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सोमवार, 28 अप्रैल 2014

समाज, समुदाय व संस्कृति- व्युत्पत्ति व अर्थवत्ता....डा श्याम गुप्त...



        समाज, समुदाय व संस्कृति- व्युत्पत्ति व अर्थवत्ता....
                            
               समाज शब्दअज् धातु में सम् उपसर्ग जुड़कर व्युत्पन्न होता है। अज धातु का अर्थ अजन्मा, सदैव गतिशील, क्रियाशील, ( इसीलिये अज ब्रह्मा को भी कहते हैं जो सदैव विश्व निर्माण व गति की प्रक्रिया में संलग्न हैं, बकरे का सिर भी सदैव गति करता रहता है अतः अज बकरे को भी कहते हैं) सम का अर्थ समान रूप से, सम्मिलित रूप से, सम्यक रूप से.. अर्थात् जिसमें रहकर मनुष्य सम्यक रूप से अपनी प्रगति अर्थात् उन्नति करते हैं, उसे समाज कहते हैं।

     समुदाय  शब्दसम् और उदाय शब्दों से व्युत्पन्न होता है| उदाय अर्थात उत धातु ..उदय, उत्थान अतः  समुदाय  शब्द का अर्थ हुआ मनुष्य के सम्यक रूप से ऊपर उठने का साधन |     

          समाज का अर्थ व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूह से न होकर व्यक्ति के परस्पर संबंधों से होता है। समाज  रीतियों और कार्य प्रणालियों, प्रभुत्व और पारस्परिक सहायता, विविध समूहों और श्रेणियों, मानव व्यवहार के नियन्त्रणों और स्वतन्त्रताओं की व्यवस्था है।  विविध समाजों या सामाजिक संस्थाओं में सामाजिक व्यवस्थायों, रीतियों, कार्य प्रणालियों, प्रभुत्व और पारस्परिक सहायता, समूहों और श्रेणियों का रूप निरन्तर बदलता रहता है| बृहद रूप में मानव इतिहास में, मानव समाज में मानव व्यवहार के नियन्त्रणों व स्वतन्त्रताओं का रूप निरन्तर बदलता रहा है।
     संस्कृत  शब्दसम् उपसर्ग एवं स्कृत शब्द के योग से बना है|  जो स्वयं कृ धातु के कृत शब्द में स ( सम्यक, समाशोधन ) उपसर्ग से मिलकर बना है| अतः रूप हुआ - सम + स्कृत। = संस्कृत...संसकारित, परिष्कारित  इसमें स्त्रीलिंग प्रत्यय लगा कर संस्कृति बना  है।
     संस्कृति ....विद्वान संस्कृति शब्द का प्रयोग मानव विकास के चिन्तन, सुन्दर, शालीन सूक्ष्म तत्वों तथा सामाजिक जीवन की, मानव की एवं मानव की प्रगति की परिष्कृत ..सत्यं, शिवं, सुन्दरं तथा रुचिर परम्परा के अर्थ में करते रहे हैं।
     संस्कृति का संबंध मुख्य रूपेण मानव आचरण से हैं, जिसे वह अपने पूर्वजों, माता-पिता, शिक्षकों तथा दिन-रात सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों से अपनाता है। व्यक्ति के सामान्य दैहिक आचरण जैसे - साँस लेना, रोना-हँसना आदि संस्कृति के अन्तर्गत नहीं आता।  वस्तुतः जन्म के बाद व्यक्ति को सामाजिक रूप से प्राप्तआचरण ही संस्कृति है।  सीखे हुए व्यवहार प्रकारों को,  उस समग्रता को,  जो किसी समूह को वैशिष्ट्य प्रदान करती है, संस्कृति की संज्ञा दी जाती है।
     संस्कृति मनुष्य की स्वयं की सृष्टि  है, इसका स्थायित्व, व्यक्तियों द्वारा अतीत की विरासत के प्रतीकात्मक संचार पर निर्भर है। क्योंकि इसका आधार,  जन्मदाता मनुष्य स्वयं परिवर्तनशील है अतः यह भी परिवर्तनशील है | नए विचार, नए व्यवहार,  नए अविष्कार... मनुष्यों के साथ-साथ  उसकी संस्कृति को भी प्रभावित करते हैं | विशेषता यह है कि परिवर्तनशील होते हुए भी संस्कृति सदैव व्यवस्थित होती है क्योंकि इसके एक तत्व में परिवर्तन आने पर,  दूसरा तत्व स्वतः ही परिवर्तित हो जाता है इसप्रकार सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था बनी रहती है|

 


मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

श्याम स्मृति- ...पुराण कथाएं व मिथक ...... डा श्याम गुप्त....



श्याम स्मृति- ...पुराण कथाएं व मिथक ......

