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रविवार, 30 जून 2013

तपी दोपहर

       तपी दोपहर
तपी धूप करती रही,  टुकड़ा छांव तलाश |
नहीं मिली तो आ गई,थक सूरज के पास||

तपी धूल पर तप रहे,हर पल सबके पांव |
वृक्षों से खाली हुए, लगभग सारे   गांव||

तपी दुपहरी हो गई,असहनीय अब धूप |
लकड़ी-चोरों ने किया,  सामंजस्य  प्रदूप||

भरी दुपहरी ना मिली ,  ढूंढ-ढूढकर छांव |
निजीस्वार्थ ने कर दिया,वृक्षहीन हर ठांव||

रेखा सी नदिया हुई,शुष्क तलैया-ताल |
तपी दोपहर में हुआ,जन-जीवन बेहाल||

सर पर सूरज तप रहा,भ्रूभंगिम कर आज |
वृक्ष काटने का मिला, कठिन दण्ड यह'राज'||

              - डा.राज सक्सेना

“कुछ फुटकर दोहे मेरे भी” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

चार चरण दो पंक्तियाँ, लगता ललित-ललाम।
इसीलिए इस छन्द ने, पाया दोहा नाम।१।

लुप्त हो गया काव्य का, नभ में सूरज आज।
बिना छन्द रचना करें, ज्यादातर कविराज।२।

बिन मर्यादा यश मिले, छन्दों का क्या काम।
पद्य बताकर गद्य को, करते हैं बदनाम।३।

चार दिनों की ज़िन्दग़ी, काहे का अभिमान।
धरा यहीं रह जायेगा, धन के साथ गुमान।४।

प्यार जगत में छेड़ता, मन वीणा के तार।
कुदरत ने हमको दिया, ये अमोल उपहार।५।

प्यार नहीं है वासना, ये तो है अनुबन्ध।
प्यार शब्द से जुड़ा है, तन-मन का सम्बन्ध।६।

चटके दर्पण की कभी, मिटती नहीं दरार।
सिर्फ दिखावे के लिए, ढोंगी करता प्यार।७।

ढाई आखर प्यार का, देता है सन्ताप।
हार-जीत के खेल में, बढ़ जाता है ताप।९।

मुखिया की चलती नहीं, सबके भिन्न विचार।
ऐसा घर कैसे चले, जिसमें सब सरदार।१०।

दोहा छंद...


कुछ दोहे मेरी कलम से.....

बड़ा सरल  संसार है  , यहाँ  नहीं  कुछ गूढ़
है तलाश किसकी तुझे,तय करले मति मूढ़. 

कहाँ   ढूँढता  है   मुझे   ,   मैं  हूँ   तेरे   पास
मैं तुझ सा साकार कब, मैं केवल अहसास.  

पागल होकर खोजता ,   सुविधाओं में चैन
भौतिकता करती रही , कदम-कदम बेचैन. 

मैं  मिल   जाऊंगा  तुझे , तू बस मैं को भूल
मेरी  खातिर  हैं  बहुत ,  श्रद्धा   के   दो फूल.  

जीवन   सारा   बीतता , करता रहा तलाश
अहंकार के भाव ने ,सबकुछ किया विनाश. 

त्याग दिया माँ-बाप को , कितना किया हताश
अब किस सुख की चाह में, मुझको करे तलाश.

जिस दिन जल कर दीप सा ,देगा ज्ञान प्रकाश
मुझमें  तू  मिल  जा  जरा ,  होगी खतम तलाश.   

पाप भरें हैं हृदय घट , मन में रखी खराश
लेकर गठरी स्वर्ण की  ,  मेरी करे तलाश.  

जीवित होकर हँस पड़ूँ , ऐसा संग तलाश
फिर मेरी मूर्ति  गढ़ने  , लाना संग तराश.  

ज्येष्ठ दुपहरी क्यों खिले ,  सेमल और पलाश
इस क्यों का कारण कभी, अपने हृदय तलाश.  

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

दोहा छंद विधान (अरुन शर्मा 'अनन्त')

दोहे के माध्यम से दोहे की परिभाषा :-
(छंद दोहा : अर्धसम मात्रिक छंद, चार चरण, विषम चरण तेरह मात्रा, सम चरण ग्यारह मात्रा, अंत पताका अर्थात गुरु लघु से, विषम के आदि में जगण वर्जित, प्रकार तेईस) 
 
तेरह ग्यारह क्रम रहे, मात्राओं का रूप |
चार चरण का अर्धसम, शोभा दिव्य अनूप || 
 
विषम आदि वर्जित जगण, सबसे इसकी प्रीति |
गुरु-लघु अंतहिं सम चरण, दोहे की यह रीति || 
 
विषम चरण के अंत में, चार गणों को त्याग |
यगण मगण वर्जित तगण, भंग जगण से राग ||
अम्बरीष श्रीवास्तव 
 
दोहा चार चरणों से युक्त एक अर्धसम मात्रिक छंद है जिसके पहले व तीसरे चरण में १३, १३ मात्राएँ तथा दूसरे व चौथे चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं, दोहे के सम चरणों का अंत 'पताका' अर्थात गुरु लघु से होता है तथा इसके विषम चरणों में जगण अर्थात १२१ का प्रयोग वर्जित है ! अर्थात दोहे के विषम चरणों के अंत में यगण(यमाता १२२) मगण (मातारा २२२) तगण (ताराज २२१) व जगण (जभान १२१) का प्रयोग वर्जित है जबकि वहाँ पर सगण (सलगा ११२) , रगण (राजभा २१२) अथवा नगण(नसल १११) आने से दोहे में उत्तम गेयता बनी रहती है. 
 
सम चरणों के अंत में जगण अथवा तगण आना चाहिए अर्थात अंत में पताका (गुरु लघु) अनिवार्य है|
दोहे की रचना करते समय पहले इसे गाकर लिख लेना चाहिए तत्पश्चात इसकी मात्राएँ जांचनी चाहिए ! 
इसमें गेयता का होना अनिवार्य है ! दोहे के तेईस प्रकार होते हैं | जिनका वर्णन बाद में किया जाएगा |
अम्बरीष श्रीवास्तव

शीर्षक : माँ
माँ तुमसे जीवन मिला, माँ तुमसे यह रूप ।
माँ तुम मेरी छाँव हो, माँ तुम मेरी धूप ।।


तू मेरा भगवान माँ, तू मेरा संसार ।
तेरे बिन मैं, मैं नहीं, बंजर हूँ बेकार ।।


पूजा माँ की कीजिये, कीजे न तिरस्कार ।
धरती पर मिलता नहीं, माँ सा सच्चा प्यार ।।


छू मंतर पीड़ा करे, भर दे पल में घाव ।
माँ की ममता का कहीं, कोई मोल न भाव ।।


माँ तेरी महिमा अगम, कैसे करूँ बखान ।
संभव परिभाषा नहीं, संभव नहीं विधान ।।

अरुन शर्मा 'अनन्त'

सभी मित्रों से निवेदन है, यदि वे अनुमोदन का दोहों अनुमोदन दोहा लिख कर करेंगे तो अधिक प्रसन्नता होगी.
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