलै फले नयी फसल, नवल अन्न  सरसाय |
सनातनी  नव-वर्ष  यह, प्रकृति-नटी हरषाय |

गुड़ीपडवा, उगादीचेटीचंड, चित्रेय |
विशु बैसाखी प्रतिपदा,संवत्सर नवरेह |

शुभ शुचि सुन्दर सुखद ऋतु, आता यह शुभ वर्ष |
धूम -धाम  से  मनाएं भारतीय  नव-वर्ष  |

पाश्चात्य  नववर्ष  को, सब त्यागें श्रीमान |
भारतीय  नववर्ष  हित, अब छेड़ें अभियान ||

बुधवार, 11 मार्च 2015

गंगा -प्रदूषण पर ...डा श्याम गुप्त....


      गंगा -प्रदूषण पर ...(घनाक्षरी छंद )

सदियों से पुष्प बहे, दीप-दान होते रहे ,
दूषित हुई न कभी नदियों की धारा है |
होते रहे हैं नहान, मुनियों के ज्ञान-ध्यान,
मानव का  सदा रही,  नदिया सहारा है |
बहते रहे शव भी, मेले- कुंभ  होते रहे ,
ग्राम नगर बस्ती के  जीवन की  धारा है |
 श्रद्धा, भक्ति, आस्था के कृत्यों से प्रदूषित गंगा .
छद्म-ज्ञानी, अज्ञानी, अधर्मियों का नारा है | |

नदीवासी जलचर, मीन  कच्छप मकर ,
नदिया सफाई हित, प्रकृति व्यापार  है |
पुष्प घृत  दीप बाती ,शव अस्थि चिता-भस्म,
जल शुद्धि-कारक,जीव-जन्तु आहार है |
मानव का मल-मूत्र, कारखाना-अपशिष्ट,
बने जल-जीवों के विनाश का आधार है |
यही सब कारण हैं, न कि आस्था के वे दीप,
आस्था बिना हुई प्रदूषित गंगधार है |

फैला अज्ञान तमस, लुप्त है विवेक, ज्ञान ,
श्रृद्धा आस्था से किया मानव ने किनारा है |
अपने ही दुष्कृत्यों का, मानव को नहीं भान
अपने कुकृत्यों से ही मानव स्वयं हारा है |
औद्योगिक गन्दगी, हानिकारक रसायन,
नदियों में बहाए जाते, किसी ने विचारा है |
नगरों के मल-मूत्र, बहाए जाते गंगा में,
इनसे  प्रदूषित हुई, गंगा की धारा है ||






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शुक्रवार, 6 मार्च 2015

क्या होली की प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है-होली के अवसर पर एक विचार ...डा श्याम गुप्त




क्या होली की प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है-होली के अवसर पर एक विचार ...डा श्याम गुप्त

                               

                पहले होली से हफ़्तों पहले गलियों बाज़ारों में निकलना कठिन हुआ करता था होली के रंगों के कारण | आज सभी होली के दिन आराम से आठ बजे सोकर उठते हैं, चाय-नाश्ता करके, दुकानों आदि पर बिक्री-धंधा करके, दस बजे सोचते हैं की चलो होली का दिन है खेल ही लिया जाय | दो चार दोस्तों –पड़ोसियों को रस्मी गुलाल १२ बजे तक सब फुस्स | वह उल्लास, उमंग कहाँ है, सब कुछ मशीन की भांति |
       घरों, बाज़ारों में रेडियो, टीवी पर हर वर्ष वही रस्मी घिसे-पिटे...अमिताभ के भौंडी आवाज़ में ..’रंग बरसे ...’ या ‘अंग से अंग मिलाना..’  जैसे भौंडे गीत बजाये जाने लगते हैं जैसे कोइ रस्म निभाई जा रही हो | कुछ पार्कों आदि में चंदे की राशि जुटाकर ठंडा आदि पीकर रस्म मना ली जाती है|  ब्रज-क्षेत्र में भी सभी कुछ उसी रस्म अदायगी की भाँति किया जा रहा है | फिर मेल मिलाप के इस कथित व प्रचारित पर्व पर प्रत्येक जाति, धर्म, संस्था, पार्टी द्वारा मनाया जाने वाला अपना अपना ‘होली मिलन का खेल’ |
 
        क्या वास्तव में आज होली के पर्व की कोइ प्रासंगिकता है या आवश्यकता (या किसी भी त्यौहार की )? शायद नहीं | वस्तुतः मशीनीकरण के इस कल-युग में, अर्थ-युग में मुझे नहीं लगता कि इस पर्व की कोइ भी प्रासंगिकता रह गयी है | होली मनाने के मूल कारण ये थे –
 
१.पौराणिक प्रसंग, विष्णु भक्त प्रहलाद की भक्ति की स्मृति में |
२, बुराई पर अच्छाई की विजय, बुराई का भष्म होना |
3.सामूहिक पर्व, उत्सव प्रियः मानवाः, खरीदारी-मेल मिलाप का अवसर, मेले-ठेले में..|
४.कृष्ण द्वारा होली उत्सव जो उस युग में महिलाओं के अधिकारों में कटौती के विरुद्ध संघर्ष था |
५. पर्यावरण व कृषि उत्सव
 