        धर्म के तीन स्तर होते हैं----१- तात्विक ज्ञान---(मेटाफिजिक्स )...२-नैतिक ज्ञान--(एथिक्स )...३-कर्मकांड  (राइचुअल्स)....मूलतः कर्मकांडों का जो जन-व्यवहार के लिए होते हैंजन सामान्य के लिए...... उन्ही में अज्ञान ( तात्विक व नैतिक भाव लोप होने से ) से अतिरेकता आजाने से वे आलोचना के आधार बन जाते हैं | भारतीय पुराण कथाएं मूलतः कर्मकांड विभाग में आती हैं ताकि जन-जनजनसामान्य को ईश्वर, दर्शन, धर्म, ज्ञान व संसार-व्यवहार की बातें सामान्य जनभाषा में बताई जा सकें |
           
  जब भी कोई व्यवस्था या  सभ्यता अत्यंत उन्नत होजाती है तो उसकी बातेंतथ्य व 
कथ्य स्वतः ही सूत्र व कूट रूप में होने लगते हैंसंक्षिप्तता की आवश्यकतानुसार आधुनिक उदाहरण लें जैसे--भारत के लिए शेर,आस्ट्रेलिया के लिए कंगारू कहना आज आम बात होगई है|                                                          
                    भारतीय  पुराण-कथाएं सदा अन्योक्ति,  कूट व सूत्र रूप में कही गयी हैं परन्तु उनके वास्तविक/तात्विक अर्थ व्यवहारिक, नीति-परक व सामाजिक नीति व्यवस्था के होते है अर्थ न समझने के कारण लोग उन्हें प्रायः कपोल-कल्पित कह कर  उनका उपहास भी करते हैं और हिन्दू सनातन-धर्म के उपहास के लिए उदाहरण भी | अंग्रेज़ी व पाश्चात्य संस्कृति व भाषाओं में पौराणिक कथाओं के लिए मिथ, मिथक, मिथक-कथाएं आदि शब्दों का प्रयोग  भी इसी अज्ञानता का परिचायक है| 

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

दो नवगीत ..ब्रज बांसुरी" से......डा श्याम गुप्त ...

ब्रज बांसुरी" की रचनाएँ .......डा श्याम गुप्त ...
              

                     मेरे नवीनतम प्रकाशित  ब्रजभाषा काव्य संग्रह ..." ब्रज बांसुरी " ...की ब्रजभाषा में रचनाएँ  गीत, ग़ज़ल, पद, दोहे, घनाक्षरी, सवैया, श्याम -सवैया, पंचक सवैया, छप्पय, कुण्डलियाँ, अगीत, नवगीत आदि  मेरे  ब्लॉग .." हिन्दी हिन्दू हिंदुस्तान " ( http://hindihindoohindustaan.blogspot.com ) पर क्रमिक रूप में प्रकाशित की जायंगी ... .... 
        कृति--- ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा में विभिन्न काव्यविधाओं की रचनाओं का संग्रह )
         रचयिता ---डा श्याम गुप्त 
                     ---   सुषमा गुप्ता 
प्रस्तुत है .....भाव-अरपन ..सत्रह...नवगीत ....


१.कविता कविता खेलें

                      आऔ हम सब मिलिकैं ,
                      कविता कविता खेलें ||

 छंद औ अलंकार में भूलें
  विषय व्याकरन भाव |
लच्छनि बारी भासा होय तौ
का अनुभाव-विभाव |

भाँति भांति के उपमा रूपक,
गढ़िकें ऐसे लावैं |
जन जन की कहा बात,
नामधारी न समुझि पावैं |

                  नए नए बिम्बनि कौं ढूंढें ,
                  मिलिकैं पापड़ बेलें ||

आदि मध्य औ अंत में-
ना होय कोऊ लाग-लपेट |
छत्तीस व्यंजन ठूँसि कै बस-
भरिदें कविता कौ पेट |

ये दुनिया है संत्रासनि की ,
रोनौ-गानौ गायौ |
कवि तौ सुकवि औ समरथ है ,
कहा सुन्दर गीत सुनायौ |

                   का सारथकता, सामाजिकता,
                   सास्तर ज्ञान कौं पेलें ||

कम्प्युटर जुग में सब्दन के,
नए निकारें अर्थ |
कोऊ पूछै बतलाय डारें ,
सबके अर्थ -अनर्थ |

सुनें चुटकियाँ आज ,
हंसें रोवें घर जायकें |
जासौं पूछें अरथ,
 वोही रहि जावै झल्लाय कें |

                         घर जायकें सब्दावलि ढूंढें ,
                          सब्दकोस कौं झेलें ||

काऊ बड़े मठाधारी कौं
चलौ पटाय डारें |
पूजा अरचन करें,
आरती करें मनाय डारें |

काऊ तरह औ कैसे हूँ ,
बस जुगति-जुगाड़ करें |
पुरस्कार मिलि जावै ,
औ सब जै जैकार करें |

                       काऊ तरह ते छपवाय डारें ,
                       बाजारनि में ठेलें ||


२.भरी उमस में...


                आऔ आजु लगावैं घावनि पै
                गीतनि के मरहम |

मन में है तेज़ाब भरौ
पर गीतनि  कौ हू  डेरौ |
मेरे गीतनि में ठसकी है,
दोस नांहि है मेरौ |

मेरौ अपनौ काव्य-बोधु है,
आपुनि ठनी ठसक है |
मेरी आपुनि ताल औ धुनि  है,
आपुनि सोच-समुझि है |

                   भरी उमस में कैसें गावें
                    प्रेम प्रीति प्रीतम ||

जो कछु देखौ सोई कहतु हौं
झूठौ भाव है नाहीं |
जो कछु मिलौ सोई लौटाऊँ
कछु हू नयौ  है नाहीं |

हमकों थी उम्मीद
खिलेंगे इन बगियन में फूल |
पर हर ठौर ही उगे भये हैं
कांटे और बबूल |

                    टूटि चुके हैं आजु समय की
                     सांसनि के दम-ख़म |

                    आओं आजु लगावैं घावनि पै
                    गीतनि के मरहम ||