         आज के आधुनिक युग में जहां नेता-भक्ति या फिर देश-भक्ति महत्वपूर्ण है कैसी विष्णु भक्ति, कैसा उसका स्मरण | जाने कब से भ्रष्टाचार, स्त्री पर अत्याचार आदि बुराइयों को रोकने की बातें हो रही हैं कौन कान देरहा है, कौन भष्म करना चाह रहा है बुराइयों को | जहां तक सामूहिकता , सामाजिकता, उत्सव, मेल-मिलाप आदि की बात है तो जहां रोज रोज ही सन्डे-फनडे, मौल में बिक्री मेले, सेल, खरीदारी, किटी पार्टी, आफिस पार्टियां. ट्रीट पार्टियां चलती रहती हैं, किसे आवश्यकता है होली मेल मिलाप की |
           कृष्ण राधा का होली उत्सव उस काल में स्त्रियों के अधिकारों के विरुद्ध संघर्ष था | आज नारी सशक्तीकरण के युग में नारी स्वतंत्र होचुकी है, हर कार्य में पुरुषों को मात देने की योज़ना में है, इतनी खुल चुकी है की प्रतिदिन ही कम वस्त्र पहनने एवं स्वयं ही अपने वस्त्र उतारने में लिप्त है, तो महिलाओं के खुलेपन के लिए होली की क्या आवश्यकता है | 
          अब तो प्रतिदिन ही कूड़ा करकट का डिस्पोज़ल होता है अतः होलिका पर जो काठ-कबाड़ जलाया जाता था पर्यावरण सुधार हेतु उसका भी कोइ हेतु नहीं रह गया है | पेड़ों की डालें काट कर होली जलाने का औचित्य ही क्या है | अब तो खेतों में सदा ही कोइ न कोइ फसल होती रहती है, फसल कटाने का एक मौसम कहाँ होता है, फसल ट्रेक्टर व मशीन से कट कर तुरंत घर में रखली जाती है और किसान सिनेमा देखने व फ़िल्मी गीत सुनाने, टीवी देखने में समय बिताते हैं, गीत गाने, नाचने व होली मनाने का अवसर व फुर्सत ही कहाँ है |  
          निश्चय ही आज होली की प्रासंगिकता समाप्त होचुकी है | बस आर्थिक कारणों से प्रचार व रस्म-अदायगी रह गयी है | यह सभी पर्वों के लिए कहा जा सकता है |

गुरुवार, 5 मार्च 2015

पिचकारी के तीर.......डा श्याम गुप्त....


             पिचकारी के तीर  

गोरे  गोरे  अंग पै, चटख चढि गये रंग,
रंगीले  आंचर  उडैं,  जैसें  नवल पतंग ।


चेहरे  सारे  पुत गये,  चढे  सयाने  रंग,
समझ कछू आवै नहीं, को सजनी को कंत ।

भये लजीले श्याम दौऊ, गोरे गाल, गुलाल,
गाल गुलावी होगये, भयो गुलाल रंग लाल |


लाल  हरे  पीले रंगे,  रंगे   अंग - प्रत्यंग ,
कज़्ज़ल-गिरि सी कामिनी, चढौ न कोऊ रंग।

चन्चुमुखी पिचकारि ते, वे छोडें रंग धार,
वे घूंघट की ओट ते , करें नैन के वार ।

भरि पिचकारी सखी पर,  वे रंग बान चलायं,
लौटें नैनन बान भय,  स्वयं सखा रंगि जायं ।


भ्रकुटि तानि बरजै सुमुखि, मन ही मन ललचाय,
पिचकारी ते श्याम की, तन मन सब रंगि जाय ।


लकुटि लिये सखियां खडीं, बदला आज चुकायं,
सुधि-बुधि भूलीं श्याम जब ले पिचकारी धायं ।


आज न मुरलीधर बचें,राधा मन मुसुकाय,
दौड़ी सुध बुधि भूलकर ,मुरली दाई बजाय |


भाँति भाँति की योजना, सभी धरी रह् जायं,
भरी पिचकारी श्याम जब, सम्मुख आ मुसुकायं |

होली खेली लाल नै, उडे अबीर गुलाल,
सुर,मुनि,ब्रह्मा,विष्णु,शिव,तीनोंलोक निहाल।


भक्ति  ज्ञान   औ प्रेम  की,  मन में उठै तरंग,
कर्म भरी पिचकारि ते,   रस भीजै अंग-अंग ।

एसी  होली  खेलिये,   जरै  त्रिविधि  संताप,
परमानन्द  प्रतीति हो,  ह्रदय बसें प्रभु आप ।


यह वर मुझको दीजिये, चतुर राधिका सोय,
होरी खेलत श्याम संग, दर्शन श्याम' को होय ॥